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गरीबी, भुखमरी और कड़ाके की ठंड... पुतिन के KGB जासूस से रूस के राष्ट्रपति बनने तक की कहानी

Vladimir putin biography in hindi: ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन नई दिल्ली पहुंच चुके हैं. आइए जानें, कड़ाके की ठंड और भुखमरी के बीच लेनिनग्राद की तंग गलियों से निकलकर क्रेमलिन के सिंहासन तक पहुंचने की उनकी दास्तान.

गुमनामी के घने अंधेरों से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े मुल्क की सत्ता पर एकछत्र राज करना... यह दास्तान है व्लादिमीर पुतिन की. एक ऐसा शख्स, जिसने तंगहाली और अभावों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और वक्त के हर पासे को अपने हक में पलटना सीख लिया. साल 1952, लेनिनग्राद शहर. दूसरा विश्व युद्ध खत्म तो हो चुका था, लेकिन शहर भूख और बर्बादी के जख्मों से कराह रहा था. भुखमरी के उस दौर में पुतिन का परिवार चूहों से बजबजाते एक बेहद संकरे मकान में दो अन्य परिवारों के साथ रहने को मजबूर था. न गर्म पानी की सुविधा, न ठीक-ठाक शौचालय और न कड़ाके की ठंड से बचने का कोई जरिया. 

जंग में बुरी तरह जख्मी पिता और फाकों से जूझती मां के साए में पुतिन ने रूसी आंगनों और गलियों में जिंदगी का सबसे बड़ा फलसफा सीखा. 'सड़क पर मुकाबला करके जिंदा कैसे रहा जाता है.' इसी स्ट्रीट-स्मार्ट तेवर ने उन्हें हमेशा एक कदम आगे रहना सिखाया.    

Vladimir Putin Life Story Leningrad Slums to kgb Agent and Kremlin president, Brics summit 2026 in new delhi

जासूसी के दांव-पेंच के बाद राजनीति की सीढ़ियां

1975 में कानून की डिग्री लेते ही पुतिन सोवियत खुफिया एजेंसी KGB में शामिल हो गए. करीब 15 साल तक विदेशी खुफिया मिशनों पर परदे के पीछे से काम किया और लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से रिटायर हुए.

90 के दशक में उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग के डिप्टी मेयर के तौर पर सियासी पारी शुरू की. इसके बाद मॉस्को के सत्ता गलियारे यानी 'क्रेमलिन' में उनकी एंट्री हुई. राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन उनकी काबिलियत से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पहले घरेलू खुफिया एजेंसी (FSB) का प्रमुख बनाया और फिर 1999 में देश का प्रधानमंत्री नियुक्त कर अपना सियासी वारिस चुन लिया. 

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31 दिसंबर 1999: जब तकदीर ने ली करवट

साल 1999 की आखिरी रात येल्तसिन ने अचानक इस्तीफे का ऐलान किया और सत्ता की चाबी पुतिन के हाथों में आ गई.

इसके बाद शुरू हुआ पुतिन युग. सोवियत संघ के बिखराव से टूटे देश की बिखरी अर्थव्यवस्था को उन्होंने न सिर्फ संभाला, बल्कि रूसी अवाम में 'महाशक्ति' होने का खोया हुआ स्वाभिमान दोबारा जगा दिया. संवैधानिक नियमों को बदलते हुए और भारी बहुमत से चुनाव दर चुनाव जीतकर वे सत्ता के केंद्र में बने रहे. जोसेफ स्टालिन के बाद रूस के इतिहास में इतने लंबे समय तक किसी नेता की सत्ता पर ऐसी फौलादी पकड़ नहीं रही.  

पश्चिमी दबदबे को सीधी चुनौती

सत्ता के शीर्ष पर ढाई दशक पूरे करने के बाद भी पुतिन आज रूस के निर्विवाद नेता हैं. उन्होंने रूसी सेना को फिर से ताकतवर बनाया, अंदरूनी सियासत को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लिया और पश्चिमी देशों की चौधराहट को खुलेआम ललकारा. लेनिनग्राद की तंग गलियों से निकला वो लड़का, आज पूरी दुनिया की भू-राजनीति की दिशा तय कर रहा है. 

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