Mannat Haveli owner Devender Kadyan Success Story: एक नौजवान जो दिल्ली के कड़ाके की ठंड और चिलचिलाती धूप में सड़क किनारे सब्जी बेच रहा है. दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद हाथ में आते हैं सिर्फ 150 से 300 रुपये. वो लड़का जिसके पास रहने को 35 गज का एक किराए का कमरा है. अगर कहें कि आज वही लड़का हाईवे की बड़ी ढाबा चेन 'मन्नत ग्रुप' का मालिक है और रेंज रोवर डिफेंडर, मर्सिडीज जी-वैगन जैसी करोड़ों की गाड़ियों में घूमता है, तो शायद आप यकीन न करें. अगर आप दिल्ली-चंडीगढ़ या नॉर्थ इंडिया के हाइवे से गुजरे हैं, तो आपने 'मन्नत हवेली' नाम के रेस्तरां और ढाबों के बाहर महंगी गाड़ियों की लंबी कतारें जरूर देखी होंगी. 'जीरो से हीरो' बनने की कहानी है देवेंद्र कादियान की.

बात 90 के दशक की है. हरियाणा के गन्नौर का एक साधारण किसान परिवार. घर में 6 भाई-बहन. पिताजी खेती करते थे, लेकिन हर साल फसल में घाटा. गरीबी इस कदर हावी थी कि चारों बहनों की शादी एक साथ करनी पड़ी ताकि कम खर्चा हो. 19 साल की उम्र में देवेंद्र की भी शादी इसलिए कर दी गई ताकि ये लड़का कहीं गलत रास्ते पर न चला जाए.
लेकिन देवेंद्र की आंखों में नींद नहीं, पैसा कमाने का सपना था. इस गरीबी के दलदल से बाहर निकलने का सपना था. पिता ने सख्त लहजे में कह दिया था, "घर में खाली नहीं बैठना है, चाहे रिक्शा चलाओ या रेहड़ी लगाओ." फिर देवेंद्र ने वही किया. गांव छोड़कर पत्नी और माता-पिता के साथ वो सोनीपत आ गए. 35 गज का वो किराए का घर, जहां 8 लोग एक साथ सोते थे.
सब्जी से लेकर जूस और अचार तक बेचा
शुरुआत हुई सब्जी की रेहड़ी से. दिन के 150 रुपये बचते थे. फिर जूस की दुकान लगाई और बाद में अचार बेचना शुरू किया. अचार का काम दिल्ली तक फैल गया. दिन-रात एक करके देवेंद्र और उनके छोटे भाई वीरेंद्र ने दिल्ली में अचार की 8-10 दुकानें खोल लीं. ठीक-ठाक पैसे आने लगे. लगा कि अब जिंदगी सेट हो गई. लेकिन किस्मत को तो देवेंद्र से कुछ और ही करवाना था. दिल्ली में सीलिंग की गाज गिरी और एक झटके में उनका चमकता हुआ अचार का बिजनेस खत्म हो गया.
फिर पलट गई जिंदगी
अब आता है इस कहानी का वो टर्निंग पॉइंट, जिसने देवेंद्र की जिंदगी की दिशा ही बदल दी. दिल्ली से काम उजड़ने के बाद, 2003 के आस-पास देवेंद्र को लगा कि हाइवे के ढाबों पर अचार अच्छा बिक सकता है. वो पहुंचे मुरथल के सबसे मशहूर 'अमरीक सुखदेव' ढाबे पर. देवेंद्र ने वहां के मालिक से बस इतनी गुजारिश की कि "भाई साहब, मुझे किराए पर एक छोटी सी दुकान दे दो, मैं अपना अचार बेचना चाहता हूं." लेकिन जवाब क्या मिला? 'न'.

एक नौजवान जिसे ढाबे के बाहर एक छोटी सी दुकान नहीं मिली, वो चाहता तो निराश होकर लौट जाता. लेकिन उस दिन देवेंद्र ने अमीर बनने की कसम खाई. जिन पैसों को जोड़-जोड़कर रखा था, उन्हीं 15-20 लाख रुपयों से 2005 में देवेंद्र ने अपना खुद का एक छोटा सा तंबू वाला ढाबा शुरू किया. 'कनक ढाबा'. फिर 2006 में बेटी पैदा हुई, जिसका नाम रखा मन्नत. बेटी आई तो किस्मत के सारे ताले खुल गए. उसी के नाम पर शुरू हुआ 'मन्नत ढाबा'.

शुरुआती दौर आसान नहीं था. तंबू आंधी में उड़ जाते थे. भीड़ बढ़ती थी तो यही देवेंद्र चाय के पतीले पर खड़े हो जाते थे, और कभी-कभी तो ग्राहकों के जूठे बर्तन तक धोए हैं. पर असली आग लगना अभी बाकी थी. एक रात ढाबे पर कुछ शराबी गुंडों ने हमला कर दिया. देवेंद्र और उनके स्टाफ को बुरी तरह पीटा गया. जब इंसाफ के लिए थाने गए, तो वहां के एसएचओ (SHO) ने भी मदद करने के बजाय इन्हें ही मां-बहन की गालियां दीं. एक आम आदमी की ये बेबसी देवेंद्र को अंदर तक चीर गई. उस थाने की सीढ़ियों पर उस दिन सिर्फ एक बिजनेसमैन नहीं, बल्कि एक राजनेता का जन्म हुआ. उन्हें समझ आ गया कि इस सिस्टम में सिर्फ पैसा होना काफी नहीं है, ताकत भी चाहिए.
और आज का दिन देखिए! जिस इंसान को कभी एक ढाबे के बाहर छोटी सी दुकान नहीं मिली थी, आज उसी हाइवे पर उनकी 13 से ज्यादा 'मन्नत हवेली' की ढाबा ब्रांच चल रही हैं. 3000 से ज्यादा लोगों का स्टाफ है. जो हाथ कभी सब्जी तोलते थे, वो आज करोड़ों का साम्राज्य चला रहे हैं. अपनी मेहनत से देवेंद्र कादियान आज सिर्फ एक बिजनेसमैन नहीं, बल्कि एक विधायक भी हैं.
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