भारत मंडपम में ब्रिक्स के सभी नेता एक साथ.
- ब्रिक्स के 45 पन्नों के घोषणा-पत्र में 140 प्वाइंट्स पर सभी सदस्य देशों ने बहुपक्षवाद पर सहमति जताई
- भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य बनाने की मांग ब्रिक्स देशों ने दोहराई
- आतंकवाद की कड़ी निंदा करते हुए सीमा-पार आतंकवाद, फंडिंग और पनाहगाह के खिलाफ संयुक्त प्रतिबद्धता जताई
ब्रिक्स का घोषणा-पत्र जारी हो गया है. 45 पन्नों के घोषणा-पत्र में कुल 140 प्वाइंट्स पर सभी ब्रिक्स देश सहमत हुए. मगर एक शब्द बार-बार सुनाई दिया और वह है बहुपक्षवाद. सभी देश इस बात पर पूरी तरह सहमत दिखे कि विश्व में एक शक्ति और एक विचारधारा को नहीं चलने चाहिए. साथ ही इस बात पर भी सहमति दिखाई दी कि ब्रिक्स देशों को आपसी स्वार्थ से उठकर दुनिया में एक नई और न्यायप्रिय व्यवस्था बनानी होगी.
प्वाइंट्स में जानिए नई दिल्ली घोषणा-पत्र की महत्वपूर्ण बातें
- उभरते बाजारों और विकासशील देशों (EMDCs) के साथ ब्रिक्स साझेदारी को आगे बढ़ाने से सभी को लाभ होगा.
- ब्रिक्स देशों ने दोहराया कि भारत और ब्राजील को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य में मौका मिलना चाहिए.
- एक खुली वैश्विक अर्थव्यवस्था बनाने के लिए WTO सुधार की बात रखी गई.
- ग्लोबल ट्रेड के और कम होने, ग्लोबल सप्लाई चेन में रुकावट आने और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियों में अनिश्चितता को लेकर चिंता जताई गई.
- अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को मजबूत करने के लिए वैश्विक कार्रवाई को बढ़ावा देने की बात कही गई.
- युद्धों को बातचीत से समाप्त करने पर जोर दिया गया.
- परमाणु खतरे और संघर्ष के बढ़ते जोखिमों पर चिंता जताई गई.
- आतंकवाद की किसी भी घटना को आपराधिक और अनुचित मानते हुए उसकी कड़ी निंदा की गई, चाहे उसका मकसद कुछ भी हो, और वह घटना कभी भी, कहीं भी या किसी के भी द्वारा की गई हो.
- 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई.
- आतंकवाद के सभी रूपों और तरीकों से निपटने के लिए प्रतिबद्धता दोहराई गई, जिसमें आतंकवादियों की सीमा-पार आवाजाही, आतंकवाद के लिए फंडिंग और उन्हें सुरक्षित पनाहगाह मिलना शामिल है.
- अंतरिक्ष प्रणालियों और अंतरिक्ष विज्ञान व तकनीक की उपलब्धियों का इस्तेमाल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए.
- अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ को रोकने, साथ ही बाहरी अंतरिक्ष की वस्तुओं के खिलाफ बल प्रयोग या धमकी को रोकने के लिए समर्थन दोहराया.
- 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट को लागू करने की प्रतिबद्धता की पुष्टि की गई, जिसमें अत्यधिक गरीबी उन्मूलन को सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती माना गया.
- विश्व बैंक और IMF जैसे ब्रेटन वुड्स संस्थानों में सुधार की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया गया.
- अंतरराष्ट्रीय कानून के विरुद्ध लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा की गई और उन्हें समाप्त करने का आह्वान किया गया.
- सभी के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने और विभिन्न ऊर्जा स्रोतों, जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और हाइड्रोजन शामिल हैं, के महत्व को स्वीकार किया गया.
किसे क्या मिला
- भारत को-आतंकवाद पर ब्रिक्स का पूरा साथ मिला. चाहे हो बॉर्डर पार आतंकवाद की फंडिंग हो या आतंकी वारदात, ब्रिक्स ने माना कि आतंकवाद से निपटने का संकल्प दोहराया. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लिए ब्रिक्स के सभी देशों का समर्थन मिला. चीन के साथ संबंधों में नई गर्माहट लाने का मौका मिला. ब्रिक्स देशों के साथ बिजनेस पर बात करने का मौका मिला. इसके साथ ही भारत को सफल आयोजन करने का श्रेय भी मिला.
- चीन को-अमेरिका की दादागिरी को रोकने में ब्रिक्स देशों का समर्थन मिला. टैरिफ से लेकर एकतरफा प्रतिबंध लगाने के अमेरिकी फैसलों के विरोध में ब्रिक्स को राजी करने का मौका मिला. भारत के साथ संबंधों में गर्माहट लाने का मौका मिला. चीन को अपनी छवि चमकाने का मौका मिला. ब्रिक्स समिट में सबसे ज्यादा लाइमलाइट में शी जिनपिंग ही रहे. उन्हें ऐसे नेता के तौर पर देखा गया जो बड़े लक्ष्यों के लिए सीमा विवाद को मुद्दा बनाकर नहीं रखना चाहते.
- रूस को-अमेरिका और पश्चिमी देशों की पूरी कोशिश थी कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को अलग-थलग कर दिया जाए. मगर ब्रिक्स समिट में पुतिन छाए रहे. उन्होंने जी 7 को सीधे तौर पर ब्रिक्स की ताकत और हैसियत दोनों बता दी. साथ ही रूस के खिलाफ लग रहे एकतरफा प्रतिबंधों पर ब्रिक्स देशों को साधने में कामयाब रहे. भारत, सऊदी और यूएई जैसे अमेरिका के मित्र देश भी इस बात पर सहमत दिखे कि एकतरफा प्रतिबंध किसी के हित में नहीं है.
- ईरान को-इजरायल के खिलाफ ब्रिक्स ने कड़ा रुख अपनाया. इसके साथ ही बहुपक्षवाद की चर्चा को भी बल मिला. इससे अमेरिका की अकड़ को कम कराने में ईरान को मदद मिली. युद्ध के दौरान अमेरिका ने पूरी कोशिश की कि ईरान को अलग-थलग कर दिया जाए मगर ईरान को ब्रिक्स में उतना ही महत्व मिला जितना बाकी देशों को.
- सऊदी-यूएई को-ब्रिक्स का उपयोग इन दोनों देशों ने ईरान को साधने में भी किया. खबरें हैं कि हूतियों के अटैक के बाद जब सऊदी प्रिंस ने ट्रंप से सैन्य कार्रवाई के लिए कहा तो उन्होंने मना कर दिया. तुर्की और पाकिस्तान ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया. यूएई भी ईरान के हमलों से परेशान था. ऐसे में ब्रिक्स का उपयोग इन दोनों देशों ने ईरान को भारत-रूस-चीन के जरिए मैनेज करने की कोशिश की हो तो इसमें कोई हैरत नहीं है.
किसे लगेगी सबसे ज्यादा मिर्ची
- अमेरिका को-अमेरिका अब भी खुद को सुपरपावर मानकर काम कर रहा है. ब्रिक्स ने सीधे अमेरिका का नाम तो नहीं लिया पर ये जरूर जता दिया कि अब दुनिया में एकपक्षीय व्यवस्था नहीं चलेगी. अमेरिका की सरपरस्ती में चलने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, वर्ल्ड बैंक से WTO में सुधार की बात कहकर ये जताया गया कि अब ये बहुत दिन नहीं चलेगा. साथ ही टैरिफ लगाने और एकतरफा प्रतिबंध लगाने की भी निंदा की गई.
- पाकिस्तान को-आतंकवाद के जनक इस देश को सबसे ज्यादा मिर्ची लगी. कारण ये है कि आतंकवाद पर ब्रिक्स ने बहुत सख्त संदेश दिया है. इसके साथ ही फंडिंग को लेकर भी बात की गई है. इससे भी बड़ी बात ये है कि चीन के रहते ये सब हुआ. भारत से चीन की बढ़ती नजदीकी भी पाकिस्तान के सिर पर परमाणु बम गिरने से कम नहीं है.
- इजरायल को- इजरायल को इससे झटका तो लगेगा लेकिन ये उस पर बहुत ज्यादा दबाव नहीं बना पाएगा. कारण ये है कि इजरायल किसी दूसरे देश के बल पर कुछ नहीं करता. ये उसकी अपनी जिद और सोच है कि गाजा में उसे क्या करना है और इस तरह के बयान से वो रुकने वाला नहीं है. हां, ये जरूर है कि उस पर गाजा में अब संयम रखने का दबाव जरूर बनेगा.
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