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पंजाब में 'राजनीतिक टाइम बम' बन गए हैं चन्नी! कांग्रेस की उलझन BJP के लिए कैसे हो सकती है फायदेमंद? Analysis

पंजाब में अगले साल चुनाव हैं और उससे पहले कांग्रेस में फिर गुटबाजी दिखने लगी है. पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी भी नाराज चल रहे हैं. अगर वह कांग्रेस छोड़ते हैं तो इसका फायदा बीजेपी को मिलने की संभावना है.

पंजाब में 'राजनीतिक टाइम बम' बन गए हैं चन्नी! कांग्रेस की उलझन BJP के लिए कैसे हो सकती है फायदेमंद? Analysis
चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में सबसे बड़े दलित चेहरों में से एक हैं.
IANS
नई दिल्ली:

चरणजीत सिंह चन्नी एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि वह पंजाब के सबसे बड़े दलित नेताओं में से एक भी हैं. जब कांग्रेस में अंदरूनी नेतृत्व को लेकर झगड़ा चरम पर पहुंच गया है, तब पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य पर एक बड़ा सवाल मंडरा रहा है और वह यह है कि क्या चन्नी कांग्रेस के लिए एक 'टिक-टिक करते टाइम बम' हैं या गेम बदलने वाले ऐसे नेता हैं, जिनका इंतजार है?

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि चरणजीत सिंह चन्नी और उनका गुट पार्टी आलाकमान से नाराज है क्योंकि मौजूदा PCC प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को बदलने की उनकी मांग पूरी नहीं हुई. राहुल गांधी से मिलने की चन्नी की कोशिश भी नाकाम रही, और पार्टी मामलों के प्रभारी भूपेश बघेल ने गुस्से में कहा, 'पार्टी अध्यक्ष बदलना कोई 'गुड़िया-गुड्डे' का खेल नहीं है.' 

चन्नी ने इस फैसले का विरोध करने के लिए एक और कोशिश भी की. हालांकि, आलाकमान अमरिंदर सिंह राजा वडिंग को ही बनाए रखने पर अड़ा हुआ है, जाहिर है कि वह जाट समुदाय को नाराज नहीं करना चाहते, जो कुल वोटरों का 22 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा है.

कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल से मिलने के बाद साफ तौर पर परेशान दिख रहे चन्नी ने कहा, 'हमने बस अपनी बात रखी क्योंकि हम पंजाब में पार्टी को मजबूत बनाना चाहते हैं. हमारा मकसद किसी को शर्मिंदा करना नहीं है. फैसला लेने का अंतिम अधिकार पार्टी आलाकमान के पास है. राहुल गांधी हमारे नेता हैं, हम उन्हें पसंद करते हैं और हमें उनके साथ ही काम करना है.'

हालांकि, चन्नी के बयान से संकेत मिलता है कि पार्टी आलाकमान ने उन्हें चुप करा दिया है, लेकिन पार्टी में उनके विरोधी इशारा करते हैं कि यह चुप्पी कुछ समय के लिए ही हो सकती है क्योंकि टिकट बंटवारे के समय दरारें और चौड़ी हो सकती हैं.

पाला बदलेंगे चन्नी?

राजनीतिक नजरिए से, पार्टी आलाकमान के साथ चन्नी के गतिरोध को दूसरे खेमे में शामिल करने के मौके के तौर पर देखा जा रहा है, खासकर BJP के लिए. चन्नी का एक वीडियो वायरल होने के तुरंत बाद, जिसमें उन्होंने पार्टी से दलित समुदाय के नेताओं को अलग-अलग स्तरों पर प्रतिनिधित्व देने की मांग की थी, पंजाब BJP प्रमुख केवल सिंह ढिल्लों ने चन्नी को पार्टी में शामिल होने का न्योता दिया. 

केवल सिंह ढिल्लों ने कहा, 'चरणजीत चन्नी जी, एक गर्वित पंजाबी के तौर पर मेरा मानना ​​है कि दलित प्रतिनिधित्व पर आपका रुख नेतृत्व और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को दर्शाता है. बीजेपी पंजाब में आपको सम्मान और हर समुदाय की सेवा करने का सच्चा मौका मिलेगा. आइए पंजाब के भविष्य के लिए मिलकर काम करें.' उन्होंने आगे कहा, 'अगर चरणजीत सिंह चन्नी बीजेपी में शामिल होते हैं, तो हम उनका स्वागत करेंगे. जो भी बीजेपी में शामिल होगा, वह संतुष्ट रहेगा.'

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चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस से नेताओं को अपनी पार्टी में लाने की बीजेपी की बेताबी पार्टी संगठन में नेताओं की कमी को उजागर करती है. दोआबा क्षेत्र की नौ विधानसभा सीटों - आदमपुर, जालंधर कैंट, जालंधर सेंट्रल, जालंधर वेस्ट, करतारपुर, शाहकोट, नकोदर और फिल्लौर - पर चन्नी का किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होना बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है, क्योंकि वे 'स्विंग वोटर्स' को अपनी ओर खींचकर पार्टी की संभावनाओं को बदल सकते हैं.

यहां यह बताना जरूरी है कि चन्नी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी जमीनी पकड़ और राजनीतिक अहमियत को फिर से साबित किया, जहां उन्होंने 1.75 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से निर्णायक जीत हासिल की.

पंजाब यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस विभाग के प्रमुख प्रो. आशुतोष कुमार ने कहा, 'सिर्फ बीजेपी ही क्यों, चरणजीत सिंह चन्नी जैसे बहुमुखी प्रतिभा वाले नेता का सभी राजनीतिक दल स्वागत करेंगे. वे पूर्व मुख्यमंत्री, बहुत पढ़े-लिखे और एक प्रमुख दलित नेता हैं. कांग्रेस भी उन्हें खोना नहीं चाहेगी क्योंकि वे अकेले नहीं जाएंगे, बल्कि अपने समर्थकों के साथ जाएंगे.'

राजनीति विज्ञान में पीएचडी और मास्टर डिग्री के अलावा, चरणजीत चन्नी मैनेजमेंट ग्रेजुएट और वकील भी हैं और पंजाब के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे आधुनिक राजनेता हैं.

यह भी पढ़ेंः चन्नी बोले- राहुल गांधी के साथ है जीना-मरना, आखिर वेणुगोपाल ने बागी गुट को कैसे मनाया ? 

'राजनीतिक टाइम बम' कैसे साबित हो सकते हैं चन्नी?

अगर चन्नी पार्टी छोड़ते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए संगठन के स्तर पर एक बड़ा झटका होगा क्योंकि इससे उनका वोट बैंक बंट जाएगा और पार्टी का चुनावी अभियान प्रबंधन कमजोर हो जाएगा. कांग्रेस के लिए चरणजीत चन्नी को खोना नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ दलित समुदाय का समर्थन हासिल है, बल्कि सुखजिंदर सिंह रंधावा, तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा और राणा गुरजीत जैसे सीनियर जाट सिख नेताओं का भी साथ मिलता रहा है. 

जब उनके गुट ने PPCC चीफ को 'कॉम्प्रोमाइज्ड' बताया और उनकी लीडरशिप की काबिलियत पर शक जताया, तब ये नेता चन्नी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखे थे. यह भी एक अलग बात है कि अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने साफ कर दिया था कि वह CM पद की दौड़ में नहीं हैं.

कांग्रेस के लिए चन्नी सिर्फ एक दलित नेता नहीं हैं. उन्हें एक मजबूत नेता के तौर पर जाना जाता है जो BJP का मुकाबला करने में सक्षम हैं. ऐसी खूबी जिसकी कांग्रेस में अभी कमी है. पूर्व मुख्यमंत्री, एक लोकप्रिय दलित नेता और एक मुखर कांग्रेसी होने के नाते उनका राजनीतिक महत्व है. 

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मुख्यमंत्री रहते हुए, 5 जनवरी 2022 को फिरोजपुर के पियारेआना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में लापरवाही बरतने के कारण उन्हें और उनकी सरकार को प्रधानमंत्री की नाराजगी झेलनी पड़ी थी. साथ ही, 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक और 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक पर उनके विवादित बयानों के लिए भी उनकी आलोचना हुई थी. पहलगाम आतंकी हमले के बाद कांग्रेस का भारतीय सेना की कार्रवाई का समर्थन करने के बावजूद, चन्नी ने भारतीय सेना की कार्रवाई के सबूत की मांग की थी. हालांकि, देश भर में हुई आलोचना के बाद उन्हें सफाई देनी पड़ी थी.

दिलचस्प बात यह है कि खुद एक दलित नेता होने के बावजूद, चन्नी ने फरवरी 2022 में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के खिलाफ नस्लभेदी टिप्पणी की थी, जिसके कारण पटना में उनके खिलाफ FIR दर्ज की गई थी. बाद में चन्नी ने सफाई दी थी कि उनका मतलब बिहार के मजदूरों से नहीं, बल्कि उन AAP नेताओं से था जो पंजाब के नहीं हैं.

दलित चरणजीत चन्नी को क्यों पसंद करते हैं?

दलित समुदाय में चरणजीत सिंह चन्नी की लोकप्रियता को अक्सर रविदासिया समुदाय के नजरिए से मापा जाता है, लेकिन असल में वे दूसरे दलित समुदायों में भी लोकप्रिय हैं. जालंधर लोकसभा क्षेत्र में 37 प्रतिशत दलित वोटर हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत से ज्यादा रविदासिया समुदाय के हैं. इसके बाद 35% वाल्मीकि या मजहबी सिख और 5% अन्य दलित उप-जातियां हैं.

पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री के तौर पर अपने 111 दिन के कार्यकाल में चन्नी ने दलित समुदाय के लिए कई खास कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं. इनमें दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों का 50,000 रुपये तक का लोन माफ किया, ग्रामीण इलाकों में गरीब घरेलू उपभोक्ताओं के लिए 2 किलोवाट तक के बकाया बिजली बिल की माफी की, सरकारी जमीन पर रहने वाले दलितों को प्रॉपर्टी का अधिकार देना और सफाई कर्मचारियों की नियमित भर्ती शामिल थी.

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क्या चन्नी कांग्रेस छोड़ेंगे?

पंजाब प्रदेश कांग्रेस कैंपेन कमेटी के चेयरमैन बनाए गए चरणजीत चन्नी ने पहले ही साफ कर दिया था कि वे बीजेपी में शामिल नहीं हो रहे हैं और कांग्रेस में ही बने रहेंगे. 

असल में, चन्नी के कांग्रेस छोड़ने की अटकलें तब शुरू हुईं जब उन्हें घुटन महसूस होने की बात कही गई. यह बात इस साल जनवरी के बीच में कांग्रेस पार्टी की एक मीटिंग के लीक हुए वीडियो से सामने आई, जिसमें चन्नी को यह कहते हुए सुना गया कि पंजाब कांग्रेस संगठन में सभी अहम पद - जैसे PCC चीफ, महिला कांग्रेस, विपक्ष के नेता - जाट समुदाय के नेताओं के पास हैं और दलितों को, जो कुल वोटरों का 32 प्रतिशत से ज्यादा हैं, कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला है.

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वीडियो में चन्नी की 'हम कहां जाएं' वाली बात ने कांग्रेस पार्टी संगठन में दलितों की अनदेखी और गहरी दरारों को उजागर कर दिया. पंजाब कांग्रेस चीफ अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने 4 नवंबर, 2025 को दिवंगत गृह मंत्री बूटा सिंह के खिलाफ जातिवादी और नस्लवादी टिप्पणी की, जिससे दलित समुदाय नाराज हो गया. पार्टी आलाकमान को भी इस मामले की जानकारी दी गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

हाल ही में कांग्रेस महासचिव से मिलने के बाद चरणजीत चन्नी ने कहा- 'सब ठीक है', लेकिन उनके खेमे के नेता जैसे सुखजिंदर सिंह रंधावा अभी भी कहते हैं कि वे कांग्रेस के साथ हैं, न कि किसी ऐसे नेता के साथ जिसकी साख पर सवाल उठे हों. इस विवाद में एक नया मोड़ तब आया जब चन्नी ने सोमवार को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में दो सीनियर पार्टी कार्यकर्ताओं को निकाल दिया. इससे राजा वडिंग गुट के नाराज होने की संभावना है, क्योंकि अनुशासनात्मक समिति के पास ही यह अधिकार होता है.

PCC चीफ अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा और चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाले तीन विरोधी गुट आपसी मतभेद भुलाने को तैयार नहीं हैं और वे लंच और डिनर डिप्लोमेसी का सहारा लेते दिखे. यह तो तय है कि चन्नी इस समय कांग्रेस नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन यह देखना बाकी है कि वे खुद को ऐसे माहौल में कैसे पाते हैं जहां PCC चीफ बूटा सिंह जैसे दलितों का मजाक उड़ाते हैं और चन्नी के समुदाय को संगठन में कोई बड़ा प्रतिनिधित्व नहीं देते हैं.

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