- अरावली पहाड़ों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बनाई गई HPC कमेटी ने और समय मांगा है.
- कमेटी का कहना है कि केवल 100 मीटर की ऊंचाई इसका फॉर्मूला नहीं हो सकता है.
- HPC कमेटी ने अपनी आखिरी रिपोर्ट सौंपने के लिए 27 फरवरी 2027 का समय मांगा है.
अरावली पर्वतमाला को लेकर नया अपडेट आया है. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित की गई हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) ने इस मामले में 27 फरवरी 2027 तक का समय मांगा है. कमेटी का कहना है कि अरावली पर्वतमाला के लिए पहाड़ियों को 100 मीटर कोई फॉर्मूला नहीं हो सकता है. इसकी जांच के लिए और समय चाहिए होगा. कमेटी का कहना है कि 'माइनिंग प्रिवेंशन एंड सस्टेनेबल मैनेजमेंट'(MPSM) योजना को आखिरी रूप देने के लिए और समय चाहिए. क्योंकि अरावली की पहाड़ियों को केवल ऊंचाई से एक पैमाने से तय नहीं किया जा सकता है, यह एक जटिल मुद्दा है, जिसे बेहद आसानी से सुलझाया जाना चाहिए. बता दें कि इस कमेटी में सीनियर अधिकारियों की टीम है, जो अरावली पर्वतमाला को लेकर जानकारी जुटा रही है.
क्या है अरावली पर्वत से जुड़ा 100 मीटर का विवाद
दरअसल, अरावली पर्वत माला से जुड़ा विवाद तब शुरू हुआ था जब नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की एक सिफारिश को हरी झंडी दी थी. जिसमें यह माना गया था कि केवल 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही कानूनी रूप से अरावली पर्वत माला का हिस्सा माना जाएगा. सरकार के इस फैसले का तुरंत विरोध शुरू हो गया. पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने भी इसे खतरे की घंटी बताया. उनका कहना था कि अगर 100 मीटर ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत माना गया तो फिर राजस्थान और हरियाणा में फैला पर्वत का 90 प्रतिशत हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर जाएगा और इस पर खनन करने की अनुमति का रास्ता भी साफ हो जाता.
ये वीडियो भी देखिए.
सुप्रीम कोर्ट ने बनाई HPC कमेटी
सरकार की इस सिफारिश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फिर से याचिका लगाई गई. जिसके बाद दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर बड़ा फैसला सुनाया और अपने ही फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी. इसके अलावा एक हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के महानिदेशक कंचन देवी को दी गई. इस कमेटी को अरावली की परिभाषा तय करने का काम दिया गया था, जिसमें यह तय करना था कि पर्यावरण का संरक्षण भी हो और पर्यावरण अनुकूल आर्थिक गतिविधियों को भी आसानी से संचालित किया जा सके.
HPC ने मांगा 27 फरवरी का समय
HPC ने इसी मामले में 27 फरवरी तक का समय मांगा है. कमेटी का कहना है कि स्थानीय निवासियों, किसान संगठनों, पर्यावरणविदों और माइनिंग उद्योग की तरफ से अब तक 680 से ज्यादा सुझाव और आपत्तियां आ चुके हैं. जिनका बारीकी से अध्ययन किया गया है. इसके बाद ही एक 'सस्टेनेबल माइनिंग प्लान' तैयार किया गया है. जिसमें अरावली को समझने के लिए कई अहम पहलूओं की जानकारी जुटानी होगी.
अरावली से जुड़े तीन अहम मुद्दे
- HPC कमेटी का कहना है कि अरावली पर्वतमाला रेतीले तूफानों को दिल्ली-NCR और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तरफ बढ़ने से रोकने वाली एक प्राकृतिक दीवार है.
- इसके अलावा यह पूरे उत्तर भारत की भूमिगत जल प्रणालियों को रीचार्ज करने का सबसे बड़ा जरिया है, जो पानी का एक बड़ा जरिया भी होता है.
- वहीं सरिस्का से लेकर दिल्ली के असोला भट्टी तक, यह अनगिनत वन्यजीवों और वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास है. जिसे बनाए रखना बहुत जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी रिपोर्ट तक लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपना रुख साफ कर दिया है कि जब तक कमेटी की अंतिम रिपोर्ट नहीं आ जाती. तब तक कोर्ट उस पर कोई अंतिम फैसला नहीं ले लेता, तब तक अरावली क्षेत्र में किसी भी नई माइनिंग लीज को मंजूरी नहीं दी जाएगी. 27 फरवरी के बाद जब यह रिपोर्ट अदालत के पटल पर रखी जाएगी, तब यह तय होगा कि देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला का भविष्य क्या होगा. फिलहाल यहां खनन पर रोक रहेगी.
ये भी पढे़ंः अचानक घुसा पानी, सब रास्ते बंद...नेपाल सुरंग से 9 दिन बाद जिंदा बाहर निकले शख्स ने बताई 'खौफ' की कहानी
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं