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सेना को खराब हथियार मिले तो कंपनियों की खैर नहीं, रक्षा मंत्रालय ने और सख्त किए नियम

रक्षा मंत्रालय ने सेना को हथियार सप्लाई करने वाली कंपनियों के लिए नियम और सख्त कर रही है. अगर कंपनियां भ्रष्टाचार और खराब हथियार सप्लाई करेंगी तो उनपर कई तरह की सख्ती लग सकती है.

सेना को खराब हथियार मिले तो कंपनियों की खैर नहीं, रक्षा मंत्रालय ने और सख्त किए नियम
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह
नई दिल्ली:

रक्षा मंत्रालय ने अब हथियारों की सप्लाई से लेकर उसकी गुणवत्ता को लेकर सख्ती और बढ़ा दी है. अब अगर कोई कंपनी सेना को खराब हथियार देती है,  समय पर सप्लाई नहीं करती हैं और तकनीकी मानकों पर फेल होती है या फिर  भ्रष्टाचार में शामिल पाई जाती है, तो उसे 5 से 10 साल तक के लिए ब्लैक लिस्ट किया जा सकता है. ये नए नियम तुरंत प्रभाव से लागू कर दिए गए हैं.

रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में नए संशोधित दिशानिर्देश जारी किए. इसके साथ ही 2016 के पुराने नियम खत्म कर दिए गए. मंत्रालय का कहना है कि अब रक्षा खरीद में किसी भी तरह की गड़बड़ी या लापरवाही को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. सरकार चाहती है कि सेना को समय पर बेहतर और भरोसेमंद हथियार मिलें, ताकि ऑपरेशनल तैयारी प्रभावित न हो.

इन 4 चीजों पर रहेगा खास ध्यान 
नए नियमों में सिर्फ भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि खराब गुणवत्ता, सप्लाई में देरी और तकनीकी खराबियों को भी गंभीर माना गया है. अगर किसी कंपनी के हथियार या सिस्टम बार-बार खराब होते हैं, लंबे समय तक बंद पड़े रहते हैं या तय प्रदर्शन नहीं कर पाते, तो इसे  “अंडर परफॉर्मेंस” माना जाएगा. ऐसे मामलों में कंपनी पर 5 साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है. रक्षा मंत्रालय का कहना है कि आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहे हैं. अब सेना को एडवांस टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, नेटवर्क आधारित सिस्टम और तेज सप्लाई चेन की जरूरत है. इसलिए पुराने नियम पर्याप्त नहीं थे. नए दिशानिर्देशों का मकसद रक्षा खरीद में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है.

10 साल तक लग सकता है बैन

अगर किसी कंपनी पर रिश्वत, गलत जानकारी देने, इंटीग्रिटी पैक्ट तोड़ने, राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने या विदेशी अदालत में भ्रष्टाचार साबित होने जैसे आरोप सही पाए जाते हैं, तो उस पर अधिकतम 10 साल तक का बैन लगाया जा सकता है. पहले इस तरह की कार्रवाई के लिए स्पष्ट समय सीमा तय नहीं थी.

नए नियमों में “सस्पेंशन” और “डिबारमेंट” को अलग-अलग रखा गया है. जांच शुरू होने या एफआईआर दर्ज होने पर कंपनी को अस्थायी रूप से सस्पेंड किया जा सकता है. इस दौरान कंपनी नए टेंडर में हिस्सा नहीं ले पाएगी. वहीं डिबारमेंट लंबी अवधि का प्रतिबंध होगा. इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सिर्फ मुख्य कंपनी ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी सहयोगी कंपनियां, जॉइंट वेंचर और मर्जर के बाद बनी नई यूनिट्स भी कार्रवाई के दायरे में आएंगी. पहले कई कंपनियां नया नाम या नई यूनिट बनाकर फिर से टेंडर में शामिल हो जाती थीं, लेकिन अब ऐसा करना आसान नहीं होगा.

भारी आर्थिक दंड भी लगेगा 

नए नियमों में भारी आर्थिक दंड का भी प्रावधान किया गया है. अगर कोई कंपनी नियम तोड़ती है, तो उसकी बैंक गारंटी और जमा राशि जब्त की जा सकती है. जरूरत पड़ने पर पहले दिया गया भुगतान ब्याज समेत वापस लिया जाएगा. हालांकि सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कुछ छूट भी रखी है. अगर किसी हथियार या तकनीक का दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं है, तो विशेष अनुमति के साथ उसी कंपनी से स्पेयर पार्ट्स या मेंटेनेंस का काम जारी रखा जा सकता है.

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियमों के बाद रक्षा कंपनियों पर दबाव बढ़ेगा. अब सिर्फ कम कीमत पर टेंडर जीतना काफी नहीं होगा. कंपनियों को समय पर डिलीवरी, बेहतर गुणवत्ता और मजबूत सर्विस सपोर्ट भी देना होगा. सरकार का मानना है कि इससे रक्षा खरीद प्रक्रिया ज्यादा साफ, जवाबदेह और भरोसेमंद बनेगी. रक्षा मंत्रालय ने इसे ट्रांसपरेंसी, रिस्पांसबिलिटी और मोरलिटी के दिशा में बड़ा कदम बताया हैं.

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