Talking Fatigue Causes: हम सभी को लगता है कि जो लोग भारी काम करते हैं, दौड़-भाग करते हैं या ज्यादा फिजिकल वर्क करते हैं, वही ज्यादा थकते हैं. लेकिन, क्या आपने कभी गौर किया है कि दिनभर बोलने, समझाने, मीटिंग लेने, पढ़ाने या फोन पर बात करने के बाद भी शरीर टूट-सा जाता है? कई बार तो ऐसा लगता है जैसे पूरे दिन कोई भारी मेहनत की हो, जबकि काम सिर्फ बोलने का था. यह थकान केवल मन की नहीं होती, बल्कि इसका सीधा असर शरीर पर भी पड़ता है. दरअसल बोलना एक पूरी बॉडी एक्टिविटी है, जिसमें दिमाग, नसें, सांस, मसल्स और हार्मोन एक साथ काम करते हैं. यहां आसान भाषा में समझिए कि दिनभर बोलने से शरीर क्यों थक जाता है और इसके पीछे कौन-से 5 बड़े कारण जिम्मेदार हैं.
दिनभर बोलने से शरीर क्यों थक जाता है? | Why Does Talking All Day Make the Body Tired?
1. दिमाग पर लगातार दबाव पड़ता है
बोलना सिर्फ आवाज निकालना नहीं है. जब हम बोलते हैं, तब दिमाग को लगातार यह काम करना पड़ता है. क्या बोलना है, कैसे बोलना है, सामने वाला कैसे रिएक्ट करेगा, सही शब्द कौन-सा है.
खासकर टीचर, कॉल सेंटर कर्मचारी, डॉक्टर, सेल्स प्रोफेशनल या मैनेजर्स इन सभी को दिनभर सोच-समझकर बोलना पड़ता है. इससे दिमाग की एनर्जी जल्दी खत्म होती है. जब मेंटल एनर्जी गिरती है, तो शरीर भी थकान महसूस करता है.
2. सांस लेने का पैटर्न बिगड़ जाता है
लगातार बोलने से हमारी नेचुरल ब्रीदिंग (सांस लेने की प्रक्रिया) प्रभावित होती है. कई लोग बोलते समय उथली सांस लेते हैं, ठीक से सांस रोक नहीं पाते, बार-बार सांस की कमी महसूस करते हैं.
इससे शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती. ऑक्सीजन की कमी सीधे-सीधे थकान, भारीपन और सुस्ती का कारण बनती है. इसलिए बोलने के बाद शरीर ढीला-सा लगने लगता है.

3. गले और चेहरे की मसल्स भी थकती हैं
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि बोलने में भी मसल्स काम करती हैं जैसे गले की मांसपेशियां, जबड़े की मसल्स, जीभ और होंठ. दिनभर बोलने से ये मसल्स लगातार एक्टिव रहती हैं. ठीक वैसे ही जैसे चलने से पैरों की मसल्स थकती हैं, वैसे ही ज़्यादा बोलने से वॉइस मसल्स थक जाती हैं. इसका असर पूरे शरीर पर महसूस होता है.
4. भावनात्मक एनर्जी भी खर्च होती है
अगर आपका काम ऐसा है जहां आपको लोगों को समझाना पड़ता है, शिकायतें सुननी पड़ती हैं, विनम्र रहना पड़ता है, गुस्सा छिपाना पड़ता है. तो यह सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि भावनात्मक थकान (Emotional Fatigue) भी होती है. भावनाओं को कंट्रोल करना शरीर के लिए बहुत एनर्जी-कंज़्यूमिंग काम है. यही कारण है कि ज़्यादा बोलने वाले लोग शाम तक बेहद थके हुए महसूस करते हैं, चाहे उन्होंने कोई भारी काम न किया हो.
5. स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाता है
लगातार बातचीत, प्रेज़ेंटेशन या पब्लिक डीलिंग से शरीर में कॉर्टिसोल (Stress Hormone) बढ़ सकता है. यह हार्मोन थोड़े समय के लिए फोकस बढ़ाता है, लेकिन अगर यह लगातार हाई रहे, तो थकान बढ़ती है, मांसपेशियों में भारीपन आता है, सिरदर्द और कमजोरी महसूस होती है. यही वजह है कि दिनभर बोलने के बाद शरीर खाली-खाली सा लगने लगता है.
इस थकान से कैसे बचें?
- बोलते समय बीच-बीच में गहरी सांस लें.
- पानी पर्याप्त मात्रा में पिएं.
- काम के बीच मौन (Silence) का छोटा ब्रेक लें.
- दिन के अंत में आंखें बंद कर 5–10 मिनट आराम करें.
- आवाज़ पर ज़ोर डालकर बोलने से बचें.
दिनभर बोलने से होने वाली थकान कोई कल्पना नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक और शारीरिक प्रक्रिया है. जब दिमाग, सांस, मसल्स और भावनाएं सब एक साथ लगातार काम करते हैं, तो शरीर का थकना स्वाभाविक है. इसलिए अगर आप बोलने वाला काम करते हैं और शाम को खुद को बेहद थका हुआ महसूस करते हैं, तो खुद को कमजोर न समझें यह आपके शरीर का संकेत है कि उसे भी आराम चाहिए.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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