विज्ञापन

मां के पेट के बैक्टीरिया से तय होती है बच्चे की सेहत, नई रिसर्च में सामने आई बेहद चौंकाने वाली बात

एक नई रिसर्च के अनुसार गर्भावस्था के दौरान मां का गट माइक्रोबायोम बच्चे की सेहत, इम्यूनिटी और कुछ बीमारियों के जोखिम को प्रभावित कर सकता है. जानिए स्टडी में क्या सामने आया.

मां के पेट के बैक्टीरिया से तय होती है बच्चे की सेहत, नई रिसर्च में सामने आई बेहद चौंकाने वाली बात
मां के पेट के बैक्टीरिया बच्चे की भविष्य की सेहत तय कर सकते हैं
NDTV

अक्सर लोग सोचते हैं कि प्रेगनेंसी के दौरान अच्छा खाना-पीना सिर्फ बच्चे के वजन और शारीरिक ढांचे के लिए जरुरी होता है. लेकिन 13 अगस्त 2026 को सामने आई एक नई मेडिकल रिसर्च ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है. रिसर्च में साबित हुआ है कि मां की आंतों और पेट में मौजूद बैक्टीरिया ही नवजात शिशु की आंतों में बसने वाले बैक्टीरिया का असली आधार होते हैं. यह नई खोज बताती है कि मां का स्वास्थ और शुरुआती जीवन के तौर-तरीके बच्चे के पूरे जीवन की सेहत की नींव कैसे रखते हैं.

रिसर्च की मुख्य बातें:

  1.  मां के पेट का गट माइक्रोबायोम ही बच्चे के पेट में अच्छे बैक्टीरिया पहुंचाने का सबसे बड़ा मुख्य स्त्रोत है.
  2.  मां के पेट के बैक्टीरिया की जांच से पहले ही पता लगाया जा सकता है कि बच्चे को आगे चलकर एक्जिमा की बीमारी होगी या नहीं.
  3.  बच्चे के जन्म का तरीका और मां का दूध उसके पेट के बैक्टीरिया के विकास को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं.

मां के पेट के बैक्टीरिया का सबसे बड़ा असर

वैज्ञानिकों ने डच लाइफलाइंस नेक्स्ट बर्थ कोहोर्ट में शामिल करीब 714 मांओं के गट माइक्रोबायोम की गहन जांच की. इसके लिए डॉक्टरों ने तीन अलग-अलग समय पर मांओं के स्टूल सैंपल लिए:

  •  प्रेगनेंसी यानी गर्भावस्था के दौरान.
  •  बच्चे के जन्म यानी डिलीवरी के ठीक समय.
  •  डिलीवरी के 3 महीने बाद.

इस जांच से पता चला कि पूरी प्रेगनेंसी और डिलीवरी के बाद भी मां के पेट के बैक्टीरिया काफी हद तक स्थिर बने रहते हैं. उनमें समय के साथ बहुत मामूली बदलाव ही देखने को मिलता है.

Gut Microbiome क्या होता है?

हमारी आंतों में मौजूद खरबों बैक्टीरिया, फंगी और अन्य सूक्ष्मजीवों के समूह को गट माइक्रोबायोम कहा जाता है. यह पाचन, इम्यूनिटी और कई स्वास्थ्य प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

मां के गट माइक्रोबायोम और बच्चे के बीच क्या संबंध मिला?

मां के उलट, बच्चों के पेट की स्थिति बिल्कुल अलग पाई गई. डॉक्टरों ने बच्चों के स्टूल सैंपल कई चरणों में टेस्ट किए:

 जन्म के 2 हफ्ते बाद

  •  1 महीने, 2 महीने और 3 महीने की उम्र में.
  •  6 महीने और पूरे 12 महीने यानी एक साल की उम्र में.

इन जांचों से साफ हुआ कि जिंदगी के पहले साल में बच्चे का माइक्रोबायोम बहुत तेजी से बदलता है और मैच्योर होता है.

रिसर्चर्स ने मां के वैजाइनल और ब्रेस्ट मिल्क माइक्रोबायोम की अल्ट्रा-डीप सीक्वेंसिंग की और साथ ही 474 क्लिनिकल, खान-पान और वातावरण से जुड़े पहलुओं को भी परखा. इससे यह नतीजा निकला कि बच्चे के पेट में मिलने वाले ज्यादातर बैक्टीरिया सीधे मां के पेट से मैच करते हैं.

बच्चे के पेट में बैक्टीरिया कैसे विकसित होते हैं?

इसका मतलब यह है कि बच्चे के पेट में अच्छे बैक्टीरिया बनने का पहला पड़ाव मां का पेट ही है, न कि वैजाइनल रास्ता या ब्रेस्ट मिल्क. अगर मां के पेट में कोई खास बैक्टीरिया अधिक मात्रा में मौजूद था, तो वह बच्चे में भी सबसे पहले और बहुत तेजी से ट्रांसफर हुआ.

मां के पेट से एक्जिमा का खतरा पहले ही पता चलेगा

इस स्टडी की दूसरी सबसे बड़ी और महत्वपुर्ण खोज बच्चों में होने वाले एक्जिमा रोग को लेकर है. एक्जिमा बच्चों की नाजुक त्वचा पर होने वाली एक गंभीर समसया है जिसमें लाल दाने, खुजली और जलन होती है.

रिसर्च में पाया गया कि:

 मां के पेट के बैक्टीरिया की बनावट और उनकी संख्या देखकर यह पहले ही बताया जा सकता है कि बच्चे को पहले साल में एक्जिमा होगा या नहीं.  हालांकि इसके पीछे का पूरा बायोलॉजिकल सिस्टम अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ है, लेकिन मां के पेट और बच्चे की त्वचा का यह संबध बहुत गहरा साबित हुआ है.

डिलीवरी और खान-पान का सबसे गहरा प्रभाव

रिसर्च के मुताबिक बच्चे के पेट के माइक्रोबायोम के विकास में दो चीजें सबसे ताकतवर साबित हुईं:

1. डिलीवरी कैसे हुई थी:

नॉर्मल डिलीवरी यानी वैजाइनल तरीके से जन्मे बच्चों के पेट में बैक्टीरॉइड्स नाम की प्रजाति के अच्छे बैक्टीरिया ज्यादा पाए गए.
सी-सेक्शन यानी ऑपरेशन से जन्मे बच्चों में ये बैक्टीरिया काफी कम थे, जिससे पता चलता है कि जन्म का तरीका बैक्टीरिया की शुरुआती बसावट पर सीधा असर डालता है.

2. दूध कौन सा प‍िया था :

जो बच्चे मां का दूध पीते हैं, उनके पेट के बैक्टीरिया और कार्बोहाइड्रेट पचाने की क्षमता फॉर्मूला मिल्क पीने वाले बच्चों से बिल्कुल अलग और बेहतर होती है.
जब बच्चा 6 महीने के बाद ठोस आहार खाना शुरू करता है, तब यह अंतर थोड़ा धीमा पड़ जाता है, लेकिन शुरुआती महीनों में मां का दूध सबसे असरदार रहता है.

3. ड‍िल‍िवरी कहां हुई थी:

बच्चा घर पर पैदा हुआ है या अस्पताल में, इसका भी पेट के बैक्टीरिया पर कोई खास असर नहीं पड़ता. असली असर सिर्फ डिलीवरी मोड और मां के दूध से ही होता है.

शिशु के स्वास्थ के लिए आगे की सीख

इस रिसर्च से डॉक्टरों और मां बनने वाली महिलाओं को कई जरूरी बातें सीखने को मिलती हैं:

  1.  शिशु के पेट का माइक्रोबायोम एक लगातार बदलने वाली प्रक्रिया है, जो मां के शरीर, जन्म के तरीके और सही पोषण से मिलकर बनती है.
  2.  जन्म के 2 हफ्ते बाद दिखने वाले बैक्टीरिया यह तय नहीं करते कि आगे चलकर 1 साल बाद बच्चे का माइक्रोबायोम कैसा रहेगा, क्योंकि यह समय के साथ लगातार सुधरता रहता है.
  3.  आने वाले समय में वैज्ञनिकों द्वारा ऐसी नई तकनीकें और डाइट प्लान तैयार किए जा सकते हैं, जिससे प्रेगनेंसी में मां के पेट के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाया जा सके और बच्चे को जीवन भर की बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सके.

खबर का स्रोत : https://www.nature.com/articles/s41586-026-10922-9 

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Gut, Gut Health
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com