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'ठंड तो उस पत्थर की मूरत को भी लगती होगी...', शहीद बेटे के लिए मां का प्यार देख आंखें हो जाएंगी नम

आठ साल पहले गुरनाम ने देश के लिए अपनी जान दी, लेकिन मां के लिए वह आज भी जिंदा है. बस सरहद से लौटकर पत्थर की मूरत बन गया है. हाल ही में जसवंत कौर ने अपने बेटे की प्रतिमा को ठंड से बचाने के लिए कंबल ओढ़ाया. तस्वीर वायरल हुई और लोगों की आंखें नम हो गईं. इस पर अब मां ने कहा, 'मेरे बेटे को ठंड बहुत लगती थी. हमें भी इन दिनों बहुत ठंड लग रही है.'

'ठंड तो उस पत्थर की मूरत को भी लगती होगी...', शहीद बेटे के लिए मां का प्यार देख आंखें हो जाएंगी नम
  • जम्मू में शहीद बीएसएफ जवान गुरनाम सिंह की प्रतिमा पर मां जसवंत का प्यार देख लोगों की आंखें नम हो गईं.
  • जसवंत कौर ने अपनी बेटे की प्रतिमा को ठंड से बचाने के लिए कंबल ओढ़ाया, जिससे लोगों की आंखें नम हो गईं.
  • गुरनाम सिंह ने 2016 में आतंकियों की घुसपैठ रोकते हुए अपनी जान देश के लिए बहादुरी से दी थी.

सर्द हवाओं के बीच जम्मू के अर्निया चौक पर खड़ी एक प्रतिमा सिर्फ पत्थर नहीं है, बल्कि एक मां के दिल की धड़कन है. यह कहानी है शहीद बीएसएफ जवान गुरनाम सिंह और उनकी मां जसवंत कौर की. आठ साल पहले गुरनाम ने देश के लिए अपनी जान दी, लेकिन मां के लिए वह आज भी जिंदा है. बस सरहद से लौटकर पत्थर की मूरत बन गया है.

हाल ही में जसवंत कौर ने अपने बेटे की प्रतिमा को ठंड से बचाने के लिए कंबल ओढ़ाया. तस्वीर वायरल हुई और लोगों की आंखें नम हो गईं. इस पर अब मां ने कहा, 'मेरे बेटे को ठंड बहुत लगती थी. हमें भी इन दिनों बहुत ठंड लग रही है. हम रजाई ओढ़कर बैठते हैं, हीटर चलाते हैं, तो मेरे बेटे को भी तो ठंड लगती होगी. इसीलिए मैंने मूर्ति को कंबल ओढ़ाया.'

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जसवंत कौर की आंखों में आंसू...

मां जसवंत कौर ने बताया, 'बेटे की याद आती है तो रो भी लेते हैं. लेकिन गर्व है कि उसने देश के लिए जान दी. 24 साल की उम्र में वो हमें छोड़ गया। ये तो खाने-पीने की उम्र थी, लेकिन उसने बहादुरी दिखाई.'

शहीद गुरनाम सिंह

शहीद गुरनाम सिंह

वर्दी से था 'पहला इश्क'

मां ने बताया कि 24 साल का गुरनाम जब आखिरी बार मिला था, तो उन्होंने उसकी शादी के सपने बुने थे. उन्होंने सोचा था कि अगली बार जब वह छुट्टी आएगा, तो घर में शहनाइयां बजेंगी. लेकिन गुरनाम के दिल में कुछ और ही था. उसका 'पहला इश्क' उसकी वर्दी और उसका देश था.

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2016 में दी देश के लिए जान

बता दें कि गुरनाम सिंह ने 21 अक्टूबर 2016 को हीरानगर सेक्टर में आतंकियों की घुसपैठ रोकते हुए जान दी. गोलियों से छलनी होने के बावजूद वह पीछे नहीं हटे. उनकी शहादत ने देश का सिर ऊंचा किया, लेकिन मां के लिए यह जंग आज भी जारी है.

यह कंबल सिर्फ ऊन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उस ममता की गर्माहट है जिसे कोई गोली या दुश्मन कभी खत्म नहीं कर सकता. जसवंत कौर का यह प्यार हमें याद दिलाता है कि एक जवान सिर्फ सीमा पर ही बलिदान नहीं देता, उसका परिवार हर दिन एक नई शहादत जीता है.

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