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गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के लिए वरदान बने ये दो फॉर्मूले

भारत के कुछ जिलों ने मेहनत और जागरूकता से शिशु और मातृ मृत्यु दर में बड़ी गिरावट कर दिखाई है. जानें किन जिलों ने किया कमाल और कैसे बदली सेहत की कहानी.

गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के लिए वरदान बने ये दो फॉर्मूले
देश के इन जिलों ने घटाई शिशु और मातृ मृत्यु दर.
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भारत में गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों (न्यूबॉर्न) की सेहत सुधारने के लिए कई बड़े कदम उठाए जा रहे हैं. देश के कई जिलों ने मिलकर एक ऐसी मिसाल कायम की है, जहां मां और बच्चे की मौत के मामलों (मैटरनल और इन्फेंट मॉर्टलिटी) में बहुत बड़ी गिरावट देखने को मिली है. आखिर इन जिलों ने ऐसा क्या अलग किया और सरकार के कौन से दो बड़े प्लान इसमें गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं, आइए जानते हैं.

1. समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (SSBSK)- 

अक्सर देखा जाता है कि बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती कुछ महीने तो उसकी देखभाल अच्छे से होती है, लेकिन जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, रूटीन चेकअप छूटने लगते हैं. इसी कमी को दूर करने के लिए सरकार लेकर आई है 'समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम' (SSBSK).
यह कार्यक्रम नवजात शिशु और बच्चे की सेहत से जुड़ी सभी जरूरी सुविधाओं को एक ही छत के नीचे लाता है. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि बच्चे को जन्म से लेकर 36 महीने यानि 3 साल तक लगातार और पूरी देखभाल मिलती है.

इसमें क्या-क्या खास है?

  • घर पर आकर देखभाल- स्वास्थ्य कार्यकर्ता खुद घर आकर नवजात बच्चे की जांच करते हैं.
  • खतरे की पहले से पहचान- बच्चे को कोई गंभीर बीमारी या खतरा तो नहीं है, इसके लिए खास स्क्रीनिंग की जाती है.
  • मां की मानसिक सेहत का ख्याल- डिलिवरी के बाद कई महिलाएं तनाव या डिप्रेशन मैटरनल मेंटल हेल्थ से जूझती हैं. इस प्रोग्राम में मां के मानसिक स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखा जाता है.
  • डिजिटल ट्रैकिंग- हर बच्चे का एक डिजिटल रिकॉर्ड होता है, जिससे यह ट्रैक किया जा सके कि उसे समय पर टीका लगा या नहीं और उसकी ग्रोथ कैसी हो रही है.
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जन्म के बाद शुरुआती कुछ महीने मां और बच्चे का ध्यान रखना बेहद जरूरी. Photo Credit: AFP

2. सुमन रोडमैप 2030 (SUMAN Roadmap 2030)- 

दूसरा सबसे बड़ा कदम है 'सुमन रोडमैप 2030'. इसका सीधा लक्ष्य साल 2030 तक सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (SDG) को हासिल करना है, यानी मां और बच्चे की मृत्यु दर को लगभग ना के बराबर लाना. यह रोडमैप सिर्फ अस्पताल में डिलिवरी कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक महिला के मां बनने के पूरे सफर को सुरक्षित बनाता है.

इसकी मुख्य बातें-

  • हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी मैनेजमेंट- जिन गर्भवती महिलाओं को बीपी, शुगर या कोई और गंभीर समस्या होती है, उनकी पहचान करके उन पर खास ध्यान दिया जाता है.
  • इलाके के हिसाब से मदद- हर जिले और गांव की जरूरतें अलग होती हैं. यह प्लान किसी एक ढर्रे पर काम नहीं करता, बल्कि स्थानीय जरूरतों के हिसाब से बदलाव करता है.
  • आम लोगों की भागीदारी- इसमें गांव के लोगों और कम्युनिटी को साथ जोड़ा जा रहा है ताकि कोई भी गर्भवती महिला इलाज से न छूटे.

किन जिलों ने बदला अपना इतिहास?

जिन जिलों ने मातृत्व और शिशु मृत्यु दर को कम करने में सफलता पाई है, उन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया. एम्बुलेंस की सुविधा को दुरुस्त किया गया, ताकि इमरजेंसी में मां को तुरंत अस्पताल पहुंचाया जा सके. इसके अलावा, डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग या इन्फेक्शन जैसी दिक्कतों को रोकने के लिए डॉक्टरों और नर्सों को स्पेशल ट्रेनिंग दी गई. डिजिटल चाइल्ड ट्रैकिंग की वजह से अब किसी भी बच्चे का डॉक्टर के पास जाना मिस नहीं होता.

यह बदलाव दिखाता है कि अगर सही प्लानिंग और तकनीक का साथ मिले, तो हर मां और बच्चे को सुरक्षित रख सकते हैं.

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