- बिहार की 5 राज्यसभा सीटों के चुनाव में हर उम्मीदवार को जीत के लिए कम से कम 41 विधायकों के वोटों की जरूरत होगी.
- NDA के पास कुल 202 विधायकों के समर्थन के बावजूद पांचवीं सीट के लिए आवश्यक वोटों में तीन की कमी है.
- उपेन्द्र कुशवाहा RLM से उम्मीदवार होंगे और एनडीए के चार अन्य उम्मीदवारों के साथ चुनाव मैदान में हैं.
अगर बिहार की 5 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव की नौबत आती है तो हर उम्मीदवार को कम से कम 41 वोटों की ज़रूरत पड़ेगी. संख्या बल को देखें तो अपने 4 उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के बाद NDA के पास 38 वोट बचेंगे जो जरूरत से 3 कम है. बिहार की 5 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव के लिए NDA की सहयोगी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा भी उम्मीदवार होंगे. कुशवाहा 5 मार्च को अपना नामांकन भरेंगे, जिसमें NDA के सभी नेता शामिल होंगे. 5 राज्यसभा सीटों के लिए कुशवाहा और BJP अध्यक्ष नितिन नवीन समेत एनडीए के 5 उम्मीदवार मैदान में होंगे.
इंडिया गठबंधन ने उम्मीदवार उतारा तो होगा चुनाव
अगर इंडिया गठबंधन ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे तो पांचों उम्मीदवार निर्विरोध चुनाव जीत जाएंगे लेकिन इस बात की प्रबल संभावना है कि इंडिया गठबंधन की ओर से RJD के वर्तमान राज्यसभा सांसद एडी सिंह भी नामांकन कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो फिर चुनाव की नौबत आएगी जो 16 मार्च को होगा.
बिहार से राज्यसभा का चुनाव जीतने के लिए 41 विधायकों के वोट की जरूरत
बिहार विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 243 है और इस राज्यसभा चुनाव में चुनाव की नौबत आने पर हर उम्मीदवार को जीत के लिए कम से कम 41 विधायकों के वोट की ज़रूरत है. अब चूंकि विधानसभा में NDA के कुल सदस्यों की संख्या 202 है लिहाज़ा उसके 4 उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित होने के बाद 38 वोट और बचते हैं जो पांचवीं सीट पर जीत दिलवाने के लिए ज़रूरी संख्या से महज 3 वोट कम है.
उपेंद्र कुशवाहा को अपने पुराने दोस्त से उम्मीद
ऐसे में सवाल ये है कि जीत के लिए ज़रूरी 3 और वोटों का जुगाड़ आख़िर उपेन्द्र कुशवाहा कैसे करेंगे? सूत्रों के मुताबिक़ एनडीए की नज़र BSP और IIP जैसी छोटी पार्टियों पर तो होगी ही जिसके 1-1 विधायक हैं. असदुद्दीन ओवैसी के 5 विधायक भी कुशवाहा के लिए जीवनदान बन सकते हैं.
ओवैसी की पार्टी AIMIM के बिहार में 5 विधायक हैं. वैसे तो ओवैसी की पार्टी का NDA से दूर-दूर तक नाता नहीं रहता है लेकिन यहीं पर ओवैसी की पुरानी दोस्ती कुशवाहा के काम आ सकती है.
2020 में कुशवाहा ने ओवैसी के साथ मिलकर लड़ा था चुनाव
2020 में उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी ने ओवैसी, BSP और कुछ अन्य दलों के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था. इस गठबंधन को ग्रैंड सेक्युलर डेमाक्रेटिक फ्रंट का नाम दिया गया था. तब कुशवाहा की पार्टी तो कुछ खास नहीं कर पाई थी लेकिन ओवैसी की पार्टी ने अप्रत्याशित तौर पर 5 सीटें हासिल की थीं.
अब ओवैसी से 6 साल पहले की गई वही दोस्ती कुशवाहा के काम आ सकती है. अगर ओवैसी के 5 विधायक कुशवाहा को समर्थन कर दें तो वो आसानी से चुनाव जीत जाएंगे.
ओवैसी के विधायक किसे करेंगे वोट?
इतना ही नहीं, कुशवाहा अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा से उम्मीदवार होंगे, न कि बीजेपी से . ऐसे में ओवैसी के विधायकों को कुशवाहा को वोट करने से कोई गुरेज नहीं होगा. वैसे भी, ओवैसी की पार्टी का RJD या इंडिया गठबंधन के साथ रिश्ता बहुत सौहार्दपूर्ण नहीं रहा है. 2020 में ओवैसी के जीते 5 विधायकों में से 4 को आरजेडी ने तोड़कर अपने साथ ले लिया था.
2025 के विधानसभा चुनाव में भी ओवैसी ने खुले तौर पर इंडिया गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए तेजस्वी यादव को पत्र लिखा लेकिन तेजस्वी ने कोई जवाब नहीं दिया और उस प्रस्ताव को नकार दिया.
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