- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती कमिश्नर और संतकबीर नगर डीएम के मदरसे की जमीन निहित करने के आदेश को रद्द किया है
- ब्रिटिश मौलाना समशुल हुदा खान की सोसाइटी ने जमीन की वैधता को लेकर प्रशासन के आदेश को चुनौती दी थी
- डीएम ने नियमों के विपरीत आदेश जारी कर जमीन को राज्य सरकार में निहित कर दिया था, जिसे कोर्ट ने गलत माना
ब्रिटिश मौलाना समशुल हुदा खान के मदरसे के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आया है. अदालत ने बस्ती के कमिश्नर और संतकबीर नगर के डीएम उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके जरिए मदरसे की जमीन को राज्य सरकार में निहित कर दिया गया था. हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी आदित्यनाथ की सरकार को कानून के अनुसार कार्रवाई करने की पूरी छूट दी है. हाल ही में ब्रिटिश मौलाना समशुल हुदा खान के कुल्लियातुल बनातिर रज़विया एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी के मदरसे पर प्रशासन का बुलडोजर चलाया गया था, जिसमें बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
ब्रिटिश मौलाना ने कोर्ट में दी ये दलील
हालांकि, ब्रिटिश मौलाना की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता के खिलाफ कानून के अनुसार, कार्यवाही करने की पूरी आजादी दे दी है. यह आदेश जस्टिस अरुण कुमार की सिंगल बेंच ने कुल्लियातुल बनीतिर रज़विया एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी की याचिका को मंजूर करते हुए दिया है. दरअसल, याचिकाकर्ता सोसाइटी ने बस्ती मंडल के कमिश्नर और संतकबीर नगर के डीएम द्वारा 24 अप्रैल 2026 और 14 नवंबर 2025 के यूपी रेवेन्यू कोड रूल्स, 2016 के नियम 103 के तहत कार्यवाही में पारित किए गए आदेश को चुनौती दी थी. प्रशासन के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के खिलाफ भी मदरसा कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया कि याचिकाकर्ता एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है. जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत मदरसा चलाती है. सोसाइटी ने 28 अगस्त 2014 को रजिस्टर्ड सेल डीड के ज़रिए विवादित ज़मीन खरीदी.
क्यों चला ब्रिटिश मौलाना के मदरसे पर बुलडोजर?
ब्रिटिश मौलाना के वकील ने अदालत में कहा कि मदरसा बिक्रीनामा याची सोसाइटी और सरपरस्त जो उस समय समशुल हुदा खान थे, उनके पक्ष में एग्जीक्यूट की गई थी. अब्दुल करीम जो प्रतिवादी संख्या 4 और 5 के हित में पूर्वज थे उन्होंने संतकबीर नगर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास यूपी रेवेन्यू कोड 2006 की धारा 104/105 के तहत एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि समशुल हुदा खान 2013 में ब्रिटिश नागरिक बन गए थे, इसलिए राज्य सरकार की ज़रूरी इजाज़त के बिना उनके नाम पर भारत में अचल संपत्ति खरीदना कोड, 2006 की धारा 90 और धारा 104 के अनुसार अमान्य था. इसलिए ऐसी स्थिति में भूमि राज्य सरकार में निहित हो सकती है.
DM से हुई चूक?
इस मामले में डीएम ने रूल्स 2016 के नियम 103 के तहत आगे बढ़ने का निर्देश देने के बजाए 12 फरवरी 2024 के अपने आदेश द्वारा स्वयं ही इस शिकायत और फैसला लिया और भूमि को समस्त भारों से मुक्त करते हुए राज्य में निहित करने का निर्देश दे दिया. डीएम के आदेश के खिलाफ याचिकाकर्ता ने बस्ती मंडल के कमिश्नर के सामने एक रिवीजन फाइल किया जिसे दस जुलाई 2025 के आदेश से मंज़ूरी दे दी गई और मामले को नए सिरे से तय करने के लिए वापस भेज दिया गया. मामला वापसी के बाद डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने 14 नवंबर 2025 के अपने आदेश से सेल डीड को फिर से रद्द कर दिया, क्योंकि ये समशुल हुदा खान के नाम पर की गई थी जो एक विदेशी नागरिक थे और पूरी प्रॉपर्टी राज्य में निहित करने का निर्देश दिया. डीएम के आदेश के खिलाफ याची ने दोबारा बस्ती कमिश्नर के पास एक रिवीजन दाखिल की, जिसे 24 अप्रैल 2026 के आदेश से खारिज कर दिया गया.
कलेक्टर के पास फैसला लेने का अधिकार नहीं था?
याचिकाकर्ता के सीनियर एडवोकेट ने हाईकोर्ट में यह दलील दी कि कोड, 2006 के सेक्शन 104/105 के साथ रूल्स, 2016 के नियम 103 के तहत पूरी कार्रवाई खुद कलेक्टर ने की है, जिनके पास फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि संबंधित नियमों के तहत अथॉरिटी सब डिविजनल ऑफिसर के पास है. याची की तरफ से इसके सपोर्ट में हाईकोर्ट द्वारा 21 जुलाई 2023 के श्रीमती मीनू सेठ बनाम यूपी राज्य और अन्य के मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया. इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट के कई और फैसलों का हवाला दिया गया. कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए एक फैसले में ये भी माना गया था कि धारा 105 में निर्दिष्ट कोई संपत्ति राज्य सरकार में निहित हो गई है, वहां कलेक्टर ऐसी संपत्ति पर अनधिकृत कब्ज़ा करने वाले किसी भी व्यक्ति को बेदखल कर सकता है और उसका कब्ज़ा संबंधित ग्राम पंचायत को सौंप सकता है.
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यूपी सरकार ब्रिटिश मौलाना के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र
सुनवाई के दौरान राज्य के प्रतिवादियों की तरफ से पेश एडिशनल एडवोकेट जनरल ने भी याची के सीनियर एडवोकेट द्वारा दिए गए फैसलों को पढ़ने के बाद माना कि कलेक्टर द्वारा 14 नवंबर 2025 को दिया गया आदेश अधिकार क्षेत्र के बाहर था. सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि मामले को लंबित रखने और मूल शिकायतकर्ता के वारिसों को नोटिस जारी करने का कोई औचित्य नहीं है. कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के मीनू सेठ और सुधीर कुमार जैन के मामलों में हाईकोर्ट द्वारा बनाए गए कानून को देखते हुए बस्ती कमिश्नर और डीएम संतकबीर नगर के फैसले को रद्द कर दिया. कोर्ट ने कहा कि करते हुए कहा है कि राज्य के प्रतिवादी कानून के अनुसार, याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है. हाईकोर्ट के इस फैसले में जहां एक ओर प्रशासनिक आदेश को निरस्त किया गया. वहीं, दूसरी ओर राज्य सरकार के अधिकारों को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने उसे वैधानिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई करने की छूट दी भी है.
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