तेलंगाना की एक महिला की उम्र 90 साल की हो गई है, लेकिन वो कार चलाती हैं. इतना ही नहीं वो सर्जरी भी करती हैं. अब तक 2 लाख बच्चों की डिलिवरी करा चुकी हैं. पेशे से वो डॉक्टर हैं और खुद को फिट रखने के लिए रोज योग करती हैं. इसी तरह मेडिकल साइंस में अपडेट रहने के लिए जर्नल पढ़ती हैं. सबसे खास बात ये है कि उनके पास इलाज कराने के लिए आज भी मरीजों की लंबी लाइन लगी रहती है.
रिकॉर्ड बुक्स में भी दर्ज
सिकंदराबाद के सीताफलमंडी फ्लाईओवर के ठीक नीचे शुरू होने वाली एक संकरी गली में, तीन हिस्सों वाले एक बड़े गेट के पीछे दो मंजिला इमारत है. इस पर कोई नेमप्लेट नहीं है, फिर भी यहां बहुत से लोग आते हैं, खासकर गर्भवती महिलाएं. रोज़ाना सुबह 8 बजे से रात 8 बजे के बीच यहां चहल-पहल बनी रहती है. यहां तेलंगाना की सबसे उम्रदराज़ प्रसूति और स्त्री रोग विशेषज्ञ 92 वर्षीय सूरी श्रीमती अपने मरीजों को देखती हैं. इनमें से ज्यादातर वे बच्चे हैं, जिनकी डिलीवरी उन्होंने कभी कराई थी, और जो अब सालों बाद अपने बच्चों और यहां तक कि अपने नाती-पोतों के साथ वापस आए हैं.
रिकॉर्ड बुक्स में भी ये दर्ज है कि उन्होंने तीन पीढ़ियों की डिलीवरी कराई है, दो लाख प्रोसीजर किए हैं, मुश्किल सर्जरी में अपनी सर्जिकल महारत दिखाई है और छह दशकों से ज्यादा समय में कई पीढ़ियों के मरीजों का भरोसा जीता है. 'द बेटर इंडिया' के मार्च 2026 के एक आर्टिकल के मुताबिक, उन्होंने अपनी जिंदगी में लगभग 2,00,000 बच्चों की डिलीवरी कराई है.
1958 में मेडिसिन में ग्रेजुएशन किया
डॉ. श्रीमती ने उस्मानिया यूनिवर्सिटी से 1958 में मेडिसिन में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद 1965 में ऑब्सटेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी में डॉक्टर ऑफ़ मेडिसिन की डिग्री हासिल की. 'द बेटर इंडिया' के साथ मार्च 2026 के इंटरव्यू में, डॉ. श्रीमती ने बताया कि मेडिसिन में करियर बनाने की प्रेरणा उन्हें बचपन में मिली थी, जब उनके भाई-बहन चेचक (स्मॉलपॉक्स) से बुरी तरह बीमार पड़ गए थे.
उस समय महिलाओं का मेडिसिन की पढ़ाई करना और डेड बॉडीज को छूना या उन पर काम करना अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए उनके परिवार को बहुत दबाव का सामना करना पड़ा. उन्होंने बताया, "मेरे परिवार को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा; हमारे रिश्तेदारों ने हमसे बात करना बंद कर दिया." इन मुश्किलों के बावजूद, वह डटी रहीं और पिछले 60 सालों से डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस कर रही हैं. खबरों के मुताबिक, उन्होंने 1959 में संगारेड्डी के एक सरकारी अस्पताल में पहली बार अकेले डिलीवरी कराई थी, जहां उन्हें 15 साल की एक लड़की का सी-सेक्शन (ऑपरेशन से डिलीवरी) करना पड़ा था. आधुनिक ऑपरेशन रूम में मिलने वाली स्पेशलाइज़्ड टीमों की कमी के कारण, उन्हें कई भूमिकाएं खुद निभानी पड़ती थीं. उन्होंने याद करते हुए कहा, "मैं ही एनेस्थिसियोलॉजिस्ट, गायनेकोलॉजिस्ट और पीडियाट्रिशियन थी."
मरीज और अन्य डॉक्टर क्या कहते हैं
आज, उनके लंबे करियर की वजह से उन्हें एक ही परिवार की तीन पीढ़ियों की महिलाओं का इलाज करने का मौका मिला है. उनके मरीजों के मन में उनके प्रति गहरा भरोसा है. मरीज कोटेरू तुलसी ने डॉ. श्रीमति से अपनी तीन सिजेरियन डिलीवरी करवाने का अनुभव साझा किया. उन्होंने BBC ग्लोबल विमेन को बताया, "उनकी उम्र को देखते हुए, शुरू में मुझे थोड़ी चिंता थी कि क्या वह सर्जरी कर पाएंगी. लेकिन उन्होंने मुझमें भरोसा जगाया."
साथी मेडिकल प्रोफ़ेशनल भी उनकी तारीफ करते हैं. उस्मानिया मेडिकल कॉलेज में डॉ. श्रीमति के 1988–1991 बैच की पूर्व छात्रा डॉ. रजनी कुमारी ने 90 से ज्यादा उम्र की इस डॉक्टर के सर्जरी के दौरान हाथों की स्थिरता को लेकर किसी भी तरह के शक को दूर किया. डॉ. कुमारी ने BBC ग्लोबल विमेन को बताया, "उनके हाथ कांपने जैसी कोई समस्या नहीं है." उन्होंने आगे कहा, "कभी-कभी हमारे हाथ कांप सकते हैं, लेकिन उनके नहीं."
रोजाना का अनुशासन
'द बेटर इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. श्रीमति अपने दिन की शुरुआत सुबह 5:30 बजे योग से करती हैं. यह आदत उन्हें उनके पिता सूरी राघव दीक्षितुलु ने सिखाई थी, जो आंध्र प्रदेश में योग के एक बड़े जानकार थे और 90 साल की उम्र तक साइकिल चलाते थे. सुबह 8:30 बजे तक वह दिन भर की सर्जरी की योजना बनाती हैं और मरीजों की स्थिति की समीक्षा करती हैं. शाम का समय वह 1999 में शुरू की गई अपनी होम क्लिनिक में मरीजों से मिलने के लिए रखती हैं. वह शहर में खुद गाड़ी चलाकर आती-जाती भी हैं, जिससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में आज भी उनकी आजादी बनी हुई है.
अपने क्षेत्र में अपडेट रहने के लिए, वह प्रोफेशनल डेवलपमेंट की गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेती हैं. डॉ. श्रीमति ने BBC ग्लोबल विमेन को बताया, "मैं मीटिंग्स और कॉन्फ़्रेंस में जाती हूं. मेडिकल जर्नल्स की मदद से खुद को अपडेट रखती हूं और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स से नई जानकारी लेती हूं."
रिटायरमेंट का कोई प्लान नहीं
उस उम्र में पहुंचने के बावजूद जब ज्यादातर लोग काम से किनारा कर लेते हैं, डॉ. श्रीमति का अपना स्टेथोस्कोप छोड़ने का कोई इरादा नहीं है. अपनी कम्युनिटी के प्रति कर्तव्य की मजबूत भावना से प्रेरित होकर, वह इलाज चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए अपने दरवाजे खोल देती हैं. उन्होंने BBC ग्लोबल विमेन से कहा, "बहुत से लोग मदद के लिए मेरे दरवाजे पर आते हैं. इसीलिए मैं यह काम जारी रखना चाहती हूं."
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