कांग्रेस ने 2023 में कर्नाटक में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी. लोगों ने बदलाव और स्थिर सरकार के लिए वोट दिया था. लेकिन चुनाव के बाद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच सत्ता को लेकर खींचतान शुरू हो गई. यह अंदरूनी संघर्ष करीब तीन साल से लगातार चल रहा है. अब कर्नाटक में फिर से राजनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका है. ऐसा ही विवाद केरल में भी देखने को मिल सकता है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस, लेफ्ट को हराकर इतनी बड़ी जीत हासिल करने के बाद केरल में भी वैसी ही स्थिति पैदा करने जा रही है?
केरल में कांग्रेस की बड़ी जीत
केरल विधानसभा की 140 में से 102 सीटें कांग्रेस के नेतृ्त्व वाले यूडीएफ ने जीती हैं. यूडीएफ ने मध्य केरल और त्रावणकोर में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए लेफ्ट के पारंपरिक गढ़ में बड़ी सेंध लगाई है. यूडीएफ की यह जीत लोगों के बदलाव और राजनीतिक स्थिरता के स्पष्ट जनादेश के रूप में देखी जा रही है. चुनाव प्रचार के दौरान हर जगह एक ही सवाल पूछा जा रहा था कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा? विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने पूरे केरल में यात्रा निकालकर चुनाव अभियान की अगुवाई की. उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा भी जताई. उन्हें केरल में कांग्रेस का सबसे मजबूत जनाधार वाला नेता माना जाता है.
रमेश चेन्निथला को चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी दी गई थी. वह पार्टी के पुराने और भरोसेमंद नेता माने जाते हैं. उम्र और अनुभव के मामले में वे काफी वरिष्ठ हैं, लेकिन अब उनका राजनीतिक प्रभाव पहले जैसा नहीं बचा है. जब दोनों नेताओं से पूछा गया कि पार्टी का मुख्यमंत्री चेहरा कौन होगा, तो दोनों ने साफ कहा कि इसका फैसला 'हाईकमान' करेगा. हालांकि दोनों ने मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा का खुलकर इजहार किया है.
VIDEO | Kerala: Posters emerge near Wayanad district Congress office warning Rahul Gandhi and Priyanka Gandhi Vadra of losing further polls if KC Venugopal is nominated for Kerala CM post.
— Press Trust of India (@PTI_News) May 13, 2026
(Full video available on PTI Videos - https://t.co/n147TvrpG7) pic.twitter.com/5jiNqy54Hr
राहुल गांधी के करीबी और अलाप्पुझा से लोकसभा सांसद केसी वेणुगोपाल भी पार्टी में एक बड़ा शक्ति केंद्र माने जाते हैं. मुख्यमंत्री पद को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने भी सीधा जवाब देने से बचने की कोशिश की. इससे साफ था कि वे भी इस दौड़ में शामिल हैं.
केरल में कांग्रेस का असमंजस क्या है
कांग्रेस ने अपने इस असमंजस को यह कहकर सही ठहराया कि पार्टी में कई प्रतिभाशाली नेता हैं.राहुल गांधी ने तिरुवनंतपुरम में यहां तक कहा था कि ये सभी नेता अलग-अलग अच्छा नाचते हैं,अब इन्हें साथ में नाचना सीखना होगा. लेकिन साथ में काम करना सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं होता, बल्कि जनता के जनादेश का सम्मान करते हुए सरकार चलाना भी उतना ही जरूरी है. पार्टी नेतृत्व दो राय में नहीं रह सकता. उसे साफ और निर्णायक फैसला लेना होगा, जोखिम उठाना होगा और एक नेता के पीछे मजबूती से खड़ा होना होगा. बाकी सभी नेताओं को फिर उसी फैसले के साथ चलना पड़ेगा.
कर्नाटक में नेतृत्व को लेकर बनी उलझन की वजह से शासन व्यवस्था काफी प्रभावित हुई है. वहां न तो मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ और न प्रशासन की समीक्षा हुई और न ही भविष्य की कोई स्पष्ट योजना सामने आई, क्योंकि पार्टी ने डीके शिवकुमार को लंबे समय तक इंतजार में रखा. डीके शिवकुमार 2023 में पार्टी की जीत के बड़े कारणों में से एक थे, लेकिन उन्हें उनके योगदान का फल अब तक नहीं मिला.
अब कर्नाटक में स्थिति संभालने में काफी देर हो चुकी है और काफी नुकसान हो चुका है. लेकिन यह ज़रूरी है कि केरल में ऐसी स्थिति पैदा न होने पाए. मुख्यमंत्री पद को बारी-बारी से बांटने का फॉर्मूला अच्छा नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे प्रशासन में रुकावट और भ्रम पैदा होता है. यह केवल सत्ता संघर्ष को टालता है, उसे खत्म नहीं करता है. कर्नाटक में डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया अलग-अलग जातीय और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं. डीके शिवकुमार ओबीसी-वोक्कालिगा समुदाय के प्रभावशाली नेता हैं, जबकि सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से आते हैं और 'अहिंदा' नाम के बड़े सामाजिक गठबंधन का प्रतिनिधित्व करते हैं.
केरल में कांग्रेस की ओर से सीएम पद के दावेदार कौन कौन है
इसके उलट, केरल में मुख्यमंत्री पद के तीनों प्रमुख दावेदार नायर समुदाय से आते हैं. इसलिए कहा जा सकता है कि केरल में फैसला लेना अपेक्षाकृत आसान है. वहां केवल पार्टी नेतृत्व की स्पष्ट और मजबूत निर्णय क्षमता की जरूरत है. वीडी सतीशन इस समय सबसे लोकप्रिय विकल्प के तौर पर दिखाई देते हैं.साल 2021 में रमेश चेन्निथला ने चुनाव की अगुवाई की थी, लेकिन पार्टी हार गई थी. वहीं 2026 में वीडी सतीशन के नेतृत्व में पार्टी को जीत मिली है. उन्हें सबसे बड़े सहयोगी दल इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और वैचारिक समूहों का भी समर्थन हासिल है. हालांकि, सतीशन का स्वभाव काफी मजबूत और आक्रामक माना जाता है. अगर वे मुख्यमंत्री बनते हैं, तो संभव है कि वे दूसरों के दबाव में काम न करें. वहीं दूसरी ओर, अगर उन्हें यह पद नहीं मिलता है तो उन्हें मनाना भी आसान नहीं होगा. वे जमीनी स्तर के लड़ाकू नेता माने जाते हैं और खुलकर अपनी बात रखने वाले हैं.वहीं रमेश चेन्निथला अपेक्षाकृत शांत स्वभाव के पुराने और भरोसेमंद नेता हैं, लेकिन विधायकों पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत नहीं मानी जाती है. इसी तरह से केसी वेणुगोपाल पार्टी हाईकमान के काफी करीबी और भरोसेमंद हैं. उनकी अपनी ताकत है और विधायकों के एक वर्ग के साथ-साथ कांग्रेस नेतृत्व में भी उनका प्रभाव है.
इस समय विधायक इन तीन बड़े नेताओं के बीच की शक्ति-संतुलन की राजनीति में फंसे हुए हैं. इसलिए जरूरी है कि नेतृत्व को लेकर साफ और स्पष्ट फैसला लिया जाए. चूंकि केसी वेणुगोपाल और वीडी सतीशन दोनों ही मजबूत दावेदार हैं और दोनों के पास अपने-अपने समर्थक विधायक हैं, इसलिए ऐसा फैसला होना चाहिए जिसमें दोनों की सहमति साफ तौर पर शामिल हो, वरना पार्टी में अस्थिरता और अंदरूनी संघर्ष बढ़ सकता है. केरल इस समय कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ माना जा रहा है. पार्टी ने फिलहाल अंदरूनी लड़ाई को रोककर बड़ी जीत हासिल की है, लेकिन अब जरूरी है कि इस जनादेश का सम्मान किया जाए और कर्नाटक जैसी स्थिति पैदा न होने दी जाए.
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