- विवादित सरके चुनर गाने को लेकर अलीगढ़ के मुफ्ती ने एक्ट्रेस नोरा फतेही के खिलाफ फतवा जारी किया है
- भारत में फतवा सिर्फ धार्मिक राय माना जाता है. अदालतें इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं मानती हैं
- तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी जैसी हस्तियों को फतवे जारी होने के बाद निर्वासन में जिंदगी बितानी पड़ रही है
'सरके चुनर' गाने को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है. एक्ट्रेस नोरा फतेही और गीतकार रकीब आलम की सफाई भी काम नहीं आई. राष्ट्रीय महिला आयोग ने नोरा फतेही, एक्टर संजय दत्त, गीतकार आलम और अन्य को तलब कर लिया है. इस बीच उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से नोरा फतेही के खिलाफ फतवा जारी किया गया है. मुस्लिम पर्सनल दारुल इफ्ता के शाही चीफ मुफ्ती मौलाना इफराहीन हुसैन ने गाने को अश्लील बताते हुए इसे गुनाह-ए-कबीरा करार दिया है.
वैसे भारत में फतवों का इतिहास काफी पुराना और अक्सर विवादों से भरा रहा है. भारत में इसकी शुरुआत मुगल काल में मानी जाती है. फतवा इस्लाम में दरअसल एक धार्मिक राय या मार्गदर्शन होता है. मुफ्ती कुरान, हदीस या शरिया के आधार पर किसी मुद्दे को लेकर फतवा जारी करता है. भारत में फतवा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होता. अदालतें इसे महज धार्मिक सलाह मानती हैं. लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं, जब फतवों को लेकर काफी विवाद हुआ है. आइए डालते हैं, ऐसे ही कुछ मामलों पर एक नजर.
तस्लीमा नसरीनः फतवे से निर्वासन तक
बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन के खिलाफ कई फतवे जारी हो चुके हैं. बांग्लादेश में तो उनकी हत्या का फतवा 1993 में तभी जारी कर दिया गया था, जब उन्होंने लज्जा नाम का उपन्यास लिखा था. जान बचाने के लिए उन्हें नॉर्वे में शरण लेनी पड़ी थी. इसके बाद 2006 में भारत के कोलकाता में तस्लीमा की हत्या का फतवा जारी किया गया. कहा गया कि उनके उपन्यास और उनकी आत्मकथा के कुछ अंश इस्लाम विरोधी हैं. बाद में ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों और कई मौलवियों ने भी फतवे जारी किए. उनके सिर पर इनाम तक घोषित किए गए. इसके चलते तस्लीमा को कोलकाता छोड़ना पड़ा. वह अभी तक निर्वासित जिंदगी जी रही हैं.

देखें- नोरा फतेही के एक गाने को लेकर मुस्लिम पर्सनल दारुल इफ्ता ने जारी किया फतवा
सलमान रुश्दीः फतवा और करोड़ों का इनाम
19 जून 1947 को बॉम्बे (अब मुंबई) में एक कश्मीरी मुस्लिम परिवार में जन्मे सलमान रुश्दी के खिलाफ 1998 में उनकी चौथी किताब द सैटेनिक वर्सेज को लेकर ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खुमैनी ने मौत का फतवा जारी किया था. ईशनिंदा के आरोप में रुश्दी के सिर पर करोड़ों का इनाम रखा गया. इसकी वजह से उन्हें ब्रिटेन में छिपकर रहना पड़ा. 2022 में रुश्दी पर न्यूय़ॉर्क में एक प्रोग्राम के दौरान चाकू से हमला भी किया गया था, जिसमें उनकी एक आंख की रोशनी चली गई थी.

इमराना से ससुर ने किया रेप, फिर फतवा
इसे देश के सबसे विवादित फतवों में से एक माना जाता है. इमराना यूपी के मुजफ्फरनगर की रहने वाली थी. उसके साथ ससुर ने बलात्कार किया था. इसके बाद 2005 में दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी कर दिया कि बलात्कार के बाद इमराना अपने पति के लिए 'मां समान' हो गई है, ऐसे में वह पति के साथ नहीं रह सकती. इस फतवे की देशभर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और महिला संगठनों ने तीखी आलोचना की. इसे पीड़ित को दोबारा प्रताड़ित करने जैसा बताया गया. बाद में मुजफ्फरनगर की कोर्ट ने ससुर अली मोहम्मद को 10 साल की सजा सुनाई थी.
डिजाइनर बुर्का, फैशन के खिलाफ फतवा
मुस्लिम महिलाओं के पहनावे को लेकर भी समय-समय पर फतवे जारी होते रहे हैं. 2018 में दारुल उलूम देवबंद ने एक फतवे में कहा था कि महिलाओं का टाइट कपड़े और चमक-धमक या कढ़ाई वाले डिजाइनर बुर्का इस्लाम के खिलाफ है. कहा गया कि बुर्के का उद्देश्य शरीर को ढकना और सादगी दिखाना है, न कि ध्यान खींचना. हिजाब के नाम पर स्लिम फिट और डिजाइनर बुर्का हराम है और सख्ती से प्रतिबंधित है.

'भारत माता की जय' को लेकर फतवा
2016 में उस वक्त बड़ा विवाद खड़ा हो गया था, जब दारुल उलूम देवबंद ने फतवा जारी करके कहा था कि मुसलमान 'भारत माता की जय' नहीं बोल सकते क्योंकि ये इस्लाम के अनुरूप नहीं है. तर्क दिया गया कि इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत की इजाजत है और इस्लाम में देश को देवी की मूर्ति के रूप में पेश करना और उसके जयकारे लगाना जायज नहीं है. हालांकि ये भी कहा कि मुसलमान हिंदुस्तान जिंदाबाद और मादरे वतन जैसे नारे लगा सकते हैं. हालांकि कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने कहा था कि वतन से मोहब्बत इबादत का हिस्सा है और जयकारा लगाने में कोई बुराई नहीं है.
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कार्टून देखना भी इस्लाम में हराम!
इस्लाम में मनोरंजन पर भी अंकुश लगाने की कोशिश हो चुकी है. देवबंद ने एक सवाल के जवाब में 2013 में फतवा दिया था कि कार्टून देखना, यहां तक कि कॉमेडी कैरेक्टर वाले कार्टून भी गैर इस्लामी हैं. बच्चों को इन्हें नहीं देखना चाहिए. तर्क दिया गया था कि इस्लाम में तस्वीर बनाना या उसे बढ़ावा देना वर्जित है. हालांकि ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के एक सदस्य ने दारुल उलूम के इस फतवे की आलोचना करते हुए इसे इस्लाम का मखौल करार दिया था.
फतवे पर क्या कहता है कानून?
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2025 में शरीयत कानून और फतवों को लेकर बड़ा आदेश दिया था. कोर्ट ने कहा था कि काजी की अदालत यानी दारुल कजा और शरिया कोर्ट वगैरा की कानून में कोई मान्यता नहीं है. इनके द्वारा दिया गया कोई भी आदेश या निर्देश कानून में लागू नहीं होता, न ही उनका फैसला बाध्यकारी है. कोर्ट ने 2014 में विश्व लोचन मदान बनाम भारत सरकार मामले दिए गए फैसले को दोहराते हुए साफ कहा था कि ये संबंधित व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वो इसका पालन करता है या नहीं.
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