अरावली पर्वतमाला की पहचान, सीमांकन और संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाई-पावर्ड कमेटी को कड़ा संदेश दिया है. अदालत ने कमेटी की छह महीने का अतिरिक्त समय देने की मांग खारिज करते हुए 30 नवंबर 2026 तक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कमेटी की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई और कहा कि ऐसा लगता है जैसे पहली कलम चलाते ही समय बढ़ाने की मांग कर दी गई. साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि अरावली क्षेत्र में खनन पर लगा अंतरिम प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेगा.
कमेटी को मिली कोर्ट की फटकार
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने हाई-पावर्ड कमेटी के फरवरी 2027 तक अतिरिक्त समय मांगने के अनुरोध को खारिज कर दिया. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा प्रतीत होता है कि कमेटी ने काम शुरू करते ही समय बढ़ाने की मांग कर दी है. अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा लग रहा है मानो कमेटी न्यायाधीशों के सेवानिवृत्त होने का इंतजार कर रही हो.
30 नवंबर तक दाखिल करनी होगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि हाई-पावर्ड कमेटी को हर हाल में 30 नवंबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी. अदालत ने साफ कर दिया कि इसके बाद किसी प्रकार का समय विस्तार नहीं दिया जाएगा. कोर्ट ने कमेटी को निर्देश दिया कि वह तय समयसीमा के भीतर काम पूरा करने के लिए दिन-रात काम करे.
सभी पक्षों को सुनने का निर्देश
अदालत ने कहा कि रिपोर्ट तैयार करते समय सभी संबंधित पक्षों की राय ली जाए. विशेष रूप से राजस्थान और गुजरात के आदिवासी समुदायों को भी अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को यह छूट भी दी कि यदि किसी मुद्दे पर तत्काल निर्णय की आवश्यकता हो तो वह अंतरिम रिपोर्ट दाखिल कर सकती है.
माइनिंग पर रोक जारी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर लगा अंतरिम प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेगा. अदालत ने कहा कि अंतिम रिपोर्ट और आगे के आदेश आने तक मौजूदा व्यवस्था लागू रहेगी. इस मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर 2026 को होगी.
कार्यकर्ताओं ने जताई चिंता
पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं के एक समूह ने उच्चतम न्यायालय द्वारा अरावली उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) की अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए समयसीमा छह महीने बढ़ाने से इनकार किए जाने पर सोमवार को चिंता जताई. उनका कहना है कि इस पर्वत श्रृंखला के व्यापक आकलन के लिए और अधिक समय की आवश्यकता होगी. अरावली विरासत जन अभियान के सह-संस्थापक दीवान सिंह ने एक बयान में कहा, 'उच्चतम न्यायालय इतनी जल्दबाजी में क्यों है?' उन्होंने दावा किया कि अतीत की 'गलतियों' को 'दोहराया' जा रहा है.
अंतिम रिपोर्ट सौंपने की मूल समयसीमा 31 अगस्त थी. उस दिन उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित एचपीसी ने अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करके अदालत से समयसीमा बढ़ाकर 28 फरवरी, 2027 करने का अनुरोध किया था. समिति ने दलील दी थी कि अतिरिक्त समय से अरावली पर्वत श्रृंखला का 'व्यापक और ठोस' आकलन करने में मदद मिलेगी.
हालांकि, दीवान सिंह ने कहा कि ऐसी समीक्षा में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए और उन्होंने पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समिति का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा, 'यह बहुत परेशान करने वाली बात है कि उच्चतम न्यायालय अपने ही आदेश से गठित एचपीसी के अनुरोध का सम्मान नहीं कर रहा और उसके सदस्यों के साथ स्कूली छात्रों जैसा व्यवहार कर रहा है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण की गंभीरता और सटीकता वाली रिपोर्ट तैयार करने के लिए समिति को दिन-रात काम क्यों करना चाहिए?'
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