विज्ञापन
This Article is From Apr 01, 2026

तलाक की तारीख पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पति के एलान की तारीख ही मानी जाएगी आखिरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में पति द्वारा दी गई तलाक की घोषणा की तारीख ही प्रभावी मानी जाएगी, न कि अदालत के आदेश की तारीख.

तलाक की तारीख पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पति के एलान की तारीख ही मानी जाएगी आखिरी
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक की वैधता की तारीख की पुष्टि करते हुए आदेश दिया है
  • कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के भरण-पोषण आदेश को रद्द कर मामले को फिर सुनवाई के लिए वापस भेजा है
  • फैमिली कोर्ट से आदेश दिया गया है कि वह छह महीने के भीतर याची महिला के भरण-पोषण दावे पर फैसला करे
लखनऊ:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला द्वारा भरण–पोषण (Maintenance) को लेकर दाखिल क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण आदेश में टिप्पणी करते हुए कहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत जब कोई पति तलाक का एलान करता है तो तलाक उसी तारीख से प्रभावी माना जाता है, जिस तारीख को उसकी घोषणा की गई हो बशर्ते कि वह कानून के अनुसार वैध हो.

कोर्ट ने कहा कि यह भी तय है कि जहां कोई पति तलाक देता है और बाद में उसी के संबंध में कोई आदेश (Decree) पाने के लिए अदालत जाता है तो अदालत द्वारा दिया गया आदेश आमतौर पर केवल घोषणात्मक प्रकृति का होता है. यह केवल उस तलाक की स्थिति को मान्यता देता है या उसकी पुष्टि करता है जो पहले ही हो चुका होता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी परिस्थितियों में अदालत का आदेश फैसले की तारीख से कोई नया तलाक नहीं करता बल्कि केवल यह घोषित करता है कि क्या तलाक पहले ही वैध रूप से दिया जा चुका था.

कोर्ट ने पत्नी को दी राहत

कोर्ट ने याची पत्नी को राहत देते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा भरण-पोषण वाद को लेकर पारित आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने याची महिला की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले को फैमिली कोर्ट को वापिस भेजने का आदेश दिया ताकि वो याची महिला के भरण-पोषण के दावे पर कानून के अनुसार दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देने के बाद और कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से और गुण-दोष के आधार पर निर्णय ले सकें.

'फैमिली कोर्ट जल्दी करें केस का निपटारा'

हाईकोर्ट ने कहा कि यह अपेक्षा की जाती है कि फैमिली कोर्ट इस मामले का शीघ्रता से निपटारा करने का प्रयास करेगा और हाईकोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तारीख से छह महीने की अवधि के अंदर अपना फैसला देगा. यह आदेश जस्टिस मदन पाल सिंह की सिंगल बेंच ने श्रीमती हुमैरा रियाज की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.

Latest and Breaking News on NDTV

फैमिली कोर्ट ने खारिज की थी भरण-पोषण याचिका

मामले के मुताबिक प्रयागराज की रहने वाली याचिकाकर्ता हुमैरा रियाज ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर करते हुए प्रयागराज फैमिली कोर्ट द्वारा  भरण-पोषण वाद में सीआरपीसी की धारा 125 तहत 27 मई 2025 को पारित आदेश को चुनौती दी थी. फैमिली कोर्ट ने याची पत्नी द्वारा दायर भरण-पोषण की अर्जी को खारिज कर दिया गया था जबकि उसके दो नाबालिग बेटों को भरण-पोषण प्रदान किया गया.

क्या है पूरा मामला?

रिवीजन याचिका दाखिल करने वाली महिला के वकील ने कोर्ट को बताया कि याची महिला की शादी उसके पहले पति यानी अब्दुल वहीद अंसारी के साथ तीन फरवरी 2002 को हुई थी. यह तर्क दिया गया है कि पहले पति ने उसे 27 फरवरी 2005 को ही तलाक दे दिया था. इसके बाद फैमिली कोर्ट में एक मुकदमा दायर किया गया और 8 जनवरी 2013 को पारित डिक्री द्वारा 27 फरवरी 2005 के उस तलाक को वैध घोषित कर दिया गया.

वकीलों ने कोर्ट में कहा कि उस तलाक की वैधता को इस कोर्ट ने भी सीआरपीसी की धारा 482 के तहत कार्यवाही में 11 मई 2023 के आदेश के माध्यम से संज्ञान में लिया था और उस आदेश के खिलाफ दायर स्पेशल लीव पिटीशन को सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त 2023 को खारिज कर दिया था. आगे तर्क दिया गया कि 'इद्दत' की अवधि पूरी करने के बाद याचिकाकर्ता ने 27 मई 2012 को विपक्षी पक्ष संख्या दो मोहम्मद दाऊद के साथ विवाह कर लिया और उसे पिछले तलाक की पूरी जानकारी थी. इस विवाह से दो बेटों का जन्म हुआ.

कोर्ट में ये मांग की गई कि दोनों पक्ष कई वर्षों तक पति-पत्नी के रूप में साथ रहे और विपक्षी पक्ष संख्या दो ने स्वयं इस विवाह को और दोनों पुत्रों के पितृत्व को स्वीकार किया है. इसलिए प्रयागराज फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए इस विवाह को 'शून्य' (अमान्य) मानने में एक स्पष्ट त्रुटि की है.

Latest and Breaking News on NDTV

पत्नी ने कोर्ट में दी ये दलील

याची पत्नी के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि विपक्ष पक्ष पति केंद्र सरकार का कर्मचारी है और अच्छी-खासी सैलरी कमाता है लेकिन उसने याचिकाकर्ता और उसके नाबालिग बेटों का भरण-पोषण करने से मना कर दिया है और इस जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया है, जिसकी वजह से याचिकाकर्ता को Cr.P.C. की धारा 125 के तहत कानूनी कार्रवाई शुरू करनी पड़ी. यह तर्क दिया गया कि हालांकि पहले अंतरिम भरण-पोषण की मंजूरी दी गई थी और इस अदालत के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे सही ठहराया था फिर भी फैमिली कोर्ट ने मई 2025 को अपना अंतिम आदेश देते समय एक बहुत ही तकनीकी आधार पर याचिकाकर्ता को भरण-पोषण देने से गलत तरीके से मना कर दिया.

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता के भरण-पोषण के दावे को मुख्य रूप से इस आधार पर खारिज कर दिया था कि जिस तारीख को याचिकाकर्ता और विरोधी पक्ष नंबर दो के बीच निकाह हुआ था उस तारीख तक याचिकाकर्ता की उसके पहले पति के साथ शादी कानूनी तौर पर खत्म नहीं हुई थी और इसलिए यह दूसरी शादी अमान्य थी. कोर्ट में पक्ष रखा गया कि याची महिला के पहले पति ने पहले ही तलाक दे दिया था और उसके बाद फैमिली कोर्ट में उस तलाक के संबंध में घोषणा की मांग करते हुए एक घोषणात्मक वाद दायर किया गया था जिसका निर्णय एक डिक्री द्वारा किया गया जिसमें तलाक़ को वैध घोषित किया गया.

विपक्षी पक्ष संख्या दो यानी पति के अधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि याची पत्नी श्रीमती हुमैरा रियाज का विवाह इससे पूर्व 2002 में अब्दुल वहीद अंसारी के साथ हुआ था और उनका यह विवाह तब तक जारी रहा जब तक कि फैमिली कोर्ट द्वारा जनवरी 2013 में तलाक में आपसी समझौते के आधार पर तलाक की डिक्री पारित नहीं कर दी गई. यह तर्क दिया गया है कि इस विवाह के अस्तित्व में रहने के दौरान याची महिला ने अपने पूर्व पति के विरुद्ध दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही भी संस्थित की थी जिसके फलस्वरूप उन्हें दो हजार रुपए प्रतिमाह की दर से भरण-पोषण राशि स्वीकृत की गई थी. इस राशि की वसूली के लिए एक निष्पादन वाद भी दायर किया गया था.

पति की मौत के बाद भी पत्नी को मिलेगा गुजारा भत्ता... इलाहाबाद HC ने बताया कौन उठाएगा ये जिम्मेदारी

कोर्ट ने सुनाया फैसला

सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने याची पत्नी की याचिका को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए कहा कि जहां दोनों पक्षों के बीच तलाक की वैधता को लेकर विवाद हो वहां न्यायालय के लिए यह आवश्यक है कि वह साक्ष्यों की जांच करे और यह निर्धारित करे कि क्या तलाक कानून के अनुसार वैध रूप से दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा लगता है कि फैमिली कोर्ट ने मुख्य रूप से इस आधार पर याची के भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया कि तलाक की घोषणा करने वाला आदेश बाद में पारित किया गया था और इसलिए दूसरी शादी अमान्य थी.

यह भी पढ़ें: नमाज के लिए घर पर जुटते थे 50-60 लोग, पुलिस ने रोका तो अदालत पहुंचा शख्स; अब इलाहाबाद HC ने दिया ये फैसला

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Allahabad High Court, Allahabad High Court Judge, Allahabad High Court Cases, Divorce Case, Divorce
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com