- दिल्ली के द्वारका से एक 20 वर्षीय छात्रा के पेट से एक किलो से अधिक बालों का गुच्छा ऑपरेशन से निकाला गया
- लड़की को लगभग ग्यारह सालों से बाल नोचकर खाने की आदत थी, जिसे ट्राइकोफेगिया कहा जाता है
- बालों का गुच्छा पेट के अंदर इतना बड़ा और ठोस था कि उसे एंडोस्कोपी से निकालना संभव नहीं था
कई बार हमारी कुछ ऐसी छोटी और अजीब आदतें होती हैं, जिन पर हम खुद ध्यान नहीं देते या फिर शर्म की वजह से किसी को बताते नहीं हैं. पर वक्त बीतने के साथ वही आदतें जानलेवा बन जाती हैं. दिल्ली के द्वारका इलाके से एक ऐसा ही बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां 20 साल की एक कॉलेज छात्रा के पेट से डॉक्टरों ने ऑपरेशन करके एक किलो से ज्यादा वजनी बालों का गुच्छा निकाला है. सुनकर ही अजीब लगता है, लेकिन ये लड़की पिछले करीब ग्यारह सालों से लगातार अपने ही बाल नोचकर खा रही थी.
जब दर्द बर्दाश्त से बाहर हुआ
लड़की की तबियत अचानक बहुत ज्यादा खराब हो गई थी. उसे पेट में बहुत तेज दर्द उठ रहा था, जी मिचला रहा था और तीन दिनों से लगातार उल्टियां हो रही थीं. घरवाले परेशान होकर उसे फौरन द्वारका के मणिपाल अस्पताल ले गए.
वहां जांच के दौरान लड़की ने और उसके परिजनों ने बताया कि ये परेशानी सिर्फ तीन दिन की नहीं है. लड़की को पिछले काफी समय से भूख नहीं लग रही थी, उसका वजन लगातार घट रहा था और वह हर वक्त थकी-थकी सी महसूस करती थी.
शुरुआती जांच में डॉक्टरों को हुआ शक
अस्पताल में जब डॉक्टरों ने लड़की के पेट के ऊपरी हिस्से को छूकर देखा, तो उन्हें वहां एक बहुत ही सख्त गांठ या भारीपन महसूस हुआ. पहली नजर में समझ पाना मुश्किल था कि ये रसोली है या कोई और बीमारी. डॉक्टरों ने बिना देर किए आगे की जांच शुरू की. जब अपर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल एंडोस्कोपी की गई, तो मॉनिटर पर जो दिखा उसे देखकर खुद डॉक्टर भी सन्न रह गए.
पेट के अंदर बालों का एक बहुत बड़ा और ठोस जमावड़ा था. मेडिकल भाषा में पेट में जमा ऐसे बालों के गुच्छे को ट्राइकोबेजोआर कहा जाता है. लड़की के पेट का एक बड़ा हिस्सा पूरी तरह से इन बालों से भरा हुआ था, जिसके चलते खाना पचने या अंदर रुकने की जगह ही नहीं बची थी.
बाल खाने की लत यानी ट्राइकोफेगिया
डॉक्टरों ने जब मरीज और परिजनों से गहराई से बात की, तो पता चला कि यह लड़की जब करीब नौ साल की थी, तभी से उसे अपने बाल चबाने और निगलने की आदत पड़ गई थी. मेडिकल साइंस में बाल खाने की इस दिमागी और व्यवहारिक बीमारी को ट्राइकोफेगिया कहा जाता है.
अक्सर लोग इसे सिर्फ एक बुरी लत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन शरीर के भीतर इसका असर बहुत खतरनाक होता है. हमारे शरीर का पाचन तंत्र ऐसा बना है कि वह बालों को कभी भी पचा नहीं सकता. जब कोई इंसान बार-बार बाल निगलता रहता है, तो वे आमाशय में जाकर धीरे-धीरे फंसने लगते हैं. वक्त के साथ जब हम खाना खाते हैं, तो खाने के कण और म्यूकस भी इन बालों के साथ चिपकते जाते हैं. धीरे-धीरे यह सब मिलकर एक पत्थर जैसा ठोस और भारी गोला बन जाता है.
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अंदर का नजारा और ऑपरेशन की बड़ी चुनौती
इस मामले में डॉक्टरों के सामने चुनौती बहुत बड़ी थी क्योंकि बालों का यह गुच्छा कोई छोटा-मोटा नहीं था. इसका आकार अंग्रेजी के अक्षर J जैसा बन चुका था. यह गुच्छा फूड पाइप यानी खाने की नली के जोड़ से शुरू होकर पूरे पेट को भरते हुए छोटी आंत के मुहाने तक फैल गया था.
इसकी वजह से पेट में बहुत ज्यादा सूजन आ गई थी और अंदर कोई भी मेडिकल औजार घुमाने की जगह तक नहीं बची थी.
ऑपरेशन के दौरान क्या-क्या हुआ:
- डॉक्टरों ने सबसे पहले एंडोस्कोपी के जरिए बालों के गुच्छे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर बाहर निकालने की कोशिश की.
- लेकिन गुच्छा इतना ज्यादा ठोस और बड़ा था कि एंडोस्कोप से उसे बाहर निकालना पूरी तरह नामुमकिन साबित हुआ.
- डॉक्टरों की टीम ने जोखिम को भांपते हुए लैप्रोस्कोपिक तकनीक का सहारा लेने का फैसला किया.
- पेट की अंदरूनी परत यानी लाइनिंग को नुकसान पहुंचाए बिना इस भारी गुच्छे को अलग करना बेहद पेचीदा काम था, क्योंकि जरा सी चूक से पेट फटने या ब्लीडिंग का खतरा था.
- डॉक्टरों ने पेट में एक बहुत छोटा सा चीरा लगाया और कैमरे की निगरानी में बहुत सावधानी से पूरे गुच्छे को बाहर खींचा.
जब ऑपरेशन के बाद उस निकाले गए गुच्छे का वजन किया गया, तो वह पूरा 1.16 किलोग्राम का निकला. इतने बड़े साइज का ट्राइकोबेजोआर डॉक्टरों ने भी अपने करियर में बहुत कम देखा था.
सर्जरी के बाद अब कैसी है हालत
मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ मिनिमल एक्सेस, बेरिएट्रिक, जीआई एंड रोबोटिक सर्जरी के चेयरमैन डॉक्टर संदीप अग्रवाल ने बताया कि यह केस वाकई काफी जटिल था. पेट इस विशालकाय ट्राइकोबेजोआर से खचाखच भरा था और अंदर काम करने की गुंजाइश न के बराबर थी. अगर थोड़ी भी देर होती तो पेट की लाइनिंग डैमेज हो सकती थी.
राहत की बात यह रही कि सर्जरी पूरी तरह कामयाब रही. ऑपरेशन के बाद लड़की की हालत में तेजी से सुधार देखने को मिला. धीरे-धीरे उसे दोबारा भूख लगने लगी और वह खाना पचाने में सक्षम हो गई. कुछ ही हफ्तों में उसका वजन भी सुधरने लगा और अब वह अपनी पढ़ाई पर वापस लौट चुकी है.
साल-दर-साल क्यों छिप जाती है यह बीमारी?
डॉक्टरों का कहना है कि ट्राइकोबेजोआर के मामले अक्सर कई सालों तक सामने नहीं आते. इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि जो लोग बाल खाते हैं, वे इसे कोई गंभीर बीमारी नहीं मानते. कई बार बच्चों या टीनेजर्स को खुद समझ नहीं आता कि वे क्या कर रहे हैं, या फिर डांट और शर्म के डर से वे डॉक्टर या माता-पिता को कभी सच नहीं बताते.
लगातार बाल खाने के कुछ अहम लक्षण:
- पेट में हर वक्त भारीपन, खिंचाव या हल्का-हल्का दर्द बने रहना.
- खाना खाने की बिल्कुल इच्छा न होना या बहुत कम भूख लगना.
- बिना किसी साफ वजह के शरीर का वजन तेजी से गिरना.
- पेट के ऊपरी हिस्से में कोई सख्त या उभरी हुई गांठ जैसी महसूस होना.
- खाना खाते ही उल्टियां होना या बार-बार मितली आना.
सिर्फ सर्जरी ही पूरा इलाज नहीं
डॉक्टरों ने इस बात पर खास जोर दिया है कि पेट से बालों का गुच्छा निकाल देना तो सिर्फ तात्कालिक खतरे को टालना भर है. यह शारीरिक इलाज तो हो गया, लेकिन जिस वजह से यह सब हुआ, यानी बाल खाने की मानसिक लत, उसका इलाज होना सबसे ज्यादा जरूरी है.
अगर मरीज की काउंसलिंग न कराई जाए और उसकी साइकोलॉजिकल मदद न की जाए, तो बहुत मुमकिन है कि वह ठीक होने के बाद दोबारा बाल खाना शुरू कर दे. इसलिए ट्राइकोफेगिया जैसी समस्याओं को समय रहते पहचानना, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय लेना और पेट से जुड़ी पुरानी तकलीफों को हल्के में न लेना ही इसका पक्का समाधान है.
(हेडलाइन के अलावा, इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है, यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं