- अमरिंदर राजा वडिंग को अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला हाईकमान ने किया है और चन्नी को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया गया
- चरणजीत चन्नी ने कैंपेन कमेटी के चेयरमैन पद से इस्तीफा देने की धमकी दी थी, लेकिन हाईकमान ने इसे अस्वीकार किया
- चन्नी गुट की अनुशासनहीनता और अमरिंदर राजा के खिलाफ खुले तौर पर बगावत को कांग्रेस नेतृत्व ने नकारा है
पंजाब कांग्रेस में चरणजीत सिंह चन्नी गुट और प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर राजा वडिंग के बीच खींचतान में हाईकमान ने अब तक कोई फैसला नहीं लिया है. माना जा रहा है कि हाईकमान चाहता है कि अमरिंदर राजा वडिंग ही अध्यक्ष बने रहें और चन्नी गुट को अन्य तरीकों से समझा लिया जाए. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि अमरिंदर राजा की कीमत पर ही राजी होने की बात करने वाले चरणजीत सिंह चन्नी को कांग्रेस लीडरशिप ने इतना भाव क्यों नहीं दिया है. कहा जा रहा है कि हाईकमान ने साफ कर दिया है कि अमरिंदर राजा वडिंग बने रहेंगे और चरणजीत सिंह चन्नी को पार्टी की लाइन पर चलना होगा. उन्हें 15 दिन का अल्टीमेटम भी लीडरशिप ने दिया है. सूत्रों का कहना है कि चन्नी ने 6 अगस्त को कैंपेन कमेटी के चेयरमैन पद से ही इस्तीफा देने की धमकी दी थी. इस पर हाईकमान ने कहा कि ऐसा कोई कदम न उठाएं, लेकिन यह भी सच है कि अमरिंदर राजा वडिंग नहीं हटेंगे.
हाईकमान ने ऐसा तब कहा है, जबकि चन्नी ने यहां तक कहा था कि अमरिंदर राजा वडिंग के नेतृत्व में जीत मिलना मुश्किल है. बीते 9 दिनों में 18 रैलियां हुई हैं और इनमें से 6 में चन्नी समर्थकों की नारेबाजी हुई है. फिर भी हाईकमान ने यदि उनकी बात को स्वीकार नहीं किया है तो कुछ वजह होगी. अमरिंदर राजा वडिंग ने भी साफ किया है कि मैं इस्तीफा नहीं दूंगा. भूपेश बघेल दोनों गुटों की एकता कराने में फेल रहे हैं, लेकिन हाईकमान ने तय किया है कि चन्नी की नाराजगी की कीमत पर भी अमरिंदर राजा को कायम रखा जाएगा. सूत्रों का कहना है कि पार्टी लीडरशिप इसलिए भी नाराज है क्योंकि अमरिंदर राजा वडिंग का खुलकर चन्नी समर्थकों ने विरोध किया. चन्नी को फिलहाल हिदायत दी गई है कि वह अपने समर्थकों को संभालें और 15 दिन की डेडलाइन भी तय की है.
क्या बागी तेवर दिखाना ही भारी पड़ रहा
चरणजीत सिंह चन्नी गुट के नेता ही मोरिंडा और मोहाली में दिखे थे. इस दौरान अन्य नेता ही मंच पर नहीं थे. इसे अनुशासनहीनता और लीडरशिप को ब्लैकमेल करने की कोशिश के रूप में देखा गया है. सूत्रों का कहना है कि चन्नी गुट से हाईकमान ने पूछा है कि आखिर बताएं कि आप लोगों को अमरिंदर राजा से क्या दिक्कतें हैं. इसके अलावा उन्हें कम्प्रोमाइज्ड बताने पर भी आपत्ति जताई है. इसके अलावा कई बार जनसभाओं के बीच भी चन्नी गुट ने अमरिंदर के खिलाफ बातें की हैं. इस तरह खुली बगावत को हाईकमान ने गलत माना है. कहा जा रहा है कि राहुल गांधी, खरगे और केसी वेणुगोपाल ने ऐसे रवैये पर आपत्ति जताई है.
क्यों दलित कार्ड के बाद भी कमजोर पड़ रहे चन्नी
चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के पहले दलित सीएम बने थे. राज्य में दलित समाज की सबसे ज्यादा 32 फीसदी आबादी है. जाट समाज से आने वाले अमरिंदर राजा वडिंग 25 फीसदी वोट का प्रतिनिधित्व सीधे तौर पर करते हैं. आंकड़ों के हिसाब से दलित वोट अधिक दिखता है, लेकिन यह बंटा हुआ है. ऐसा इसलिए क्योंकि पंजाब में दलितों की 39 उपजातियां हैं. वाल्मीकि, रविदासी समेत कई अलग-अलग समुदाय प्रभावी हैं. चन्नी रविदासी समुदाय से आते हैं, जिसका 26 पर्सेंट वोट है. फिर भी समस्या यह है कि दलितों का मत किसी एक नेता के पीछे नहीं जाता. उसका बड़ा हिस्सा आम आदमी पार्टी की ओर भी गया है. इसके अलावा क्षेत्रीय स्तर पर भी इनकी राय अलग रहती है. इसलिए चन्नी के भरोसे कांग्रेस बहुत रिस्क नहीं लेना चाहती. वहीं अमरिंदर राजा वडिंग को हटाया तो एकमुश्त जाट वोट की नाराजगी का रिस्क रहेगा.
युवा कार्ड भी अमरिंदर राजा के पक्ष में
अमरिंदर राजा वडिंग आयु में चन्नी से 14 साल छोटे हैं. ऐसे में उनकी अपील भी युवाओं के बीच ज्यादा मानी जा रही है. ऐसे समय में जब देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा आंदोलन कर रहे हैं, तब कांग्रेस युवा चेहरे को पीछे नहीं हटाना चाहती. पार्टी ने अमरिंदर राजा की लीडरशिप में ही 7 लोकसभा सीटें जीती थीं. 2022 की हार के बाद कमान संभालने वाले अमरिंदर ने पार्टी काडर को साधा है और लगातार पूरे राज्य में दौरे करते रहे हैं.
ब्लैकमेलिंग के आगे झुकना नहीं चाहता नेतृत्व
कांग्रेस नेतृत्व का सीधा कहना है कि चुनाव से कुछ महीने पहले हम यह नहीं दिखाना चाहते कि किसी की ब्लैकमेलिंग के आगे हाईकमान झुक गया. इससे वोटर और काडर दोनों में गलत संदेश जाएगा. यही वजह है कि प्रभारी भूपेश बघेल लगातार कहते रहे हैं कि अध्यक्ष बदलना कोई बच्चों का खेल नहीं है. यही नहीं कांग्रेस तो अब कैप्टन अमरिंदर को भी संदेश भेज रही है. राहुल गांधी ने पिछले दिनों उन्हें अमरिंदर अंकल कहकर संबोधित किया था. माना जा रहा है कि चन्नी तो बहुत फायदेमंद कांग्रेस नहीं मानती.
चरणजीत सिंह चन्नी के सीएम कार्यकाल के 111 दिन
कांग्रेस ने 2021 में बड़ा प्रयोग किया था. दलित सीएम के तौर पर चरणजीत सिंह चन्नी को मौका मिला था. राज्य को पहली बार दलित सीएम मिला था. पार्टी को लगा था कि इससे कम से कम दलित वोटर साथ बने रहेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यहां तक कि चन्नी खुद अपनी ही दोनों सीटें हार गए. इसके अलावा ईडी की रेड भी उन पर पड़ी थी. भतीजे के यहां से बड़े पैमाने पर कैश और तमाम चीजें मिली थीं. 2022 के चुनाव के बारे में पंजाब यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर आशुतोष कुमार ने कहा, 'चन्नी को 2022 की हार का जिम्मेदार नहीं मान सकते. तब आप के फेवर में लहर थी. वह दोनों सीटें हार गए थे, लेकिन 2024 में उनका अच्छा परफॉर्मेंस था. उन्होंने जालंधर से बड़ी जीत हासिल की थी. उन्हें करीब 4 लाख वोट मिले थे.' हालांकि चन्नी पर 111 दिनों के सीएम कार्यकाल में कोई जादू न कर पाने का असर ज्यादा दिखता है.
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