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गुफा में रहते थे, पेट भरने के लिए खेतों में करते थे मजदूरी, शी जिनपिंग की ये कहानी हैरान करती है

Xi Jinping India Brics: ब्रिक्स में भाग लेने के लिए शी जिनपिंग नई दिल्ली पहुंच चुके हैं. ऐसे में चीनी राष्ट्रपति की वो कहानी, जिसमें वो गुफा में रहते थे और मजदूरों की तरह गांव में काम करते थे. पढ़िए.

गुफा में रहते थे, पेट भरने के लिए खेतों में करते थे मजदूरी, शी जिनपिंग की ये कहानी हैरान करती है
राष्ट्रपति बनने से पहले जिनपिंग गुफा में रहते थे.

ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नई दिल्ली पहुंच चुके हैं. यह बीते साल और गलवान झड़प के बाद पहला भारत का दौरा है शी जिनपिंग की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है. गरीबी में पलकर, गुफाओं में रहकर जीवन जीने वाले जिनपिंग कैसे चीन के राष्ट्रपति पद तक पहुंचे. इसकी कहानी भी दिलचस्प है. आइए जानते हैं कि शी जिनपिंग गुफाओं में क्यों रहते थे?

चारों तरफ मिट्टी के बीहड़ पहाड़ और पहाड़ों को काटकर बनाई गई आदिम जमाने जैसी कच्ची गुफाएं. पहली नजर में देखने पर यकीन नहीं होता, लेकिन यही वो बंजर जमीन है जिसने दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक, शी जिनपिंग के पूरे सियासी सफर की नींव रखी थी. 

China president Xi Jinping Early Life Cave Liangjiahe struggle story Journey to Power

करीब आधी सदी पहले की बात है. चीन में 'सांस्कृतिक क्रांति' का दौर था और शहरों के नौजवानों को गांवों में मजदूरी के लिए भेजा जा रहा था. तभी एक दुबला-पतला, करीब 15-16 साल का लड़का इस लियांगजियाहे (Liangjiahe) गांव पहुंचा. वो कोई आम लड़का नहीं था- उसका परिवार राजनीतिक रंजिशों का शिकार होकर जिल्लत झेल रहा था, और वो खुद एक तरह से समाज से बेदखल कर दिया गया था. लेकिन इस लड़के की आंखों में डर नहीं, गजब का हौसला था. 

गुफा में दीये की रोशनी में पढ़ाई

गांव की ही एक बुजुर्ग महिला लियू जिनलियान बताती हैं कि जब वो शी जिनपिंग के आने के कुछ ही महीनों बाद यहां पहुंचीं, तो उन्हें पहली नजर में ही लग गया था कि यह लड़का भीड़ से जुदा है. स्वभाव से बेहद मिलनसार, जमीन से जुड़ा और सबसे बड़ी बात. तकलीफों को चुपचाप पी जाने का हुनर रखने वाला.  

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उस दौर में यहां जिंदगी किसी इम्तिहान से कम नहीं थी. पथरीली जमीन पर फावड़ा चलाना, हाड़-तोड़ मेहनत करना और किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना. उस पर भी शी जिनपिंग जब इस गांव में आए, तो उनके हाथ में कपड़ों से ज्यादा किताबों से भरा एक भारी सूटकेस था. दिनभर खेतों में पसीना बहाने के बाद, गुफा के मद्धिम दीये में वो इन्हीं किताबों को पढ़ते थे. इन्हीं पन्नों ने उनकी सोच को आजाद किया. आज भी उन तीन गुफाओं में से एक में उनकी वो किताबें महफूज रखी हैं, जहां कभी वो रहा करते थे.

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भीड़ से अलग थे जिनपिंग, जीत लिया पूरे गांव का दिल

वक्त बदला, हालात बदले. जिस लड़के को हालात ने हाशिए पर धकेल दिया था, उसने अपनी मेहनत से पूरे गांव का दिल जीत लिया. उसने गांव के साथ मिलकर बांध बनवाया, पीने के पानी के लिए कुआं खुदवाया और पूरे समुदाय के लिए मीथेन यानी गोबर गैस का प्लांट तैयार करवाया. ये वही दौर था जब शी जिनपिंग ने समझा कि आम इंसान का असली दर्द क्या होता है. यही वो जगह है जहां से उनकी गरीबी के खिलाफ जंग की सोच पैदा हुई.

आज उसी लियांगजियाहे गांव की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. अब यह कोई गुमनाम गांव नहीं, बल्कि एक बड़ा पर्यटन स्थल बन चुका है. रोज हजारों लोग यह देखने खिंचे चले आते हैं कि आखिर किस मिट्टी ने आज के चीनी राष्ट्रपति को गढ़ा है.  

बन गया टूरिस्ट स्पॉट

लियू जिनलियान आज भी उसी गांव की एक छोटी सी गुफा में दुकान चलाती हैं. किताबें, जूते और खाने-पीने का सामान बेचती हैं. वो बड़े फख्र से एक तस्वीर दिखाती हैं. जब शी जिनपिंग राष्ट्रपति बनने के बाद पुराने दिनों को याद करने यहां आए, तो लियू ने अपने पुराने साथी को जूतों की एक जोड़ी तोहफे में देनी चाही. लेकिन जिनपिंग अड़ गए कि वो बिना पैसे दिए जूते नहीं लेंगे.

गांव के लोग आज भी मानते हैं कि शी जिनपिंग की सबसे बड़ी ताकत है. सोच-समझकर फैसला लेना, नपे-तुले शब्दों में बात करना और जो ठान लेना, उसे पूरा करके ही दम लेना. यह सफर सिर्फ एक इंसान का नहीं, बल्कि अभाव से निकलकर शिखर तक पहुंचने की वो कहानी है, जो आज भी वहां आने वाले हर शख्स को हैरान कर देती है.  

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