कैंसर की पहचान करने के लिए अबतक कई तरह के अलग-अलग टेस्ट कराने पड़ रहे हैं. ब्रेस्ट कैंसर के लिए मैमोग्राफी, सर्वाइकल कैंसर के लिए पैप स्मीयर और कोलन कैंसर के लिए कोलोनोस्कोपी जैसे कई तरह टेस्ट की जाती हैं. लेकिन कई ऐसे कैंसर हैं, जिनके लिए कोई नियमित स्क्रीनिंग टेस्ट मौजूद नहीं है. ऐसे में इस तरह के कैंसर तब पकड़ में आते हैं, जब मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है.
मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर लिमिटेड की चीफ साइंटिफिक एंड इनोवेशन ऑफिसर डॉ. कीर्ति चड्ढा का कहना है कि अब एक ऐसी टेक्नीक पर तेजी से काम हो रहा है, जो एक ही ब्लड टेस्ट के जरिए कई कैंसर के शुरुआती संकेत पहचान सकती है. इसे मल्टी-कैंसर अर्ली डिटेक्शन (MCED) टेस्ट कहा जाता है. हाल ही में प्रकाशित रिसर्च में इस टेक्नीक ने डॉक्टर्स और एक्सपर्ट की उम्मीदें बढ़ा दी हैं.
एक ब्लड टेस्ट, कई कैंसर की पहचान
सितंबर में प्रकाशित एक स्टडी में 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के करीब 36 हजार लोगों के ब्लड सैंपल का एनालासिस किया गया. MCED टेस्ट ने खून में मौजूद कैंसर सेल्स से निकलने वाले डीएनए के बेहद छोटे टुकड़ों को पहचानने की कोशिश की. इसके जरिए लंग्स, ब्रेस्ट ओवरी और कोलन सहित 17 तरह के कैंसर के संकेत पहचाने गए.
इस अध्ययन की सबसे जरूरी बात ये रही कि जिन कैंसरों का पता चला, उनमें से लगभग 75 प्रतिशत ऐसे थे जिनके लिए फिलहाल कोई नियमित स्क्रीनिंग कार्यक्रम उपलब्ध नहीं है. यही वे कैंसर हैं, जो अक्सर देर से सामने आते हैं और इलाज को चुनौतीपूर्ण बना देते हैं.
कैसे काम करता है MCED टेस्ट?
ये टेस्ट ब्लड में मौजूद ट्यूमर से जुड़े डीएनए और अन्य बायोलॉजिकल संकेतों को खोजता है. अगक शरीर में कहीं कैंसर विकसित हो रहा है, तो उसकी कुछ जेनेटिक जानकारी ब्लड में पहुंच सकती है. MCED इसी जानकारी को पकड़ने की कोशिश करता है.
हालांकि, ये समझना जरूरी है कि पॉजिटिव MCED रिपोर्ट का मतलब ये नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से कैंसर है. ऐसे मामलों में आगे स्कैन, बायोप्सी या अन्य जांचों की जरूरत पड़ती है, ताकि बीमारी की पुष्टि की जा सके.
अभी पूरी तरह भरोसा क्यों नहीं?
डॉ. कीर्ति का कहना है कि यह तकनीक काफी उम्मीद जगाती है, लेकिन अभी इसे नियमित कैंसर स्क्रीनिंग के रूप में अपनाने के लिए और शोध की जरूरत है. फिलहाल दुनिया की कोई बड़ी मेडिकल संस्था MCED टेस्ट को नियमित स्क्रीनिंग के तौर पर सिफारिश नहीं करती.
इसके अलावा, झूठे पॉजिटिव (False Positive) नतीजों की संभावना भी चिंता का विषय है. इससे मरीज को अतिरिक्त जांच, मानसिक तनाव और अनावश्यक खर्च का सामना करना पड़ सकता है.
भारत में भी बढ़ रही रुचि
भारत में भी कई लैब और चिकित्सक MCED तकनीक की उपयोगिता का मूल्यांकन कर रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि भारतीय आबादी में कैंसर के प्रकार और जोखिम पश्चिमी देशों से अलग हो सकते हैं. भारत में मुंह का कैंसर, सर्वाइकल कैंसर और स्तन कैंसर का बोझ अधिक है.
इसलिए किसी भी MCED टेस्ट को व्यापक रूप से अपनाने से पहले भारतीय मरीजों पर इसकी प्रभावशीलता और सटीकता की स्थानीय स्तर पर जांच आवश्यक होगी.
आज कौन-कौन सी कैंसर स्क्रीनिंग कराना जरूरी है?
1. मैमोग्राफी : ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए महिलाओं को नियमित मैमोग्राफी कराने की सलाह दी जाती है.
2. पैप स्मीयर और HPV टेस्ट : ये टेस्ट सर्वाइकल कैंसर के रिस्क को समय रहते पहचानने में मदद करती है.
3. कोलोनोस्कोपी: आंतों के कैंसर और उससे पहले बनने वाली असामान्य गांठों का पता लगाने के लिए उपयोगी है.
4. लो-डोज CT स्कैन: लंबे समय तक धूम्रपान करने वालों में फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए किया जाता है.
5. PSA टेस्ट: पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर के खतरे का आकलन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
6. स्किन चेकअप: स्किन के कैंसर और मेलानोमा की शुरुआती पहचान में मदद करता है.
7. फैमिली हिस्ट्री और जेनेटिक जांच: अगर फैमिली में कैंसर का इतिहास है तो अतिरिक्त स्क्रीनिंग की जरूरत पड़ सकती है.
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