- पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सिख बंदियों की रिहाई का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है.
- शिरोमणि अकाली दल का पंथक राजनीति पर एकाधिकार कमजोर पड़ गया है और कई नए राजनीतिक खिलाड़ी उभर रहे हैं.
- मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने जगतार सिंह हवारा के पैरोल की मांग को मानवीय और राजनीतिक मुद्दा बताया है.
पंजाब में अगले साल विधानसभा का चुनाव होना है. इसके लिए सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश अभी से शुरू हो गई है. जिससे राजनीतिक माहौल गरमा चुका है. हाल के दिनों में पंजाब की राजनीति में सिख बंदियों की रिहाई का मामला तेज होता नजर आया है. पंजाब सीएम भगवंत सिंह मान ने जगतार सिंह हवारा के पैरोल की मांग तेज की है. दूसरी ओर अकाली दल बलवंत सिंह राजोआणा के समर्थन में मोर्चा खोल चुकी है. इन दोनों प्रमुख दलों के बीच अमृतपाल सिंह का फैक्टर भी तेज नजर आ रहा है. इससे चुनाव से पहले पंजाब की राजनीति नए बदलाव की ओर जाता दिख रहा है.
पंथक राजनीति पर अब अकाली का एकाधिकार नहीं
दरअसल पंजाब चुनाव से पहले बंदी सिखों का मुद्दा फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है. लेकिन यह केवल कैदियों की रिहाई पर बहस तक सीमित नहीं है. यह एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है. बदलाव यह कि पंथक राजनीति पर अब शिरोमणि अकाली दल (SAD) का एकाधिकार नहीं रही.

अकाली ने उठाया बलवंत सिंह राजोआना का मोर्चा
अकाली दल ने पूर्व पंजाब पुलिस अधिकारी बलवंत सिंह राजोआना के समर्थन में खुलकर मोर्चा संभाला है, जबकि भगवंत मान सरकार ने जगतार सिंह हवारा के मामले को मानवीय और राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया है. वहीं अमृतपाल सिंह का खेमा भी बंदी सिखों के मुद्दे के जरिए अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश कर रहा है. दूसरी ओर दमदमी टकसाल राज्यभर में अपना संगठनात्मक ढांचा खड़ा कर रही है, जो भविष्य में उसे राजनीतिक प्रभाव भी दे सकता है.
अकाली दल का समीकरण क्यों पड़ रहा कमजोर?
दशकों तक अकाली दल को पंथक मुद्दों का स्वाभाविक राजनीतिक प्रतिनिधि माना जाता रहा. लेकिन अब यह समीकरण कमजोर पड़ चुका है. पार्टी कई गुटों में बंटी हुई है और उसका राजनीतिक प्रभाव भी घटा है. इससे आम आदमी पार्टी (AAP), नए सिख राजनीतिक समूहों और धार्मिक संगठनों के लिए उन मुद्दों पर दावेदारी करने का अवसर पैदा हुआ है, जो कभी लगभग पूरी तरह अकाली दल से जुड़े माने जाते थे.
सियासी नुराकुश्ती में बंदी सिखों का मुद्दा एक अहम फैक्टर
बंदी सिखों का मुद्दा इस व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केवल एक हिस्सा है. बेअदबी के मामले, SPGC और अकाल तख्त की कार्यप्रणाली, सिख कैदियों की रिहाई, धार्मिक पहचान और सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे अब कई राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए महत्वपूर्ण बन चुके हैं. हर पक्ष इन मुद्दों को अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से उठा रहा है.

केवल पंथक राजनीति ने नहीं टिक सकेगी अकाली
अकाली दल के सामने एक विरोधाभासी स्थिति है. पार्टी को अपनी प्रासंगिकता दोबारा हासिल करने के लिए पंथक मुद्दों की जरूरत है, लेकिन अब वह यह मानकर नहीं चल सकती कि किसी पंथक मुद्दे को उठाने भर से उस पर उसका राजनीतिक स्वामित्व स्थापित हो जाएगा. हर बार जब अकाली दल इस क्षेत्र में वापसी की कोशिश करता है, कोई दूसरा राजनीतिक खिलाड़ी भी मैदान में आ जाता है.
आप ने हवारा के पैरोल में बढ़ाई सक्रियता
इस संदर्भ में हवारा को लेकर AAP की सक्रियता विशेष महत्व रखती है. मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा मानवीय आधार पर हवारा को पैरोल दिए जाने की मांग ने AAP को उस राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने का मौका दिया है, जिस पर परंपरागत रूप से पंथक राजनीति का प्रभाव रहा है.
31 साल से जेल में बंद है जगतार सिंह हवारा
फतेहगढ़ साहिब जिले के हवारा गांव के निवासी जगतार सिंह हवारा उग्रवाद के दौर में बब्बर खालसा संगठन से जुड़े रहे थे. वर्तमान में वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं और लंबे समय से उनकी पैरोल तथा लंबे समय से जेल में बंद सिख कैदियों के मुद्दे पर कानूनी और राजनीतिक बहस होती रही है.
आप सिखों की भावनात्मक चिंताओं को कर रही एड्रेस
व्यक्तिगत कैदियों के मामलों में चाहे जितनी कानूनी और संवैधानिक जटिलताएं हों, राजनीतिक संदेश साफ है कि AAP सिखों की भावनात्मक और धार्मिक चिंताओं को पूरी तरह अकाली दल या नए सिख संगठनों के हवाले नहीं छोड़ना चाहती.
अकाली बलवंत सिंह राजोआना के समर्थन में
वहीं, अकाली दल का बलवंत सिंह राजोआना के समर्थन में आना भी महत्वपूर्ण है. 2007 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन 2012 में कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं के चलते उनकी फांसी पर रोक लग गई. वह फिलहाल पटियाला सेंट्रल जेल में बंद हैं. उनका मामला लंबे समय से पंजाब में एक प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है और कई सिख संगठन उनकी रिहाई या दया याचिका स्वीकार करने की मांग करते रहे हैं.

अमृतपाल खेमा ने प्रतिस्पर्धा और और बनाया जटिल
अमृतपाल सिंह का खेमा इस प्रतिस्पर्धा को और जटिल बनाता है. उसकी राजनीति सिख पहचान की अधिक आक्रामक व्याख्या पर आधारित है और बंदी सिखों का मुद्दा उसे ऐसा भावनात्मक विषय देता है, जिसके जरिए वह पारंपरिक अकाली नेतृत्व और AAP दोनों को चुनौती दे सकता है. अपेक्षाकृत नए राजनीतिक समूह के लिए यह पहचान आधारित राजनीतिक लामबंदी का प्रभावी माध्यम बन सकता है, खासकर ग्रामीण पंजाब में.
दमदमी टकसाल सेवक जत्था भी बढ़ा रहा आधार
दमदमी टकसाल की गतिविधियां भी इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य का संकेत हैं. दमदमी टकसाल सेवक जत्था की स्थापना और राज्य की सभी 117 विधानसभा तथा 13 लोकसभा सीटों पर हलका इंचार्ज नियुक्त करने का फैसला बताता है कि यह धार्मिक संस्था अपना ऐसा संगठनात्मक ढांचा विकसित कर रही है, जिसे भविष्य में राजनीतिक प्रभाव के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
महाराष्ट्र की राजनीति में, विशेष रूप से भाजपा नीत महायुति गठबंधन के समर्थन के जरिए, उसकी पहले की भूमिका भी यह दिखाती है कि उभरता पंथक प्रभाव अब पारंपरिक अकाली दल बनाम कांग्रेस की राजनीति की सीमाओं में नहीं समाया जा सकता.
शासन, रोजगार, नशा ही नहीं पंथ की राजनीति भी अहम
यह स्थिति 2027 के चुनाव को काफी अलग बना सकती है. मुकाबला केवल शासन, रोजगार, नशे, कृषि या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा. यह इस बात की लड़ाई भी बन सकता है कि सिख राजनीतिक हितों को परिभाषित करने का अधिकार किसके पास है और पंथ की आवाज उठाने की सबसे अधिक विश्वसनीयता किसके पास है.
आज पंथक राजनीति और अकाली राजनीति समानार्थी नहीं रह गई हैं. इसी तरह किसी सिख धार्मिक या सामुदायिक मुद्दे पर की गई हर राजनीतिक पहल को अकाली दल के पुनरुत्थान की कोशिश नहीं माना जा सकता.
कभी पंथ की राजनीति पर था अकाली का एकाधिकार
कभी अकाली दल के पास पार्टी, एसजीपीसी, धार्मिक संस्थानों, गांव स्तर के नेटवर्क और चुनावी राजनीति को जोड़ने वाला एक मजबूत राजनीतिक तंत्र था. लेकिन अब यह तंत्र कमजोर हो चुका है. अकाली दल के भीतर विभिन्न गुटों की मौजूदगी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है.
अब पार्टी को केवल AAP, कांग्रेस और भाजपा से ही नहीं, बल्कि नए सिख राजनीतिक संगठनों और अधिक सार्वजनिक प्रभाव चाहने वाली धार्मिक संस्थाओं से भी मुकाबला करना पड़ रहा है.
विडंबना यह है कि अकाली दल की कमजोरी ने शायद पंथक राजनीति के लिए अवसरों का दायरा और बढ़ा दिया है. अब कई राजनीतिक ताकतें पंथक मुद्दों को उठा रही हैं क्योंकि किसी एक दल का उन पर निर्विवाद नियंत्रण नहीं रहा.

अकाली और आप की अपनी-अपनी चुनौती
इसलिए अकाली दल के सामने चुनौती सिर्फ अधिक पंथक मुद्दे उठाने की नहीं है, बल्कि सिख मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने की है कि वही अब भी उनकी चिंताओं का सबसे विश्वसनीय राजनीतिक प्रतिनिधि है. AAP के लिए चुनौती यह है कि वह पंथक भावनाओं से जुड़ते समय अवसरवादी न दिखाई दे. वहीं उभरते सिख राजनीतिक संगठनों को भावनात्मक लामबंदी को स्थायी राजनीतिक संगठन में बदलना होगा.
और दमदमी टकसाल जैसी संस्थाओं के सामने यह प्रश्न रहेगा कि धार्मिक प्रभाव और चुनावी राजनीति के बीच की रेखा आखिर कहां खींची जाएगी.
इसलिए 2027 के चुनाव से पहले असली कहानी केवल पंथक राजनीति की वापसी नहीं, बल्कि उसका विखंडन और उस पर दावेदारी के लिए कई राजनीतिक खिलाड़ियों के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा है.
यह भी पढ़ें - लॉ ग्रेजुएट, कुछ साल पहले बना निहंग... सुखबीर सिंह बादल पर क्यों किया हमला? आरोपी ने खुद बताया
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं