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आवश्यक धार्मिक प्रथाएं तय करना कोर्ट का काम नहीं...सबरीमाला केस में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की SC में दलील

बोर्ड ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में लिखित दलीलें दाखिल की हैं. इस मामले की सुनवाई सात अप्रैल से सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ करेगी.

आवश्यक धार्मिक प्रथाएं तय करना कोर्ट का काम नहीं...सबरीमाला केस में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की SC में दलील
  • मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि धार्मिक प्रथाओं की आवश्यकता तय करना अदालतों का काम नहीं
  • बोर्ड ने कोर्ट को बताया कि धार्मिक स्वतंत्रता के तहत अनुच्छेद 25 और 26 के तहत हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए
  • बोर्ड का मानना है कि आवश्यक धार्मिक प्रथा को न्यायालय की बजाय धार्मिक विद्वानों और समुदाय पर छोड़ना उचित है

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सबरीमला मामले में सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अदालतों को यह तय करने से बचना चाहिए कि किसी धर्म में क्या ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा' है. दरअसल बोर्ड ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में लिखित दलीलें दाखिल की हैं. इस मामले की सुनवाई सात अप्रैल से सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ करेगी.

सबरीमला मामले में बोर्ड की लिखित दलील

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अदालतों द्वारा यह तय करना कि किसी धर्म की कौन‑सी प्रथा आवश्यक है, संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हो सकता है. बोर्ड की यह दलील सबरीमला मामले में दी गई है. यह मामला 2018 के सबरीमला फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं से जुड़ा है. 2018 के फैसले में सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी. इसके बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने इससे जुड़े बड़े संवैधानिक सवालों को नौ जजों की पीठ को भेज दिया था.

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आवश्यक धार्मिक प्रथा' तय करना जटिल विषय

सुप्रीम कोर्ट को दी गई लिखित दलील में बोर्ड ने कहा है कि किसी धर्म की मूल या आवश्यक प्रथाओं को तय करना एक बेहद जटिल मामला है, जो व्यक्तिगत आस्था से जुड़ा होता है. ऐसे में इसे न्यायालय की बजाय धार्मिक विद्वानों और संबंधित समुदाय पर छोड़ा जाना चाहिए. बोर्ड ने यह भी कहा है कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा' के परीक्षण के तहत लोगों पर यह बोझ डाल दिया जाता है कि वे यह साबित करें कि कोई प्रथा उनके धर्म के लिए जरूरी है, जो उचित नहीं है.

नैतिकता और धार्मिक आस्था को साथ‑साथ देखने की जरूरत

बोर्ड ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि नैतिकता को केवल संवैधानिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि संबंधित धर्म की नैतिक मान्यताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए, जब तक वे संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ न हों. बोर्ड ने यह भी कहा कि महिला अधिकार और धार्मिक आस्था को एक‑दूसरे के विरोध में नहीं देखा जाना चाहिए. एक महिला अपनी स्वतंत्रता के साथ अपनी धार्मिक आस्था का पालन भी कर सकती है.

सभी धर्मों पर एक जैसा नियम हमेशा समानता नहीं

बोर्ड ने दलील दी है कि सभी धर्मों के लिए एक जैसा नियम लागू करने से कई बार असमानता पैदा हो सकती है, क्योंकि हर धर्म की प्रथाएं अलग‑अलग होती हैं। इसलिए समानता का अर्थ यह नहीं है कि सभी के साथ बिल्कुल एक जैसा व्यवहार किया जाए. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि पब्लिक ऑर्डर या सेक्युलर नियमों के नाम पर बिना ठोस कारण धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए.

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