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This Article is From Mar 19, 2026

बोली के पीछे क्या है? नोरा फतेही का गाना तो नमूना है, समाज की बदनुमा हकीकत का आईना है

यह समस्या बेहद जटिल है. नोरा फतेही के गीत का किसी भी सूरत में समर्थन नहीं किया जा सकता. लेकिन क्या एक समाज के रूप में हमने ऐसी कसौटियां बनाई हैं, ऐसे मूल्य तय किए हैं जिनसे यह समझा जा सके कि क्या श्लील है और क्या अश्लील?

बोली के पीछे क्या है? नोरा फतेही का गाना तो नमूना है, समाज की बदनुमा हकीकत का आईना है
नोरा फतेही के गाने को विवाद के बाद यूट्यूब से हटा लिया गया है.
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नई दिल्ली:

देश अचानक अश्लीलता को लेकर चिंतित हो उठा है. इस बार मामला एक कन्नड़ फिल्म के हिंदी संस्करण के गीत का है. यह गीत नोरा फतेही नाम की नायिका पर फिल्माया गया है. गीत के बोल उन्मुक्त यौन इशारों से भरे हुए हैं. जाहिर है, ऐसे इशारों वाले गीतों का एक पूरा सिलसिला है जिसे अश्लील के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता. पहले भी जब ऐसे गीत आते हैं, तब अश्लीलता की बहस चल पड़ती है. कुछ दिन बाद सब भूल जाते हैं और फिर कोई नया गीत, कोई नया दृश्य अश्लीलता की नई बहस का न्योता देते हुए मैदान में आ जाता है.

कभी कभी अगंभीर लगती है अश्लीलता पर चर्चा

जाहिर है, इसके साथ यह खयाल भी होता है कि अश्लीलता की चर्चा फिल्म या गीत को प्रचार तो देगी ही, कई लोगों को मीठे पर भनभनाती मक्खियों की तरह सिनेमाघरों तक आने का मौका भी देगी. लेकिन इस तरह के गीतों में अश्लीलता की शिकायत चाहे जितनी वास्तविक और गंभीर हो, उस पर भारतीय समाज या सार्वजनिक माध्यमों में चल रही चर्चा बड़ी कृत्रिम, अगंभीर और कभी-कभी अश्लील भी लगती है. ऐसा लगता है जैसे सब बहती गंगा में हाथ धोना चाहते हों- एक ऐसी बहस छेड़ कर जिसमें कुछ टीआरपी मिलने की उम्मीद है और कुछ अपने संवेदनशील समझे जाने की प्रत्याशा.

अश्लीलता पर दी जाती हैं जानी-पहचानी दलीलें

दरअसल इस तरह की बहसों की जानी-पहचानी दलीलें हैं. फिल्म बनाने या गीत लिखने वाले कहते हैं कि लोग ऐसे गीत या दृश्य पसंद करते हैं, इसलिए वे लिखते हैं. दूसरी दलील यह होती है कि अश्लीलता दृश्य या गीत में नहीं, उसे देखने वाली निगाह और उससे जुड़ी कल्पना में होती है. तीसरी दलील यह होती है कि यह तो कला है और कला में खुलेपन की एक परंपरा रही है. बताने को उनके पास खजुराहो और अजंता-एलोरा के उदाहरण होते हैं. ज़्यादा पढ़े-लिखे लोग मंटो का उद्धरण देने लगते हैं और उससे भी ज्यादा पढ़े-लिखे लोग कालिदास की याद दिलाने लगते हैं.

खुलेपन की परंपरा से बड़ी मर्यादा की परंपरा

जबकि अश्लीलता विरोधियों के तर्क भी जाने-पहचाने होते हैं. उनके मुताबिक कला के खुलेपन और स्त्री-देह के वस्तुकरण में अंतर होता है कि कुत्सित कारोबारी मंशा से रचे गए ऐसे गीत या फिल्माए गए ऐसे दृश्य कलात्मकता का खयाल नहीं रखते, बल्कि बहुत बीमार और भोंडी किस्म की उन्मुक्तता को बढ़ावा देते हैं जिसका इकलौता मकसद लोगों की यौन-कुंठाओं का दोहन होता है. कुछ ज्यादा शीलवान विचारक याद दिलाते हैं कि खुलेपन की परंपरा से बड़ी मर्यादा की परंपरा है और दुनिया भर का महान सिनेमा या साहित्य इस मर्यादा के दायरे में बंधा हुआ होता है.

'मेरे अफसाने नहीं, यह जमाना नाकाबिले बर्दाश्त है-मंटो'

दोनों तरफ की ऐसी दलीलें और भी हो सकती हैं. यह सच है कि अश्लीलता के मानक अलग-अलग दौर में बदलते रहे हैं. पचास के दौर में फिल्मों के जो दृश्य अश्लील लगते थे, वे अब बिल्कुल शास्त्रीय और कलात्मक लगते हैं. कालिदास के यहां यौन-प्रसंगों का स्त्री-देह से जुड़े बिंबों का जो प्राचुर्य है, वह एक वर्ग को महान साहित्यिक लगता है तो दूसरा वर्ग उसमें अश्लीलता भी खोज सकता है. मंटो का यह मशहूर वाक्य भी बार-बार दुहराया जाता है कि मेरे अफसाने नहीं, यह जमाना नाकाबिले बर्दाश्त है.

समाज ने बनाईं अश्लील और श्लील समझाने वाली कसौटियां?

मगर यह सच है कि यह समस्या बेहद जटिल है. नोरा फतेही के गीत का किसी भी सूरत में समर्थन नहीं किया जा सकता. लेकिन क्या एक समाज के रूप में हमने ऐसी कसौटियां बनाई हैं, ऐसे मूल्य तय किए हैं जिनसे यह समझा जा सके कि क्या श्लील है और क्या अश्लील? क्या श्लील और अश्लील के बीच कोई सीधी रेखा खींचना संभव है? और क्या हम बहुत सारी अश्लीलताओं से घिरे नहीं हैं? बीते कुछ वर्षों से भारत में घर-घर पहुंच गए ओटीटी प्लैटफॉर्म्स पर जिस तरह की फिल्में या वेब सीरीज आती हैं, उनमें जिस तरह के विकृत दृश्य होते हैं, उनमें जैसी गालियां होती हैं, वे सब परिवारों के साथ बैठ कर देखने लायक नहीं होतीं- यह ज्यादातर लोग मानते हैं. बल्कि धीरे-धीरे हमें ऐसे दृश्य झेलने का, ऐसी गालियां सुनने का अभ्यास होता जा रहा है. क्या हम अश्लीलता को चुपचाप स्वीकार करते हुए समाज में बदलते जा रहे हैं? और क्या अश्लीलता सिर्फ गीतों या फिल्मों या चित्रों या साहित्य में स्त्री-देह या यौन प्रसंगों के चित्रण में होती है? 

क्या हम बहुत सारी दूसरी ऐसी प्रवृत्तियों के शिकार नहीं हैं जिन्हें कुछ और नहीं बस अश्लील कहा जा सकता है? बरसों पहले भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बनारस में 500 ब्राह्मणों के पांव धोए थे. तब समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया ने इस पर सख्त एतराज जताते हुए इसे अश्लील करार दिया था. उन्होंने कहा था कि जिस समाज में जाति के आधार पर पांव धोए जाते हों, वह एक उदास समाज होता है. भारतीय समाज में व्यवहार के स्तर पर जितने पाखंड हैं, क्या वे सब अश्लील नहीं हैं? हम सब जाति के विरुद्ध हैं, लेकिन अपनी जाति में लड़की खोजते हैं, हम सब दहेज के खिलाफ हैं, लेकिन दहेज घट नहीं रहा, हम सब भ्रष्टाचार को दुत्कारते हैं, लेकिन रिश्वतखोरी कम नहीं हो रही, हम सब सर्वधर्म समभाव और वसुधैव कुटम्बकम में भरोसा करते हैं, लेकिन जगह-जगह दंगाई मानसिकता दिखाई पड़ती है. 

हम सब अश्लील फिल्मों की निंदा करते हैं, लेकिन वे फिल्में बेहद कामयाब साबित होती हैं. स्त्रियों को हम देवी बताते हैं, मां-बहन कह कर पुकारते हैं, लेकिन हमारे यहां हर पंद्रह मिनट पर एक बलात्कार हो जाता है. क्या यह अपने-आप में एक बीमार और अश्लील समाज की निशानी नहीं है?

चर्चाओं और चिंताओं में दिखता है खोखलापन!

सड़क पर अश्लीलता के खिलाफ प्रदर्शन हों या संसद में अश्लीलता पर जताई गई चिंता, वहां भी यह खोखलापन दिखाई पड़ता है. बुरा यह होता है कि अक्सर ऐसी चिंताओं की मार उन कला माध्यमों को झेलनी पड़ती है जो अपनी प्रकृति में उन्मुक्त तो हो सकते हैं, लेकिन अश्लील नहीं होते. सआदत हसन मंटो और इस्मत चुगतई को अपनी उन कहानियों की वजह से मुकदमों का सामना करना पड़ा जो दरअसल समाज की बदनुमा हकीकत का आईना बन कर आईं या जिन्होंने किसी छुपे हुए कुरूप सच को सामने लाने की जुर्रत की. अफसोस कहें या अचरज करें, अक्सर बाजार अपनी अश्लीलताओं को छुपाने के लिए इन महान कलाओं और कृतियों की आड़ लेता है. 

निस्संदेह, यह सब पहले से चली आ रही प्रवृत्तियां हैं, लेकिन आज के दौर में सामाजिक मूल्यों का संकट हमारे समय की एक वास्तविक चुनौती है. परिवारों की टूटन, दांपत्य संबंधों के बिखराव, रिश्तों का सिकुड़ते चले जाना, अकेले पड़ते लोगों के आत्मलीन आग्रह- इन सबके बीच व्यावसायिकता इकलौता मूल्य है. जो चीजें, विचार या कलाएं व्यावसायिक रूप से कामयाब हैं. वही सार्थक हैं, बाकी बेकार हैं- यह आग्रह लगातार बड़ा होता जा रहा है. इसलिए अच्छी कविता या अच्छे सिनेमा का कोई मोल नहीं है. बल्कि यह अच्छी कृति भी इस व्यावसायिक संसार में आकर बस प्रदर्शन की वस्तु बन जाती है. यह प्रदर्शनप्रियता इस सेल्फीकेंद्रित, रीलोन्मत्त समाज में बाकी सब चीजों को व्यर्थ बना रही है.

ऐसे में किसी नोरा फतोही के किसी अश्लील गाने पर चल रही बहस और उस पर लिखी जा रही कोई टिप्पणी बस एक दिलचस्प शीर्षक की तलाश कर ही सार्थक हो सकती है. इसीलिए इस लेख का वह शीर्षक है जो दिया गया है- क्योंकि यह गंभीर दिखते हुए भी शायद गंभीर नहीं है. वैसे भी एप्सटीन फाइलों की मारी इस विकृत दुनिया में अश्लीलता पर बहस कितनी गंभीर हो सकती है- चाहे वह सड़क पर चले या संसद में?

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