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कर्नल सोफिया विवाद: विजय शाह पर मुकदमा क्यों नहीं चाहती MP सरकार ? सुप्रीम कोर्ट में देगी 5 दलीलें

कर्नल सोफिया कुरैशी पर टिप्पणी को लेकर विवादों में घिरे मंत्री विजय शाह के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी देने से मध्य प्रदेश सरकार ने इनकार कर दिया है. अब सरकार सुप्रीम कोर्ट में 5 कानूनी दलीलों के जरिए अपने फैसले का बचाव करेगी. जानिए कानूनी तर्कों के पीछे का राजनीतिक गणित भी.

कर्नल सोफिया विवाद: विजय शाह पर मुकदमा क्यों नहीं चाहती MP सरकार ? सुप्रीम कोर्ट में देगी 5 दलीलें

कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई टिप्पणी ने विजय शाह को कानूनी संकट में डाल दिया, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार अब भी उनके साथ खड़ी दिखाई दे रही है. सरकार सुप्रीम कोर्ट में पांच ऐसी दलीलें रखने की तैयारी में है, जिनके आधार पर वह साबित करना चाहती है कि मंत्री के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने की जरूरत नहीं थी. लेकिन इस पूरे विवाद की असली कहानी कोर्टरूम से बाहर शुरू होती है, जहां विजय शाह सिर्फ एक मंत्री नहीं, बल्कि बीजेपी के सबसे प्रभावशाली आदिवासी चेहरों में से एक माने जाते हैं.

सरकार की 5 बड़ी दलीलें क्या हैं?

मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट को बताने की तैयारी में है कि विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने लायक परिस्थितियां नहीं थीं.नीचे जानते हैं कि सरकार की 5 दलीलें क्या होंगी.

  1. सरकार का कहना है कि विजय शाह के बयान के बाद किसी व्यक्ति ने उनके खिलाफ व्यक्तिगत शिकायत दर्ज नहीं कराई. सरकार अदालत को यह भी बताने की तैयारी में है कि मंत्री ने अपने बयान में कर्नल सोफिया कुरैशी का नाम नहीं लिया था और उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति का अपमान करना नहीं था.
  2. सरकार अपनी दलीलों में विजय शाह की माफियों का भी जिक्र करेगी. उसका कहना है कि मंत्री ने तीन बार सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और लिखित रूप से भी खेद जताया. ऐसे में अभियोजन की मंजूरी देने की जरूरत नहीं बनती.
  3. राज्य सरकार इस पूरे मामले को "मानवीय भूल" बताने की तैयारी में है. उसका तर्क है कि जानबूझकर किसी को निशाना बनाने का इरादा नहीं था और माफी के बाद आपराधिक मुकदमे का आधार कमजोर पड़ जाता है.
  4. सरकार यह भी कहेगी कि मंत्री के बयान से न तो सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ा और न ही ऐसा करने की कोई मंशा थी.

कैबिनेट ने क्यों नहीं दी मंजूरी?

25 अगस्त को मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी नहीं देने का फैसला किया था. बाद में राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने भी इस निर्णय को मंजूरी दे दी.विजय शाह सिर्फ मोहन यादव सरकार के एक मंत्री नहीं हैं. वे मध्य प्रदेश बीजेपी के उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने चार दशक तक लगातार अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखा है. 1990 से अब तक वे लगातार आठ विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं. उमा भारती सरकार से लेकर मौजूदा मोहन यादव सरकार तक, वे सत्ता के केंद्र में बने रहे हैं.मंत्री रहते हुए उन्होंने आदिवासी कल्याण, वन, स्कूल शिक्षा, पर्यटन, संस्कृति और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले हैं. लेकिन उनकी असली राजनीतिक ताकत मंत्रालयों से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक आधार से आती है.

आदिवासी राजनीति का बड़ा चेहरा

विजय शाह मकड़ाई राजघराने से जुड़े हैं और राजगोंड समुदाय से आते हैं. उन्हें मध्य प्रदेश में बीजेपी के सबसे प्रभावशाली आदिवासी चेहरों में गिना जाता है. खासतौर पर गोंड समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है.
मध्य प्रदेश की करीब 22 फीसदी आबादी अनुसूचित जनजाति वर्ग से आती है. राज्य में 47 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि कई अन्य सीटों पर भी आदिवासी मतदाता चुनावी नतीजे तय करने की स्थिति में होते हैं. ऐसे में विजय शाह जैसे प्रभावशाली नेता के खिलाफ कार्रवाई सिर्फ कानूनी फैसला नहीं, बल्कि राजनीतिक जोखिम भी बन सकता है.यही वजह है कि बीजेपी के लिए यह मामला सिर्फ एक मंत्री को बचाने या न बचाने का नहीं, बल्कि एक बड़े आदिवासी नेतृत्व और उसके राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी देखा जा रहा है.

पहले भी विवादों में घिर चुके हैं विजय शाह

यह पहला मौका नहीं है जब विजय शाह विवादों में आए हों. 2013 में महिलाओं को लेकर की गई एक विवादित टिप्पणी के बाद उन्हें मंत्री पद से हटना पड़ा था. हालांकि उनका राजनीतिक वनवास ज्यादा लंबा नहीं चला और करीब चार महीने बाद वे फिर सरकार में लौट आए.यह घटनाक्रम बताता है कि पार्टी अतीत में भी विजय शाह के मामलों को बेहद सावधानी से संभालती रही है.

सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?

विवाद की शुरुआत मई 2025 में हुई, जब विजय शाह का एक वीडियो सामने आया. वीडियो में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आईं सेना अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के संदर्भ में उनकी टिप्पणी को लेकर विवाद खड़ा हो गया.मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले पर कड़ी टिप्पणी की और पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश दिया. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने राज्य सरकार की ओर से गठित विशेष जांच दल (SIT) से रिपोर्ट मांगी. विजय शाह ने विवाद बढ़ने के बाद कई बार माफी मांगी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी माफी को लेकर सवाल उठाए और पूछा कि क्या केवल माफी इस तरह के बयान के प्रभाव को खत्म कर सकती है.
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