- सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट में 7 अप्रैल से रेगुलर सुनवाई शुरू होगी
- केंद्र सरकार की तरफ से पेश SG तुषार मेहता ने भी रिव्यू पिटीशन का समर्थन किया है
- कोर्ट ने 7 अप्रैल को सुनवाई शुरू करेगी और 22 अप्रैल तक सुनवाई पूरी कर लेगी
सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश देने वाले फैसले पर रिव्यू करेगा. इस फैसले के खिलाफ 67 रिव्यू पिटीशन फाइल की गई थी. सर्वोच्च अदालत 7 अप्रैल से इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगा. 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी. चीफ जस्टिस सूर्यकांत 9 जजों की बेंच का गठन करेंगे. केंद्र सरकार ने भी अदालत में दलील दी है और कहा कि वो पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करते हैं. इस मामले में शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ वकील के परमेश्वर को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है. 22 अप्रैल तक सबरीमाला मामले की सुनवाई पूरी हो जाएगी.
7 अप्रैल से रोजाना सुनवाई
सर्वोच्च अदालत की 9 जजों की पीठ 7 अप्रैल को सुबह साढ़े 10 बजे से रोजाना इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी. पहले पुनर्विचार का समर्थन करने वाले पक्ष की दलीलें 7 से 9 अप्रैल तक सुनी जाएंगी. जबकि पुनर्विचार का विरोध करने वाले पक्ष को 14 से 16 अप्रैल तक सुना जाएगा. इसके बाद यदि कोई जवाब (रिजॉइंडर) दाखिल किया जाता है, तो उस पर 21 अप्रैल को सुनवाई होगी. इसके बाद अमिकस क्यूरी की अंतिम दलीलें सुनी जाएंगी, जिनके 22 अप्रैल तक पूरी होगी. अदालत ने सभी पक्षों को निर्धारित समय-सारणी का कड़ाई से पालन करने और नोडल काउंसल को आपसी समन्वय से मौखिक दलीलों की आंतरिक व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है.
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सबरीमला मामले में केंद्र ने 2018 के फैसले का किया विरोध
केंद्र की तरफ पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन किया है. तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि सितंबर 2018 का वह फैसला, जिसमें मासिक धर्म आयु वर्ग (10 से 50 वर्ष) की महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी, पुनर्विचार योग्य है. केंद्र ने अदालत से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने का समर्थन किया है. केंद्र का कहना है कि इस मामले में धार्मिक परंपराओं, आस्था और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन के सवाल गंभीर संवैधानिक महत्व रखते हैं, जिन पर व्यापक पुनर्विचार आवश्यक है. सरकार ने यह भी संकेत दिया कि विभिन्न पक्षों की दलीलों और सामाजिक-धार्मिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचना जरूरी है.
अब इस मामले में 9 जजों की संविधान पीठ विस्तृत सुनवाई करेगी, जिसमें सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत अंतिम निर्णय देगी. यह सुनवाई देश में धार्मिक स्वतंत्रता और लैंगिक समानता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है.
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