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हिंसा के बीच डटी रही भारत की शेरनी, मेजर स्वाति को अब UN ने दिया सबसे बड़ा सम्मान

बेंगलुरु की स्वाति शांता कुमार ने 2016 में इंजीनियरिंग के बाद IBM का बड़ा जॉब ऑफर छोड़कर भारतीय सेना में शामिल होने का फैसला किया. आज वह मेजर स्वाति हैं, जिन्हें दक्षिण सूडान में बहादुरी और शांति के लिए UN ने सम्मानित किया है.

हिंसा के बीच डटी रही भारत की शेरनी, मेजर स्वाति को अब UN ने दिया सबसे बड़ा सम्मान
मेजर स्वाति की कहानी

 'वर्दी आपकी पहचान नहीं बदलती, बल्कि आपकी असली ताकत को बाहर लाती है.' यह कहना है भारतीय सेना की मेजर स्वाति शांता कुमार का. 2016 में बेंगलुरु की एक आम लड़की, जिसके पास IBM जैसी कंपनी से बड़ा जॉब ऑफर था, लेकिन उसने सेना में जाकर देश सेवा चुनी और आज पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल हैं. स्वाति को उनकी बहादुरी और समाज सेवा के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) महासचिव के 2025 अवार्ड से नवाजा गया है. आइए जानते हैं कैसे एक इंजीनियर लड़की सेना में मेजर बनी और सात समंदर पार हिंसा की आग में झुलस रहे देश में उम्मीद की नई किरण जगाई.

IBM की मोटी सैलरी ठुकरा वर्दी चुनीं

एक मिडिल क्लास परिवार में जन्मीं स्वाति का बचपन पढ़ाई और खेलों में बीता. पिता ITC में थे और मां सरकारी टीचर. इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद कैंपस प्लेसमेंट में स्वाति को IBM जैसी कंपनी में जॉब मिल गई. लेकिन स्वाति ने अपने दोस्तों का साथ देने के लिए सेना का SSB इंटरव्यू दिया और उसे पास भी कर लिया. जब किसी एक जॉब को चुनने की बारी आई, तो पिता और दादा ने सेना में जाने को कहा. यहां से 'मेजर स्वाति' को अलग पहचान मिली.

दक्षिण सूडान में हिंसा के बीच जीतीं खुशियां

सेना में काम के दौरान मेजर स्वाति को दक्षिण सूडान के मलाकाल भेजा गया. ये इलाका हिंसा, डर और गरीबी से जूझ रहा था. वहां भारतीय सेना की पहली 'ऑल-विमेन' (पूरी तरह महिलाओं वाली) टीम भेजी गई थी. वहां एक नहीं कई चुनौतियां थीं. वहां की महिलाएं किसी बाहरी पर भरोसा नहीं करती थीं. भाषा और कल्चर बिल्कुल अलग था और चारों तरफ हिंसा का माहौल था. शुरुआत में लोकल महिलाएं स्वाति और उनकी टीम से बात तक नहीं करती थीं, लेकिन मेजर स्वाति ने हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर धीरे-धीरे लोगों का भरोसा जीता. वहां की महिलाओं को फिटनेस और हेल्थ किट दीं, उनसे बातें कीं और उन्हें अहसास कराया कि वे सेफ हैं.

मेजर स्वाति को UN का खास अवार्ड

मेजर स्वाति ने मलाकाल में 'इक्वल पार्टनर्स, लास्टिंग पीस' नाम के प्रोजेक्ट पर काम किया. उन्होंने दिखाया कि शांति सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि लोगों का दिल जीतकर आती है. उनकी मेहनत का नतीजा यह हुआ कि जब उनका डेढ़ साल का कार्यकाल खत्म हुआ, तो वहां के लोग नहीं चाहते थे कि स्वाति वापस जाएं. उनके इसी जज्बे के कारण उन्हें 'UN Secretary General's Award 2025' से सम्मानित किया गया.

मेजर स्वाति क्या कहती हैं

अक्सर लोग पूछते हैं कि क्या एक महिला ऑफिसर को खुद को ज्यादा साबित करना पड़ता है. मेजर स्वाति कहती हैं कि 'वर्दी पहनने के बाद मैं महिला ऑफिसर नहीं, सिर्फ एक सेना अधिकारी हूं. हमारी ट्रेनिंग हमें नेतृत्व करना सिखाती है. एक बार आप मैदान में उतर जाएं, तो आपका काम बोलता है, आपकी पहचान नहीं.

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