चांदीपुरा वायरस (सीएचपीवी) एक बार फिर चिंता बढ़ा रहा है. गुजरात और राजस्थान में इसके मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट पर है. सबसे बड़ी बात ये है कि ये वायरस 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक माना जा रहा है. डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों का दिगाम और इम्यून सिस्टम पूरी तरह डेवलप नहीं होता, इसलिए ये वायरस उनके सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर तेजी से असर डाल सकता है. ऐसे में माता-पिता को इसके लक्षणों को हल्के में लेने की गलती बिल्कुल नहीं करनी चाहिए.
चांदीपुरा वायरस बच्चों के लिए क्यों है ज्यादा खतरनाक?
डॉक्टरों के मुताबिक, चांदीपुरा वायरस का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर देखने को मिलता है. ये वायरस शरीर में पहुंचने के बाद सीधे सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर हमला कर सकता है. बच्चों की इम्यूनिटी और ब्रेन पूरी तरह विकसित नहीं होने के कारण इंफेक्शन तेजी से गंभीर रूप ले सकता है. यही वजह है कि कुछ मामलों में 24 से 48 घंटे के भीतर हालत काफी बिगड़ जाते हैं.
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कैसे फैलता है यह वायरस?
ये वायरस मुख्य रूप से सैंडफ्लाई के काटने से फैलता है. कुछ मामलों में मच्छरों को भी इसके फैलने का कारण माना जाता है. हालांकि राहत की बात ये है कि ये वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता. यानी वायरस की चपेट में आए बच्चे के संपर्क में आने से भी इंफेक्शन नहीं होता.

किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें?
चांदीपुरा वायरस के लक्षण बहुत तेजी से सामने आते हैं. शुरुआत में तेज बुखार, लगातार उल्टी, जी मिचलाना, तेज सिरदर्द और शरीर में दर्द महसूस हो सकता है. इसके बाद बच्चे को चक्कर आना, ज्यादा सुस्ती, बेहोशी, ब्रेन फॉग या दौरे पड़ने जैसी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं. यदि ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
क्या इसका इलाज या टीका मौजूद है?
फिलहाल चांदीपुरा वायरस के लिए कोई खास दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है. डॉक्टर मरीज का इलाज उसके लक्षणों के आधार पर करते हैं. बुखार को नियंत्रित करना, दौरे रोकना और जरूरत पड़ने पर आईसीयू में इलाज देना ही सबसे इफेक्टिव तरीका माना जाता है. इसलिए समय पर अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी है.
बच्चों को कैसे रखें सुरक्षित?
इस वायरस से बचाव का कोई टीका नहीं है, इसलिए सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है. बच्चों को सोते समय मच्छरदानी के अंदर सुलाएं और बाहर जाते समय पूरी आस्तीन के कपड़े पहनाएं. घर के आसपास साफ-सफाई रखें. पानी जमा न होने दें और मिट्टी की दीवारों या दरारों को भर दें. क्योंकि सैंडफ्लाई ऐसी जगहों पर पनपती है. जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य विभाग की सलाह के अनुसार कीटनाशकों का छिड़काव भी कराया जा सकता है.
डॉक्टरों की क्या सलाह है?
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान बच्चों को होने वाले तेज बुखार या लगातार उल्टी को सामान्य वायरल इंफेक्शन समझकर नजरअंदाज न करें. यदि बच्चे की तबीयत अचानक बिगड़ने लगे या दौरे पड़ें तो बिना देरी किए उसे आईसीयू वाले नजदीकी अस्पताल ले जाएं. समय पर इलाज मिलने से इंफेक्शन का खतरा कम किया जा सकता है.
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