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शहीद बेटे की प्रतिमा पर सर्दी में दुलार से कंबल लपेटती है ये मां, इन्हें याद है उसका पहला इश्क और अधूरा अरमान

शहीद बेटे की प्रतिमा पर सर्दी में दुलार से कंबल लपेटती है ये मां, इन्हें याद है उसका पहला इश्क और अधूरा अरमान
  • अर्निया (जम्मू) में शहीद कांस्टेबल गुरनाम सिंह की प्रतिमा के पास मां जसवंत कौर हर सर्दी में कंबल लेकर आती हैं
  • जसवंत कौर अपने बेटे की शहादत के बाद भी उसे जीवित मानती हैं और उसकी यादों को संजोए हुए हैं
  • गुरनाम सिंह ने अक्टूबर 2016 में हीरानगर सेक्टर में आतंकियों को रोकते हुए एक आतंकी का सफाया किया था
जम्मू:

बाहर बर्फीली हवाएं चल रही हैं, पारा गिर रहा है, लेकिन अर्निया (जम्मू) के एक चौक पर खड़ी शहीद की प्रतिमा के पास खड़ी मां का कलेजा आज भी उतना ही धड़क रहा है, जितना 8 साल पहले धड़कता था. यह कहानी है शहीद गुरनाम सिंह और उनकी मां जसवंत कौर की. एक ऐसी मां, जिसके लिए उसका बेटा मरा नहीं है, बस सरहद से लौटकर पत्थर की मूरत में तब्दील हो गया है.

पत्थर की प्रतिमा में धड़कती ममता

साल 2021 में जब अर्निया में कांस्टेबल गुरनाम सिंह की प्रतिमा लगाई गई, तो दुनिया के लिए वह गौरव का प्रतीक थी. लेकिन मां जसवंत कौर के लिए वह आज भी उनका वही 'लाडला' है जो ठंड में ठिठुर सकता है. साल 2022 से हर सर्दी में, जैसे ही जम्मू में ठंड की पहली लहर आती है, जसवंत कौर एक भारी ऊनी कंबल लेकर प्रतिमा के पास पहुंचती हैं. वह बड़े ही दुलार से उस प्रतिमा के कंधों पर कंबल लपेटती हैं. देखने वालों की आंखें भर आती हैं, लेकिन मां के चेहरे पर एक अजीब सा संतोष होता है. मानो उन्होंने अपने बेटे को सर्दी से बचा लिया हो.

वो अधूरा अरमान और वो 'पहला इश्क'

मां याद करती हैं कि 26 साल का गुरनाम जब आखिरी बार मिला था, तो उन्होंने उसकी शादी के सपने बुने थे. उन्होंने सोचा था कि अगली बार जब वह छुट्टी आएगा, तो घर में शहनाइयां बजेंगी. लेकिन गुरनाम के दिल में कुछ और ही था. उसका 'पहला इश्क' उसकी वर्दी और उसका देश था.

पाकिस्तान की नापाक हरकत को रोका था

21 अक्टूबर 2016: हीरानगर सेक्टर में घुसपैठ करते आतंकियों के लिए गुरनाम काल बन गए. एक आतंकी को ढेर किया और सीजफायर का मुंहतोड़ जवाब दिया.

22 अक्टूबर 2016: गोलियों से छलनी होने के बावजूद गुरनाम पीछे नहीं हटे और अंततः भारत माता की गोद में सो गए.

शहादत के बाद भी जारी है 'रिश्ता'

BSF की 173वीं बटालियन का यह वीर जवान आज भी अपनी मां की गोद में सुरक्षित है. जसवंत कौर का यह त्याग और प्रेम हमें याद दिलाता है कि एक जवान सिर्फ सीमा पर ही बलिदान नहीं देता, उसका पूरा परिवार हर दिन एक नई शहादत जीता है. यह कंबल सिर्फ ऊन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि उस ममता की गर्माहट है जिसे कोई भी गोली या दुश्मन कभी खत्म नहीं कर सकता.

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