वैज्ञानिकों के रिसर्च में पाया गया है कि सेंट्रल हिमालय में बद्रीनाथ धाम में बसी टाउनशिप के पास लटकते हुए ग्लेशियर यानी हैंगिंग ग्लेशियर से आने वाले समय में खतरा हो सकता है. इसकी संभावनाओं पर रिपोर्ट भी तैयार की गई है. उनके रिसर्च रिपोर्ट में संभावनाएं जताई गई है कि अगर एवलांच आता है तो बद्रीनाथ क्षेत्र की टाउनशिप में किस तरह की तबाही हो सकती है. उन्होंने अपनी इस रिसर्च रिपोर्ट में कई तरह के डाटा और मॉडर्न मॉडल से रिसर्च की है. सैटेलाइट डाटा और नई टेक्नोलॉजी के मॉडल से बद्रीनाथ धाम के पास तीन महत्वपूर्ण हैंगिंग ग्लेशियरों को लेकर अपनी रिपोर्ट तैयार की है. वरिष्ठ वैज्ञानिक और ग्लिसरोलॉजिस्ट डॉ डीपी डोभाल ने एनडीटीवी को जानकारी दी कि ये पूरी रिपोर्ट संभावनाओं पर बनाई गई है और अगर ऐसी संभावना है, तो वैज्ञानिकों को बद्रीनाथ क्षेत्र में जाकर ग्राउंड सर्वे करना चाहिए.
बद्रीनाथ धाम हिंदुओं का सबसे पवित्र धाम है, ये ना सिर्फ उत्तराखंड के चारों धामों में सबसे प्रमुख है, बल्कि भारत के चार धामों में भी सबसे महत्वपूर्ण है. बद्रीनाथ धाम की ऊंचाई 3000 मीटर से ज्यादा है. इसके आसपास नीलकंठ पर्वत पर ग्लेशियर, कंचनजंगा पर कुबेर ग्लेशियर, अलकनंदा ग्लेशियर और सतोपंथ ग्लेशियर मौजूद है. इन सभी की दूरी 10 से 20 किलोमीटर से ज्यादा की है.
बद्रीनाथ धाम उच्च हिमालय क्षेत्र में मौजूद होने की वजह से यहां पर इसका सीधा असर पड़ता है. हाल ही में एक रिसर्च में संभावना जताई गई है कि अगर एवलांच आता है तो बद्रीनाथ क्षेत्र की टाउनशिप में किस तरह की तबाही हो सकती है. वैज्ञानिकों ने अपनी इस रिसर्च रिपोर्ट में कई तरह के डाटा और मॉडर्न मॉडल से रिसर्च की है. वैज्ञानिकों ने सैटेलाइट डाटा और नई टेक्नोलॉजी के मॉडल से बद्रीनाथ धाम के पास तीन महत्वपूर्ण हैंगिंग ग्लेशियर को लेकर अपनी रिपोर्ट तैयार की है.

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन जियोलॉजी के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक और ग्लिसरोलॉजिस्ट डॉ डीपी डोभाल ने बताया कि पिछले लंबे समय से जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालय के स्नो कर एरिया कम होते जा रहे हैं, यानी हिमालय पर पड़ने वाली बर्फ कम पड़ रही है और जो बर्फ पड़ भी रही है उसको फ्रीजिंग का समय नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि न सिर्फ वायुमंडल का तापमान बढ़ा हुआ है, बल्कि धरती के सरफेस का भी तापमान बढ़ा हुआ है.
डॉ डोभाल कहते हैं कि जहां बर्फ पड़ती थी अब वहां बारिश हो रही है. उनके मुताबिक ये रिपोर्ट संभावनाओं पर तैयार की गई है इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर इस तरह से हैंगिंग ग्लेशियर टूटते हैं और उनसे एवलांच आता है तो इस तरीके का नुकसान होगा, लेकिन पिछले लंबे समय से बर्फ नहीं पड़ रही है और स्नो कर एरिया बहुत कम हो गया है, तो ऐसे में हैंगिंग ग्लेशियर का बनना और उनका एवलांच के रूप में बद्रीनाथ टाउनशिप की तरफ आना, ये अभी कहना और संभावना जताना जल्दबाजी होगी.
उन्होंने इसके पीछे का कारण बताया कि बद्रीनाथ धाम के ठीक पीछे नीलकंठ पर्वत है और वहां पर मौजूद ग्लेशियर लगभग 8 से 10 किलोमीटर की दूरी पर हैं. कंचनजंगा पर मौजूद कुबेर ग्लेशियर भी बद्रीनाथ टाउनशिप से काफी दूर हैं और जो हर साल यात्रा या फिर यात्रा के बाद नीचे एवलांच आता रहा है, उससे टाउनशिप को कोई खतरा नहीं है. तीसरा बद्रीनाथ धाम से करीब 15 किलोमीटर दूरी पर अलकापुरी ग्लेशियर है.
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग का हिमालय पर तेजी से असर पड़ रहा है. खासकर हिमालय पर मौजूद ग्लेशियर पर इसका असर पड़ रहा है, जिससे पूरे इकोलॉजिकल सिस्टम को धीरे-धीरे नुकसान हो रहा है. हिमालय पर मौजूद हजारों ग्लेशियर मानव समाज को पीने के लिए पानी और खेती के लिए सिंचाई का पानी देते हैं. इसके अलावा पेड़-पौधों और करोड़ों जीव जंतुओं को भी पानी उपलब्ध होता है. पिछले कुछ दशकों में इंसान का बढ़ता विकास और हिमालय पर इंसानों की पहुंच ने हिमालय की सेहत खराब की है.

हिमालय क्षेत्र में तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, ग्लोबल वार्मिंग का भी असर पड़ रहा है और इसकी वजह से धार्मिक और सामरिक रूप से कई ऐसे हिमालय में मौजूद सभी क्षेत्रों पर असर दिख रहा है. वैज्ञानिकों की एक रिसर्च में इस बात को पाया गया कि हिमालय के ग्लेशियर किस तरह आने वाले समय में धार्मिक क्षेत्र, पर्यटन क्षेत्र और सामरिक क्षेत्र पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं. हालांकि इस पूरी रिपोर्ट में संभावना जताई गई है, यानी रिपोर्ट में यह पाया गया है कि अगर आने वाले समय में इस तरह से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन और तेजी से होता है तो हिमालय के ग्लेशियर खासकर हैंगिंग ग्लेशियर कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं.
वैज्ञानिक रिसर्च में ये भी संभावना जताई गई है कि अगर ग्लेशियर खासकर हैंगिंग ग्लेशियर, नीचे एडवांस रूप में आते हैं तो उनकी स्पीड कितनी होगी, उसका प्रभाव कितना होगा, ग्लेशियर के नीचे आने के बहाव का आकलन करने के लिए 'रैपिड मास मूवमेंट सिमुलेशन' (RAMMS) मॉडल का उपयोग किया गया है. इस मॉडल में कम, मध्यम और उच्च गतिशीलता की स्थितियों के आधार पर सिमुलेशन किया गया, जिससे पता चला कि उच्च गतिशीलता की स्थिति में यह खतरा सबसे घातक हो सकता है. दरअसल अप्रैल 2026 में एक रिसर्च आई थी जिसमें अलकनंदा बेसिन में हैंगिंग ग्लेशियर को लेकर रिपोर्ट तैयार की गई थी.
इस रिसर्च में 219 हैंगिंग ग्लेशियर की पहचान की गई थी, जो 7 1.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. अब क्योंकि बद्रीनाथ धाम अलकनंदा नदी के किनारे है और लगभग बद्रीनाथ धाम से लगभग 20 से 25 किलोमीटर दूर पर अलकापुरी ग्लेशियर है, जहां से अलकनंदा नदी निकलती है और यही वजह है कि इस रिपोर्ट में बद्रीनाथ धाम और उसके आसपास की टाउनशिप में हैंगिंग ग्लेशियर के संभावित भविष्य में होने वाले खतरों को लेकर रिपोर्ट तैयार की गई है. रिपोर्ट तैयार करने में डीआरडीओ, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैंब्रिज और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस बैंगलोर की तरफ से वैज्ञानिकों ने इस रिपोर्ट को तैयार किया है.

एनडीटीवी से खास बातचीत में वरिष्ठ वैज्ञानिक और ग्लेसियोलॉजिस्ट डॉ अनिल वी कुलकर्णी ने बताया कि इस रिपोर्ट में हमने वैज्ञानिकों के साथ बद्रीनाथ धाम के टाउनशिप पर हैंगिंग ग्लेशियर के खतरे को लेकर रिपोर्ट तैयार की है. उन्होंने बताया कि लगातार जलवायु परिवर्तन हो रहा है और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से इसका सीधा असर हिमालय के ग्लेशियर पर पड़ रहा है और खासकर हिमालय पर हैंगिंग ग्लेशियर पर इसका सीधा प्रभाव पड़ रहा है.
हैंगिंग ग्लेशियर अगर तेजी से नीचे की ओर सरकते हैं तो बड़े तौर पर नीचे आबादी वाले क्षेत्रों में नुकसान पहुंचा सकते हैं. डॉ कुलकर्णी ने बताया कि इस रिसर्च में हैंगिंग ग्लेशियर किस रूप में पहाड़ों पर लटके हुए हैं, उनकी ढलान की डिग्री कितनी है, ऊंचाई कितनी है, इन हैंगिंग ग्लेशियर में बर्फ का घनत्व कितना है, इसी को देखते हुए हमने पूरी रिपोर्ट तैयार की है. उन्होंने बताया कि तीन साइट से संभावित खतरों को दर्शाया गया है, जिसमें साइट 1, साइट 2 और साइट 3 दिखाई गई है, जो बद्रीनाथ टाउनशिप के लिए भविष्य में आने वाले गंभीर खतरों को दर्शा रही है.
लेकिन रिपोर्ट में साइट 2 बद्रीनाथ टाउनशिप के लिए सबसे बड़ा और सबसे गंभीर खतरा पैदा करने वाला बताया गया है. साइट-2 में मौजूद ग्लेशियर का संभावित रिलीज वॉल्यूम लगभग 5.89 \times 10^6 \text{ m}^3 है. इसकी सतह का ढलान बहुत तेज (34.57^\circ) और बेड का ढलान 30.64^\circ है, जिसके कारण यहां से बर्फ के टूटने की संभावना सबसे अधिक है. यदि यहां एवलांच होता है तो इससे लगभग 398 इमारतें, 2.66 किलोमीटर सड़क मार्ग, 3.87 हेक्टेयर कृषि भूमि और 15.57 हेक्टेयर वन क्षेत्र सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं. इसके अलावा हेलीपैड और पार्किंग क्षेत्र जैसी महत्वपूर्ण बुनियादी संरचनाएं भी खतरे की जद में हैं.
वहीं रिपोर्ट में साइट-1 के प्रभाव में आने वाले क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा ग्लेशियर है, जिसका आयतन लगभग 1.18 \times 10^8 \text{ m}^3 है. इसके एवलांच क्षेत्र में लगभग 317 इमारतें, 49.96 हेक्टेयर कृषि भूमि, 10.37 हेक्टेयर जंगल, 1.76 किमी सड़क और एक पार्किंग जोन प्रभावित हो सकते हैं.

इसी तरह से साइट-3 की स्थिति में यह क्षेत्र का आकार में काफी छोटा है (0.06 \text{ km}^2), इसलिए इससे फिलहाल बहुत कम जोखिम या न्यूनतम प्रभाव का अनुमान लगाया गया है.
रिपोर्ट में पाया गया है कि लगातार तापमान बढ़ रहा है, तापमान बढ़ने से ग्लेशियर के बाहर और अंदर इसका सीधा प्रभाव पड़ रहा है, जिसके कारण वह कमजोर हो रहे हैं. गर्मियों में पड़ने वाली बर्फ से निकलने वाला पानी सीधा ग्लेशियर पर प्रभाव डाल रहा है. रिपोर्ट में सलाह भी दी गई है कि उस क्षेत्र में नए निर्माण और बस्तियों पर रोक लगाई जानी चाहिए, जहां सबसे ज्यादा खतरा है या फिर आने वाले समय में खतरा हो सकता है. इस पूरे क्षेत्र में अर्ली बोलिंग सिस्टम लगाया जाना चाहिए और ग्लेशियर तथा मौसम की रियल टाइम जानकारी मिले, उसके लिए आधुनिक अलार्म सिस्टम लगाना चाहिए और उस क्षेत्र में आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए.
वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ डीपी डोभाल ने एनडीटीवी को जानकारी दी कि ये पूरी रिपोर्ट संभावनाओं पर बताई गई है और अगर ऐसी संभावनाएं है तो वैज्ञानिकों को उस जगह पर जाकर यानी बद्रीनाथ क्षेत्र में जाकर ग्राउंड सर्वे करना चाहिए. वो कहते हैं कि सेटेलाइट से मिलने वाला डाटा या फिर नए मॉडल टेक्नोलॉजी से रिसर्च में हमें मदद जरूर मिलती है, लेकिन जब जनहित और सीधा मानव समाज पर खतरे की बात होती है तो ऐसे में ग्राउंड सर्वे होना चाहिए, ताकि हमें उस क्षेत्र में पिछले सालों के तापमान का डाटा, उस इलाके में कितनी बर्फबारी हुई है, या कितनी बर्फबारी कम हुई है, इसका डेटा, इसके अलावा वहां बारिश कितनी हुई है, उसका डेटा होना जरूरी है. इसके अलावा डॉ डोभाल कहते हैं ये भी देखना चाहिए कि वहां किसी संख्या का कंस्ट्रक्शन हो रहा है और आने वाले समय में वहां पर श्रद्धालु या फिर पर्यटकों की कितनी भीड़ हो सकती है.
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