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अब सड़क नहीं, आसमान का रास्ता! ड्रोन से लैब तक पहुंचेंगे टीबी जांच के सैंपल

टीबी फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाली गंभीर बीमारी है. लेकिन अब दूर-दराज के इलाकों में ड्रोन से सैंपल पहुंचेगा. इससे जांच तेज होगी, इलाज समय पर शुरू होगा.

अब सड़क नहीं, आसमान का रास्ता! ड्रोन से लैब तक पहुंचेंगे टीबी जांच के सैंपल
अब ड्रोन से भेजा जाएगा टीबी जांच का सैंपल.
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टीबी (Tuberculosis) एक गंभीर संक्रामक बीमारी है जो 'माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस' नामक बैक्टीरिया के कारण होती है. लेकिन अब मरीजों को टीबी की रिपोर्ट के लिए हफ्तों इंतजार नहीं करना पड़ेगा. क्योंकि अब ड्रोन से सैंपल भेजना होगा आसान.  दरअसल पहले क्या होता था? गांव और दूर-दराज के इलाकों से टीबी के मरीजों के बलगम या खून के सैंपल सड़क के रास्ते लैब तक पहुंचते थे. जिसमें ट्रैफिक, खराब सड़क और लंबी दूरी की वजह से सैंपल को पहुंचने में 2 से 3 दिन लग जाते थे. कई बार सैंपल खराब भी हो जाता था. नतीजा मरीज की रिपोर्ट लेट आती थी और इलाज में देरी होती थी. लेकिन अब तस्वीर बदलने वाली है. अब सड़क नहीं, आसमान का रास्ता चुना जाएगा.  

कहां हुआ अध्ययन?

स्टडी तेलंगाना के यादाद्री-भुवनगिरि जिले में किया गया. इसमें ICMR ने AIIMS बिबीनगर और राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम  के जिला टीबी कार्यालय के साथ मिलकर काम किया. इसमें 840 लोगों को शामिल किया गया.

कैसे किया गया अध्ययन?

शोधकर्ताओं ने दो व्यवस्थाओं की तुलना की. पहली व्यवस्था (पुरानी प्रणाली)- मरीजों को टीबी की जांच कराने के लिए खुद लंबी दूरी तय करके टीबी जांच केंद्र  जाना पड़ता था. इसमें समय और पैसे दोनों अधिक खर्च होते थे. 

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टीबी के सैंपल अब ड्रोन से जाएंगे. (Image NDTV) 

दूसरी व्यवस्था (ड्रोन प्रणाली)- मरीज अपने गांव के नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या सब-सेंटर पर बलगम का सैंपल जमा करते थे. वहां से ड्रोन सैंपल को सीधे टीबी जांच प्रयोगशाला तक पहुंचाता था.

क्या मिले नतीजे?

  • जांच रिपोर्ट मिलने का समय काफी घटा
  • पहले टीबी की पुष्टि होने में औसतन 15 दिन लगते थे
  • ड्रोन के इस्तेमाल के बाद यह समय घटकर सिर्फ 5 दिन रह गया
  • मरीजों की बीमारी का पता पहले से 10 दिन जल्दी चलने लगा. 
  • इलाज जल्दी शुरू होने लगा. 
  • मरीजों का खर्च लगभग खत्म हो गया
  • पहले औसतन खर्च लगभग ₹9,451 था
  • ड्रोन व्यवस्था लागू होने के बाद यह घटकर लगभग ₹91 रह गया
  • मरीजों को दूर शहर नहीं जाना पड़ा, यात्रा का खर्च बचेगा 
  • काम से छुट्टी लेने की जरूरत कम हुई, इसलिए मजदूरी का नुकसान भी घटा
  • गांव के पास ही सैंपल जमा करने की सुविधा मिल गई

ड्रोन नेटवर्क कैसे काम करता था?

इस परियोजना में ड्रोन नेटवर्क के जरिए 11 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र,60 सब-सेंटर और 4 टीबी यूनिट  को आपस में जोड़ा गया. इससे गांवों के मरीजों को केवल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र तक जाना पड़ा और आगे का काम ड्रोन ने संभाल लिया. अध्ययन में शामिल स्वास्थ्य कर्मियों ने बताया कि ड्रोन से सैंपल जल्दी पहुंचने लगे. काम अधिक व्यवस्थित और तेज हो गया. शुरुआत में लोगों को नई तकनीक समझानी पड़ी, लेकिन बाद में समुदाय ने इसे अच्छी तरह स्वीकार कर लिया.

क्या चुनौतियां सामने आईं?

  • अध्ययन में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं, जैसे, खराब मौसम में ड्रोन उड़ाने में दिक्कत
  • ड्रोन की वजन ले जाने की सीमित क्षमता
  • कर्मचारियों को लगातार प्रशिक्षण देने की जरूरत

ICMR ने क्या कहा?

ICMR के महानिदेशक और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव डॉ. राजीव बहल ने कहा कि समय पर और सस्ती जांच टीबी खत्म करने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है. यह अध्ययन दिखाता है कि ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. यह व्यवस्था खासकर दूर-दराज और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए बहुत फायदेमंद साबित होंगी.

i-DRONE पहल क्या है?

ICMR का i-DRONE कार्यक्रम स्वास्थ्य सेवाओं में ड्रोन के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है. इसके तहत ड्रोन की मदद से वैक्सीन, दवाइयां, खून और ब्लड प्रोडक्ट्स, जांच के सैंपल और ऊतक सी जरूरी चिकित्सा सामग्री को कठिन और दूरस्थ इलाकों तक सुरक्षित और तेजी से पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जा रही है.

इस अध्ययन का महत्व-

यह अध्ययन फिलहाल केवल तेलंगाना के एक जिले में किया गया है. हालांकि, इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यदि इस मॉडल को अन्य राज्यों और दुर्गम क्षेत्रों में भी लागू किया जाए, तो टीबी की जांच और इलाज को तेज, सस्ता और अधिक सुलभ बनाया जा सकता है. इससे भारत के टीबी मुक्त भारत लक्ष्य को हासिल करने में भी मदद मिल सकती है.

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