नई दिल्ली में चल रही बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड चैंपियनशिप 2026 के मुकाबलों के दौरान भारतीय बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधु को कोर्ट पर एक बहुत ही अनोखे गैजेट के साथ देखा गया. सिंधु के माथे के किनारे यानी कनपटी के पास एक छोटा सा डिवाइस लगा हुआ था, जिसने खेल प्रेमियों और जानकारों का ध्यान अपनी तरफ खींचा. यह कोई आम स्मार्टवॉच या फिटनेस बैंड नहीं है, बल्कि इसे सीधे सिर के पास लगाकर दिमाग के अंदर होने वाली हलचल और सिग्नल्स को मापने के लिए बनाया गया है.
'टेंपल' नाम का यह छोटा सा वियरेबल दिमाग में खून के बहाव और ऑक्सीजन के स्तर जैसे जरूरी पैमानों को ट्रैक करता है. इससे पहले सिंधु को अप्रैल में थॉमस और उबर कप के दौरान भी यह पहने देखा गया था. यह डिवाइस जोमैटो के को-फाउंडर दीपिंदर गोयल से जुड़ी एक टीम ने तैयार किया है, जिसके बारे में उन्होंने खुद भी बात की थी. सिंधु जैसी दिग्गज एथलीट का इसे पहनकर कोर्ट पर उतरना यह साफ दिखाता है कि आज का खेल जगत केवल दिल की धड़कन, कदम और नींद नापने से बहुत आगे निकल चुका है. अब सारा फोकस इस बात पर है कि कड़े मुकाबले के दौरान खिलाड़ी का दिमाग कैसे काम करता है.
यह डिवाइस असल में क्या-क्या नापता है?
अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद के न्यूरोलॉजी विभाग के हेड डॉ. संजय पांडे बताते हैं कि दिमाग को ट्रैक करने वाले इस गैजेट की सबसे खास बात केवल कोई नंबर दिखाना नहीं है. असली बात यह है कि क्या ये आंकड़े दबाव के समय दिमाग के काम करने के तरीके को सही से समझा पाते हैं.
डॉ. पांडे के मुताबिक, पीवी सिंधु जिस 'टेंपल' नाम के डिवाइस को पहन रही हैं, वो दिमाग के ब्लड फ्लो और कॉग्निटिव लोड यानी मानसिक दबाव को मापता है. जब कोई खिलाड़ी बहुत तेज खेल खेलता है, तो उसके शरीर के साथ-साथ दिमाग पर भी बहुत भारी लोड पड़ता है. आम फिटनेस बैंड दिल की धड़कन, पल्स, कदम या खून में ऑक्सीजन नापते हैं. लेकिन माथे पर लगने वाला यह छोटा सा गैजेट दिमाग की अंदरूनी गतिविधियों को समझने की कोशिश करता है.
फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा की सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. नेहा पंडिता का कहना है कि पीवी सिंधु का यह डिवाइस इस्तेमाल करना खेल तकनीक में आ रहे बड़े बदलाव का सबूत है. अब तक हम सिर्फ इस बात पर ध्यान देते थे कि शरीर ने कितनी कैलोरी जलाई या हार्ट रेट कितना रहा. पर अब असली दिलचस्पी यह जानने में है कि जब कोई खिलाड़ी जबरदस्त शारीरिक और मानसिक दबाव में होता है, तब उसके दिमाग में क्या चल रहा होता है.
खिलाड़ियों को दिमाग की ट्रैकिंग की जरूरत क्यों पड़ती है?
खेल के मैदान में होने वाली थकान सिर्फ मांसपेशियों तक सीमित नहीं होती. बैडमिंटन जैसे सुपर-फास्ट खेल में दिमाग को हर सेकंड में कई काम करने होते हैं. शटल की दिशा देखना, विरोधी खिलाड़ी के अगले कदम का अंदाजा लगाना, शरीर का संतुलन बनाना और सेकंड के सौवें हिस्से में सही शॉट चुनना, यह सब दिमाग ही करता है.
डॉ. पांडे समझाते हैं कि कई बार एक खिलाड़ी का शरीर पूरी तरह फ्रेश और रिकवर दिखता है, लेकिन उसका दिमाग बहुत ज्यादा थका हुआ होता है. इसे कॉग्निटिव फटीग कहते हैं. अगर लंबे और कड़े मुकाबलों के दौरान दिमाग पर पड़ने वाले लोड का पता चल जाए, तो कोच और खिलाड़ी को यह समझने में आसानी होती है कि खेल में असली थकान कहा से आ रही है.
यह डिवाइस काम कैसे करता है?
इस तरह के ज्यादातर वियरेबल्स लाइट-बेस्ड सेंसर्स का इस्तेमाल करते हैं. ये सेंसर माथे की त्वचा के जरिए दिमाग में खून के बहाव और ऑक्सीजन में आने वाले छोटे-छोटे बदलावों को पकड़ते हैं. इसके बाद खास कंप्यूटर एल्गोरिदम इन सिग्नल्स का हिसाब लगाकर यह बताते हैं कि खिलाड़ी कितना तनाव, दिमागी थकान या फोकस महसूस कर रहा है.
डॉ. पांडे का कहना है कि यह तरीका बहुत दिलचस्प है. खिलाड़ी से बार-बार यह पूछने के बजाय कि 'तुम कितना थके हो?', यह डिवाइस डेटा के जरिए बता सकता है कि शरीर ठीक दिखने के बाद भी दिमाग बहुत ज्यादा जोर लगा रहा है. हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह गैजेट खिलाड़ी के मन के विचार पढ़ सकता है.
क्या यह किसी दिमागी बीमारी की जांच कर सकता है?
यहा पर मेडिकल साइंस की सीमा को समझना बहुत जरूरी है. डॉ. पांडे साफ करते हैं कि माथे पर लगने वाला यह वियरेबल कोई ईईजी (EEG), एमआरआई (MRI) या डाक्टरी जांच का विकल्प बिल्कुल नहीं है.
पसीने, त्वचा की बनावट, तेज दौड़-भाग और मौसम के तापमान की वजह से इसके सिग्नल्स में फर्क आ सकता है. डिवाइस में दिखने वाले 'कॉग्निटिव लोड' का मतलब यह कतई नहीं है कि दिमाग में कोई चोट या बीमारी है. किसी भी तरह की मेडिकल बीमारी की पहचान के लिए अस्पताल जाकर डाक्टर से पूरी जांच कराना ही जरूरी होता है.
लंबे समय का डेटा ही सबसे ज्यादा काम का
इस तरह की तकनीक का असली फायदा किसी एक मैच या एक दिन के डेटा से नहीं मिलता. इसका असली कमाल तब दिखता है जब कई हफ्तों और महीनों तक खिलाड़ी के डेटा को जमा किया जाए.
अगर इस डेटा को खिलाड़ी की नींद, कसरत के लोड, खानपान और रिकवरी के साथ मिलाकर देखा जाए, तो खेल वैज्ञानिक यह तय कर सकते हैं कि खिलाड़ी को कब आराम देना है और कब ट्रेनिंग तेज करनी है. लगातार मैच खेल रहे बड़े एथलीट्स को चोट और ओवरट्रेनिंग से बचाने के लिए यह जानकारी बहुत कीमती साबित हो सकती है.
क्या ब्रेन मॉनिटरिंग ही खेलों का असली भविष्य है?
खेल जगत में अब तक सिर्फ इस बात पर जोर रहता था कि शरीर कितनी तेज भाग सकता है या कितना वजन उठा सकता है. पर अब नई दिशा यह समझने की है कि शरीर को चलाने के लिए दिमाग को कितनी मेहनत करनी पड़ रही है.
पीवी सिंधु का यह छोटा सा गैजेट दिखाता है कि आने वाले समय में स्पोर्ट्स साइंस का दायरा बहुत बदलने वाला है. टेंपल जैसे डिवाइस वैज्ञानिकों और कोचों को थकान और रिकवरी को एक नए नजरिए से देखने का मौका दे रहे हैं. हालांकि इस तकनीक को पूरी तरह सटीक और भरोसेमंद साबित होने के लिए अभी और भी वैज्ञानिक रिसर्च की जरूरत होगी.
आने वाले दिनों में खेल की दुनिया में जीत-हार सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि शरीर कितना मजबूत है, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि दबाव के सबसे मुश्किल पलों में खिलाड़ी का दिमाग कितना शांत और एक्टिव रहता है.
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