- दिल्ली में दशहरे के समय रावण के पुतले से लाल शरबत निकलता था, जिसे विजय का प्रतीक माना जाता था
- मुगल बादशाह शाहजहां के दौर में दशहरा राजशाही संरक्षण प्राप्त त्योहार था और सैनिक इसे धूमधाम से मनाते थे
- शाही परिवार लाल किले के झरोखों से रामलीला देखता था, और बादशाह दशहरे के दिन पुरस्कार भी वितरित करता था
कभी दिल्ली में दशहरे का नजारा आज से बिल्कुल अलग हुआ करता था- रावण के पुतले से खून की तरह लाल शरबत बहता था और अंग्रेजों के दौर में भारतीय सैनिक राम और रावण की सेनाओं का युद्ध लड़ा करते थे. उनके घोड़े मेहंदी के रंग से सजाए जाते थे और उन पर आभूषण लगाए जाते थे.
पुराने समय में रामलीला और दशहरा आज की चमक-दमक से कहीं अलग एक दिलचस्प दुनिया की झलक देते थे.
मुगल बादशाह के यमुना की ओर खुलने वाले झरोखे से लेकर ईस्ट इंडिया कंपनी की छावनियों और आज के विशाल रामलीला मैदान तक, दिल्ली ने रामायण मंचन के कई दौर देखे हैं. वक्त बदला, रामलीला का अंदाज बदला, लेकिन उसे देखने-सुनने और जीने का सिलसिला बना रहा. कभी शाही महल से बादशाह और उनका परिवार रामलीला देखते थे तो आज विशाल पर्दों और एआई की मदद से इसका मंचन होता है.
कैसे होती थी दिल्ली की रामलीला?
इतिहासकार राना सफवी ने न्यूज एजेंसी PTI को बताया, 'जब मुगल बादशाह शाहजहां ने आगरा से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित की और शाहजहानाबाद बसाया, तब दशहरा उन हिंदू त्योहारों में शामिल हो गया, जिन्हें राजशाही संरक्षण प्राप्त था. बादशाह के हिंदू सैनिक दशहरा मनाते थे.'
दिल्ली का वर्णन करने वाली 19वीं सदी की किताबों में शाहजहानाबाद के बाजारों और चौराहों पर दशहरे के दौरान जुटने वाली भीड़ और उत्सव का जिक्र मिलता है.
सफवी के मुताबिक, लोगों के लिए गत्ते और कागज से रावण के विशाल पुतले बनाए जाते थे. इन पुतलों के पेट में मिट्टी का एक बर्तन रखा जाता था, जिसमें लाल शरबत भरा होता था.
भगवान राम का रूप धरे बच्चे रावण के पुतले पर तीर चलाते थे. तीर लगते ही पुतला फट जाता और उसके भीतर रखा शरबत बाहर निकल आता. फिर इसे मिट्टी के कुल्हड़ों में भरकर लोगों के बीच बांटा जाता था.
सफवी ने कहा, 'शरबत का रंग लाल होता था और इसे रावण के खून को दिखाता था. यह शरबत पीना रावण पर विजय का प्रतीक था. इस उत्सव के साथ यमुना किनारे एक बड़ा मेला भी लगता था, जिसमें दूर-दूर से लोग पहुंचते थे.'

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दशहरे पर लगता था बादशाह का दरबार
इतिहासकारों के अनुसार, यमुना और लाल किले के बीच फैले रेतीले बाढ़ क्षेत्र में रामलीला का आयोजन किया जाता था. शाही परिवार लाल किले के 'झरोखों' से रामलीला देखा करता था.
दशहरे के दिन बादशाह को दरबार लगाता और वह दरबारियों और आम लोगों को पुरस्कार देता था. शाम होते ही शाही अस्तबल भी उत्सव का हिस्सा बन जाते थे. शाही अस्तबल की देखरेख करने वाला ‘दरोगा' घोड़ों को खास तौर पर सजवाता था. उनके खुरों पर मेहंदी लगाई जाती, माथे पर आकृतियां बनाई जातीं और उन्हें आभूषणों से सजाया जाता.
राणा सफवी ने अपनी पुस्तक ‘शाहजहानाबाद : द लिविंग सिटी ऑफ ओल्ड दिल्ली' में उल्लेख किया कि इसके बाद इन घोड़ों को लाल किले ले जाया जाता, जहां उनकी परेड होती थी. बादशाह खुद घोड़ों का निरीक्षण करते और सबसे अच्छी तरह सजाए गए घोड़ों के रखवालों को इनाम देते थे.
'बाज' को बादशाह के हाथ पर बैठाया जाता था
स्थानीय परंपराओं के मुताबिक, दशहरे के मौके पर बादशाह के सामने नीलकंठ पक्षी को उड़ाया जाता था. इसे विजय और सफलता का प्रतीक माना जाता था. इसी तरह, एक बाज को बादशाह के हाथ पर बैठाया जाता था. यह भी मुगल परंपरा का हिस्सा था, जिसमें बाज को विजय और सफलता का प्रतीक माना जाता था.
दशहरे की तैयारियां नौ दिन पहले ही नवरात्र के साथ शुरू हो जाती थीं. छोटे-छोटे बर्तनों में जौ बोए जाते थे और अंकुरित हुए उन जौ को दशहरे के दिन टोपी, पगड़ी और कानों पर शुभ प्रतीक के तौर पर धारण किया जाता था.
सफवी ने बताया कि मुगल दरबार की भाषा फारसी थी और इसे बड़ी संख्या में लोग समझते थे. इसलिए तुलसीदास की रामायण के चौपाइयों का फारसी में पाठ किया जाता था. राम, सीता, लक्ष्मण और रावण की वेशभूषा में सजे कलाकारों को रथों पर बैठाकर शहर में उनकी शोभायात्रा निकाली जाती थी और हर दिन नई झांकियां प्रस्तुत की जाती थीं.

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तालाब के किनारे भी होता था कार्यक्रम
रामलीला के मैदान के पास शाहजी के तालाब के किनारे भी एक प्रसंग का मंचन किया जाता था. जब राम के वनवास का दृश्य प्रस्तुत होता, तो एक नाविक राम, सीता और लक्ष्मण को नाव से तालाब के पार ले जाता था. यह तालाब प्रतीकात्मक रूप से गंगा को दर्शाता था.
यह तालाब कई वर्षों तक दिल्ली के इसी भू-दृश्य का हिस्सा बना रहा. 1947 के बाद इसे भर दिया गया और उसकी जगह कमला मार्केट बनाई गई.
लेकिन दिल्ली की रामलीला का कोई एक तय रूप नहीं था.
'सैनिकों की रामलीला'
इतिहासकार स्वप्ना लिडले ने PTI को बताया कि 1857 के विद्रोह से पहले रामलीला एक बिल्कुल अलग जगह वजीराबाद के पास ईस्ट इंडिया कंपनी की छावनी में होती थी.
कंपनी की सेना में शामिल हिंदू और मुस्लिम सैनिक मिलकर राम और रावण के युद्ध का बेहद वास्तविक ढंग से मंचन करते थे. यह किसी नाटकीय प्रस्तुति से ज्यादा वास्तविक सैन्य अभ्यास जैसा होता था, जिसमें सैनिक खुद युद्ध के दृश्यों को दोहराते थे. इसे एक तरह की ‘सैनिकों की रामलीला' कहा जा सकता है.
इतिहासकारों का कहना है कि रामलीला से जुड़ी परंपराएं 19वीं सदी से भी बहुत पहले दिल्ली में प्रचलित रही होंगी.

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क्यों मशहूर है दिल्ली की रामलीला?
लव-कुश रामलीला समिति के अध्यक्ष अर्जुन कुमार ने कहा कि रामलीला सदियों से दिल्ली के सांस्कृतिक जीवन का अहम हिस्सा रही है. उन्होंने इसके लोकप्रिय होने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को दिया, जिनके रामायण वर्णन ने धीरे-धीरे झांकियों और छोटे नाट्य प्रदर्शनों का रूप ले लिया.
कुमार ने बताया कि आज दिल्ली में 600 से ज्यादा रामलीलाओं का आयोजन होता है. यह इस बात का प्रमाण है कि रामलीला शहर के सांस्कृतिक जीवन में कितनी गहराई से रच-बस गई है.
हालांकि, वर्षों के दौरान रामलीला के मंचन का तरीका काफी बदल गया है. एक समय ऐसा भी था जब कलाकारों का चयन भी आज से अलग होता था. महिला पात्रों की भूमिका परंपरागत रूप से पुरुष ही निभाते थे. कुमार ने बताया कि लव कुश रामलीला समिति ने इस परंपरा को सबसे पहले बदला और महिला पात्रों की भूमिकाएं महिलाओं को सौंपनी शुरू कीं.
उन्होंने कहा कि रामलीला के आयोजन और मंचन का तरीका भले ही बदल गया हो, लेकिन इसकी मूल भावना आज भी वही है और इसकी कहानी भी वही है.
शायद यही वजह है कि दिल्ली के बदलते रूपों के बीच भी उसकी रामलीला हर दौर में अपना रास्ता बनाती रही है.
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