- ईरान का खारग द्वीप उसके कुल तेल निर्यात का लगभग नब्बे प्रतिशत भाग प्रोसेस करता है
- खारग द्वीप पर तेल भंडारण टैंक, लोडिंग टर्मिनल, पाइपलाइन और अन्य बुनियादी ढांचे मौजूद हैं
- अमेरिकी सेना ने खारग द्वीप पर बमबारी की है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया है
महज 20 वर्ग किलोमीटर में फैला ईरान का खारग द्वीप उसके कुल तेल निर्यात का 90 प्रतिशत हिस्सा प्रोसेस करता है. शुक्रवार को, अमेरिका के इस द्वीप पर बमबाजी ने क्षेत्र में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है. फारस की खाड़ी (Persian Gulf) के उत्तरी भाग के आसपास, बुशहर प्रांत की मुख्य भूमि से 28 किलोमीटर दूर स्थित, ये द्वीप लगभग आठ किलोमीटर लंबा और पांच किलोमीटर चौड़ा है. डोनाल्ड ट्रंप ने खारग द्वीप को ईरान का "क्राउन ज्वेल" कहा है, लेकिन इसे वर्षों पहले प्रसिद्ध ईरानी लेखक जलाल अल-अहमद ने "फारस की खाड़ी का अनाथ मोती" कहा था.
खारग द्वीप में क्या है
- खारग द्वीप पर ईरान ने तेल भंडारण टैंक, लोडिंग टर्मिनल और पाइपलाइन आदि कई तेल से जुड़े बुनियादे ढांचे बनाए हुए हैं. ये इस क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य करती है. टर्मिनल को अबूजर, फोरोजान और दुरूद से कच्चा तेल प्राप्त होता है, जिसे फिर समुद्र के नीचे पाइपलाइनों के एक जटिल नेटवर्क के जरिए तटवर्ती प्रोसेसिंग सुविधाओं तक पहुंचाया जाता है, जहां इसे भंडारित किया जाता है या फिर वैश्विक बाजारों में भेजा जाता है.
- 1960 और 1970 के दशक में ईरान के तेल उत्पादन विस्तार के दौरान खारग द्वीप में महत्वपूर्ण विकास हुए, क्योंकि देश का अधिकांश तट सुपरटैंकरों के लिए बहुत उथला था. ईरान के सबसे बड़े तेल क्षेत्रों अहवाज, मारून और गचसरन से पाइपलाइनें सीधे खारग के भंडारण टैंकों में तेल पहुंचाती हैं. ये सुविधाएं प्रति वर्ष लगभग 95 करोड़ बैरल कच्चे तेल का प्रबंधन करती हैं. रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट के ऊर्जा शोधकर्ता पेट्रास कटिनास ने कहा कि खारग द्वीप ईरान की सरकार और सेना के के लिए आर्थिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि अगर ईरान खारग पर अपना नियंत्रण खो देता है, तो देश के लिए काम करना मुश्किल हो जाएगा.
- फारस की खाड़ी में केशम द्वीप और अबू मूसा तथा ग्रेटर और लेसर तुनब भी अन्य ईरानी द्वीप हैं, जो अपने तेल भंडार और रणनीतिक स्थिति के कारण उसके लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं. अल जजीरा के अनुसार, तेल के कारण महत्व के अलावा, यह द्वीप सातवीं शताब्दी के अत्यंत पूजनीय मीर मोहम्मद तीर्थस्थल, अचमेनिद काल के शिलालेखों और मशालों से सुसज्जित मीर आराम तीर्थस्थल, पारसी कब्रिस्तान, ईसाई कब्रें, ससानिद काल के मकबरे, इस्लामी कब्रिस्तान और 1747 के डच किले और सुंदर बगीचों के लिए विख्यात है.

इससे पहले, अमेरिका और इजरायल खारग द्वीप के आसपास सावधानी बरत रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने द्वीप पर कब्जा करने की संभावना जताई. वॉल स्ट्रीट जर्नल और न्यूयॉर्क टाइम्स ने शुक्रवार को बताया कि पेंटागन ने जापान से एंफिबियस हमलावर जहाज यूएसएस त्रिपोली को लगभग 2,500 मरीन सैनिकों के साथ क्षेत्र में भेजा है.
खारग पर हमला क्यों हुआ?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेना ने द्वीप पर स्थित ठिकानों पर भारी बमबारी की है और द्वीप के तेल बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाने की धमकी दी है. सभी सैन्य ठिकानों को नष्ट किए जाने की बात कहते हुए, ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, "मैंने द्वीप पर स्थित तेल बुनियादी ढांचे को नष्ट न करने का फैसला किया है. हालांकि, अगर ईरान या कोई और होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों के निर्बाध और सुरक्षित आवागमन में बाधा डालने की कोशिश करता है, तो मैं तुरंत अपने फैसले पर पुनर्विचार करूंगा."

ईरान द्वारा महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में अवाजाही लगभग पूरी तरह से रोके जाने के बाद ट्रंप और कई अमेरिकी नेताओं ने कड़े बयान दिए हैं. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है और तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) में चौथे सबसे बड़े कच्चे तेल उत्पादक ईरान ने शपथ ली है कि युद्ध जारी रहने तक खाड़ी क्षेत्र से एक लीटर भी तेल का निर्यात नहीं किया जाएगा.
दुनिया क्यों खौफ में
इस हमले से ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई होने की संभावना है जेपी मॉर्गन ने चेतावनी दी है कि इससे "होर्मुज जलडमरूमध्य में या क्षेत्रीय ऊर्जा के बुनियादी ढांचे के खिलाफ गंभीर जवाबी कार्रवाई" हो सकती है. अमेरिकी हमले के कुछ घंटों बाद ही शनिवार को संयुक्त अरब अमीरात ( UAE) में एक प्रमुख ऊर्जा संयंत्र की ओर से काला धुआं उठता देखा गया. ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर कलीबाफ ने पहले कहा था कि अगर द्वीपों पर हमला हुआ तो ईरान "सभी संयम छोड़ देगा" और कहा कि ट्रंप अमेरिकी सैनिकों के खून के लिए जिम्मेदार होंगे. जाहिर है तेल भंडारों या उनके बुनियादों ढांचों पर हमले बढ़े तो दुनिया को लंबे समय के लिए तेल की किल्लत झेलनी पड़ सकती है.
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