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दिल्ली, कानपुर से कोलकाता तक, 480 साल पुरानी वो सड़क, जिस पर आज भी दौड़ता है आधा हिंदुस्तान

दिल्ली से कोलकाता और अमृतसर तक... 500 साल पुरानी इस सड़क की कहानी बेहद दिलचस्प है. शेरशाह सूरी की बनाई सड़क पर आज भी लाखों वाहन दौड़ते हैं.

दिल्ली, कानपुर से कोलकाता तक, 480 साल पुरानी वो सड़क, जिस पर आज भी दौड़ता है आधा हिंदुस्तान
GT रोड की कहानी
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देशभर में जहां कई नए-नए हाइवे और एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, वहीं भारत में करीब 500 साल पुरानी एक ऐसी सड़क है, जिससे आधा हिंदुस्तान सफर करता है. यह रोड दिल्ली, अमृतसर, कोलकाता जैसे देश के बड़े शहरों को कनेक्ट करता है. जब ये रास्ता बना तब इसका हिस्सा पाकिस्तान और बांग्लादेश तक था. आज बॉर्डर पार भी इस रास्ते पर वाहन गुजरते हैं. वहीं भारत में ये रास्ता नेशनल हाइवे में बदल चुका है. हम बात कर रहे हैं 'ग्रांड ट्रक रोड' यानी जीटी रोड की. 1540 के दशक में यह रोड शेरशाह सूरी ने बनवाया था. उस समय इसका नाम 'सड़क-ए-आजम' था. वहीं अंग्रेजों ने इसे पक्का कराया और इसका नाम जीटी रोड रख दिया.

जब बना था तब कैसा था ये रास्ता?

शेरशाह सूरी ने 1540-1545 में इस रोड को बनवाया था. उन्होंने इसका निर्माण पेशावर से ढाका तक कराया था. शेरशाह सूरी का यह प्रोजेक्ट सिर्फ मिट्टी और पत्थरों का रास्ता नहीं था, बल्कि उस दौर का एक सुनियोजित हाइवे नेटवर्क था. उन्होंने बंगाल से लेकर उत्तर-पश्चिम भारत तक व्यापार, प्रशासन और सैन्य गतिविधियों को तेज करने के लिए इस सड़क को बनवाया.

उस समय इस रास्ते पर हर 3 से 4 किलोमीटर पर दूरी बताने के लिए मीनारें बनवाई गईं. ये कुछ वैसी ही थीं, जैसे आज के जमाने के माइलस्टोन काम करते हैं. इसके अलावा यात्रियों और व्यापारियों के ठहरने के लिए जगह-जगह सरायें, खाने-पीने की व्यवस्था और सुरक्षा चौकियां बनाई गई थीं. वहीं राहगीरों को धूप से बचाने के लिए सड़क के दोनों किनारों पर छायादार पेड़ लगाए गए.

चार देशों का सफर कराती थी यह सड़क

यह रास्ता बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान को आपस में जोड़ती थी. पूर्वी भारत यानी बंगाल-बिहार से लेकर उत्तर भारत के यूपी, हरियाणा, पंजाब तक का सफर इसी सड़क से तय होता था. शेरशाह सूरी ने बंगाल के सोनारगांव से लेकर आधुनिक पाकिस्तान के रोहतास और आगे पेशावर तक इस सड़क का पुनर्निर्माण व विस्तार किया था. तब इस रास्ते को 'सड़क-ए-आजम' कहते थे.

अंग्रेजों ने बदला नाम

1830 के दशक में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस सड़क को पक्का कराया. अंग्रेजों ने इसे कलकत्ता से पेशावर और काबुल तक फिर से बनवाया. उन्होंने इस ऐतिहासिक सड़क का नाम भी बदलकर ग्रांड ट्रक रोड रख दिया. आज भी इसे जीटी रोड के नाम से ही जानते हैं. जाने माने लेखक रूडयार्ड किपलिंग ने अपनी पुस्तक 'किम' में जीटी रोड को 'द रिवर ऑफ लाइफ' बताया था.

आज किन नेशनल हाईवे में बदल चुकी है GT रोड?

भारतीय सीमा में अब यह रास्ता कोलकाता-दिल्ली हाइवे NH-19 और दिल्ली-अमृतसर हाइवे NH-44 के नाम से जाना जाता है.

NH-19: पहले इसे NH-2 के नाम से जाना जाता था. यह रास्ता कोलकाता, दुर्गापुर, धनबाद, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर  और आगरा को जोड़ता है. 

NH-44: पहले यह NH-1/NH-2 का हिस्सा था. यह आगरा, मथुरा, दिल्ली, पानीपत, करनाल, अंबाला और जालंधर को कनेक्ट करती है.

NH-3: यह रास्ता जालंधर, अमृतसर होते हुए अटारी बॉर्डर तक जाती है. 

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