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'महिलाओं की सुरक्षा जरूरी लेकिन हर आरोप जांच से परे नहीं', हाई कोर्ट ने कहा- शादी टूटी तो FIR करना दुरुपयोग

शादी न चलने पर दहेज और क्रूरता के आरोपों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि असफल विवाह को आपराधिक मुकदमे में डाल देने से विवाह जैसी संस्था कमजोर होगी.

'महिलाओं की सुरक्षा जरूरी लेकिन हर आरोप जांच से परे नहीं', हाई कोर्ट ने कहा- शादी टूटी तो FIR करना दुरुपयोग
इलाहाबाद हाईकोर्ट.
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  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कम समय में टूटे वैवाहिक संबंधों में दर्ज दहेज और क्रूरता के FIR को रद्द कर दिया है
  • कोर्ट ने कहा कि हर असफल शादी को आपराधिक मुकदमे में बदलना वैवाहिक संस्था की जड़ को प्रभावित करता है
  • FIR में आरोपों के विशिष्ट विवरण और मांगों का स्पष्ट उल्लेख न होने के कारण जांच आगे नहीं बढ़ाई गई
प्रयागराज:

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शादी से जुड़े मामलों को लेकर एक अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने कम समय तक चलने वाली शादी से जुड़े दहेज और क्रूरता के मामले में दर्ज FIR को रद्द करते हुए कहा है कि हर असफल, तनावपूर्ण या टूटी हुई शादी को नियमित रूप से आपराधिक मुकदमे में बदलने से वैवाहिक संस्था की जड़ प्रभावित होगी.

अदालत ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जा सकता कि वैवाहिक संबंध टूट गया है.

जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने गौरव जैन और अन्य की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया. अदालत ने आगरा के हरि पर्वत थाने में 30 जून 2025 को दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया.

क्या था पूरा मामला?

मामले में शादी 12 नवंबर 2024 को हुई थी. FIR के मुताबिक, शादी में करीब चार करोड़ रुपये खर्च किए गए और बड़ी मात्रा में सामान, आभूषण और स्त्रीधन दिया गया.

आरोप था कि शादी के बाद अतिरिक्त दहेज और पैसों की मांग की गई. FIR में 10 करोड़ रुपये और 7 दिसंबर 2024 को 50 लाख रुपये की कथित मांग का भी उल्लेख था.

पत्नी की ओर से मारपीट, उत्पीड़न, खाना नहीं देने, घर से निकालने की धमकी, वेतन की मांग, स्त्रीधन वापस नहीं करने और गला दबाकर जान से मारने की कोशिश जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए थे. 

हाई कोर्ट ने क्या दिया फैसला?

हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपों की गंभीरता अपने आप में आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए काफी नहीं है.

FIR में यह पर्याप्त रूप से साफ नहीं किया गया कि किस व्यक्ति ने कौन-सी मांग की? मांग किस अवसर पर की गई? और उसका कथित दहेज मांग से क्या संबंध था? अदालत ने कहा कि रकम की सटीक जानकारी देना और आरोपित आचरण का सटीक विवरण देना दो अलग बातें हैं.

अदालत ने कहा कि यदि क्रूरता, दहेज मांग और मारपीट के आरोप पर्याप्त रूप से विशिष्ट हों और अपराध के कानूनी तत्वों को पूरा करते हों तो जांच आगे बढ़नी चाहिए, लेकिन जब कम अवधि का वैवाहिक संबंध टूट चुका हो, वैवाहिक मुकदमा शुरू हो चुका हो और उसके बाद गंभीर आपराधिक आरोप बिना व्यक्तिगत विवरण, घटनाओं और परिस्थितियों को स्पष्ट किए लगाए जाएं, तो अदालत किसी व्यक्ति को पूरी आपराधिक प्रक्रिया से गुजरने के लिए बाध्य नहीं कर सकती.

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'घर कानूनी लड़ाई का मैदान बन जाता है'

अदालत ने विवाह और आपराधिक कानून की सीमाओं पर विस्तार से टिप्पणी की. जस्टिस सिंह की बेंच ने कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों के बीच अनुबंध नहीं बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार है. लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि हिंसा, जबरदस्ती या गैरकानूनी मांग वाले रिश्ते में किसी व्यक्ति को बने रहने के लिए मजबूर किया जाएय

हाई कोर्ट ने कहा कि यदि हर खराब या असफल विवाह को FIR में बदल दिया जाए और आपराधिक कानून की गिरफ्त में डाल दिया जाए तो इसका विवाह संस्था पर गहरा असर पड़ेगा.

अदालत के मुताबिक, आपराधिक कानून का इस्तेमाल केवल भावनात्मक असहमति या वैवाहिक असफलता के कारण नहीं होना चाहिए. ऐसा होने पर घर, जो कभी समझौते और पुनर्मिलन की जगह हो सकता है, कानूनी लड़ाई का मैदान बन जाता है. व्यापक आपराधिक आरोपों का भय परिवारों को वैवाहिक संबंधों में शामिल होने या उनका समर्थन करने से हतोत्साहित कर सकता है और आपराधिक कानून की गंभीरता भी कम हो सकती है. 

'महिलाओं की सुरक्षा महत्वपूर्ण, लेकिन हर आरोप जांच से परे नहीं'

अदालत ने यह भी साफ किया कि महिलाओं को घरेलू क्रूरता और दहेज संबंधी हिंसा से संरक्षण देना कानून का महत्वपूर्ण उद्देश्य है. लेकिन इस संरक्षण का अर्थ यह नहीं है कि वैवाहिक संबंध टूटने के बाद लगाए गए हर आरोप को बिना पर्याप्त विवरण के आपराधिक मुकदमे का आधार बना दिया जाए. 

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतों को दो मामलों से बचना होगा. पहला, केवल इस आधार पर हर वैवाहिक आपराधिक शिकायत को दुर्भावनापूर्ण मान लेना कि वह अलगाव या तलाक की कार्यवाही के बाद दर्ज हुई है. और दूसरा, केवल इसलिए हर आरोप को जांच से परे मान लेना कि शिकायत किसी महिला ने की है या उसमें महिलाओं के संरक्षण वाले आपराधिक प्रावधान लगाए गए हैं. 

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मारपीट और गला दबाने के आरोप भी पर्याप्त रूप से पुष्ट नहीं

अदालत ने कहा कि मारपीट और गला दबाने के आरोप गंभीर हैं, लेकिन उसके सामने पहले की घरेलू हिंसा शिकायत, पुलिस को तत्काल सूचना, उसी समय की पुलिस कार्रवाई या कथित चोटों से संबंधित चिकित्सकीय रिपोर्ट पेश नहीं की गई.

अदालत ने साफ किया कि इन कमियों के आधार पर अकेले FIR रद्द नहीं की जा सकती थी, लेकिन कम अवधि के साथ रहने, जल्दी अलग होने, पहले तलाक की कार्यवाही शुरू होने, उसके बाद FIR दर्ज होने और आरोपों में पर्याप्त विवरण के अभाव को साथ में देखने पर इन परिस्थितियों का महत्व बढ़ जाता है. 

अदालत ने यह भी साफ किया कि वह यह नहीं कह रही कि कथित घटनाएं असंभव थीं या पुलिस के पास जाने से पहले पत्नी के लिए दस्तावेजी सबूत देना जरूरी था. अदालत का निष्कर्ष केवल यह था कि जिस रूप में आपराधिक प्रक्रिया शुरू की गई, उसमें आरोप पर्याप्त रूप से विशिष्ट और परिस्थितियों में वस्तुनिष्ठ रूप से समर्थित नहीं थे. 

हाई कोर्ट ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोप यदि साबित होते तो अपराध बन सकते थे, लेकिन आरोप इतने सामान्य और सामूहिक थे कि वे आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकते. अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा. 

हाई कोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी कार्यवाहियां रद्द कर दीं. साथ ही यह भी साफ किया कि इस फैसले से पति-पत्नी के बीच चल रही वैवाहिक कार्यवाही के गुण-दोष पर कोई फैसला नहीं हुआ है और दोनों पक्ष संबंधित वैवाहिक अदालत में अपने कानूनी उपाय जारी रख सकते हैं.

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