गांधी जयंती के मौके पर फूल माला चढ़ाते तमाम नेताओं के कार्यक्रमों के अलावा गांधी शांति प्रतिष्ठान पर भी लोगों को नजर डाल लेनी चाहिए. गांधी जी पर रिसर्च, कॉन्फ्रेंस और गांधीवादी मूल्यों को जिंदा रखने वाली संस्थान गांधी शांति प्रतिष्ठान घोर आर्थिक तंगहाली से गुजर रही है. देश भर के 150 सेंटर पहले ही बंद हो चुके हैं. गांधीवादी संस्थान की हालत खराब क्यों है? दिल्ली में गांधी शांति प्रतिष्ठान है. यहां गांधी जयंती के मौके पर गोष्ठी कराई जा रही है. पहले ही तंगहाली से गुजर रहे इस संस्थान को कोरोना ने बुरे आर्थिक दौर में पहुंचा दिया है. हालात इतने खराब हैं कि अब सालाना एक से डेढ़ करोड़ रुपये भी जुटाना इस संस्थान को भारी पड़ रहा है.
गांधी शांति प्रतिष्ठान के चेयरमैन कुमार प्रशांत का कहना है कि साधनों की दिक्कत है..कोरोना की वजह से और दिक्कत आई है. इस संस्थान को वही पैसा देते हैं जिनके पास ज्यादा होता है. वे भी अभी कोरोना की वजह से मुश्किल में हैं.
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गांधी जी के नाम पर जहां सरकारी कार्यक्रमों में करोड़ों खर्च होता है वहीं गांधी शांति प्रतिष्ठान कुछ चुनिंदा दानदाताओं के जरिए चलता है. लेकिन फिर भी गांधी शांति प्रतिष्ठान के चेयरमैन गांधी जी की इस फोटो के जरिए बताते हैं कि गांधी ने कितने लोगों का जीवन बदला है. कुमार प्रशांत ने कहा कि, यहां से गांधी शुरू होते हैं और आज जो गांधी हमारे सामने हैं उसने भाषा छोड़ी, उसने पोशाक छोड़ा, उसने सुविधाएं छोड़ीं. सोचिए कितने लोगों में उसने बदलाव किए होंगे.
गांधी के देश में बदलाव की उम्मीद के तौर पर हमें अलवर के अंकित भार्गव दिल्ली में मिले. गांधी शांति प्रतिष्ठान में वे गांधी जी को याद करने पहुंचे हैं. पुणे में MIT से पढ़े लेकिन अलवर में गांव के सरकारी स्कूल को बदलने की उनकी कोशिश सुर्खियों में है. शिक्षक अंकित भार्गव ने कहा कि 2014 से हम कोशिश कर रहे हैं. पहले बच्चों के लिए जनसहयोग से वाशरुम बनवाया, अब कैरियर सेंटर बना रहे हैं.
सोचिए आदमी के भीतर कितनी संभावनाएं छुपी हैं वो हम और आप भी हो सकते हैं. बस सच के अहसास से गुजरिए जिससे गांधी जी गुजरे थे. इसीलिए गांधी का समय कभी नहीं बीतेगा क्योंकि आदमी की अच्छाई पर भरोसा है.
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