International Nurses Day: हर साल 12 मई को इंटरनेशनल नर्स डे मनाया जाता है. यह दिन Florence Nightingale की जयंती के मौके पर मनाया जाता है और दुनियाभर की नर्सों के योगदान को सम्मान देने के लिए खास माना जाता है. नर्सिंग एक ऐसा काम है जिसमें स्किल, धैर्य और इंसानियत तीनों की जरूरत होती है. लेकिन इस पेशे में लंबे काम के घंटे भी एक बड़ी चुनौती बन चुके हैं. कई नर्सें 12-12 घंटे की शिफ्ट करती हैं, जो स्टाफ की कमी, इमरजेंसी केस, ज्यादा मरीज और लगातार कागजी काम की वजह से और लंबी हो जाती हैं. ऐसे में कई बार उन्हें ठीक से खाना खाने या आराम करने का समय भी नहीं मिल पाता. धीरे-धीरे यह थकान उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है.
नर्सों पर तनाव का छिपा असर
नर्सों की जिंदगी में तनाव और मानसिक दबाव सिर्फ खबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी रोज की सच्चाई बन चुका है. लगातार थकान सिर्फ शरीर को कमजोर नहीं करती, बल्कि इससे ध्यान लगाने की क्षमता कम होती है, फैसले लेने में दिक्कत होती है और मानसिक संतुलन भी प्रभावित होता है. कई बार नर्सें एक शिफ्ट खत्म होने के बाद भी खुद को पूरी तरह संभाल नहीं पातीं. यही वजह है कि कई अनुभवी नर्सें इस दबाव से परेशान होकर नौकरी छोड़ने तक का फैसला कर लेती हैं.
मरीजों की देखभाल के पीछे छिपी भावनात्मक जिम्मेदारी
नर्सों का काम सिर्फ दवा देना या मरीजों की जांच करना नहीं होता. वे हर दिन दर्द, डर, दुख और तनाव से गुजर रहे लोगों के बीच काम करती हैं. कई बार मरीजों और उनके परिवार का भावनात्मक बोझ भी नर्सों को संभालना पड़ता है. बाहर से शांत दिखने वाली नर्सें अंदर ही अंदर काफी मानसिक दबाव झेल रही होती हैं.
लगातार तनाव की वजह से चिंता, नींद न आना, चिड़चिड़ापन, भावनात्मक थकान और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. इसके बावजूद कई नर्सें अपनी परेशानी खुलकर नहीं बता पातीं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि लोग उन्हें कमजोर समझेंगे या उनकी क्षमता पर सवाल उठेंगे. यही चुप्पी मानसिक समस्याओं को और बढ़ा देती है.
बर्नआउट का असर सिर्फ नर्सों पर नहीं पड़ता
जब नर्सें शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाती हैं, तो इसका असर मरीजों की देखभाल पर भी पड़ता है. लगातार तनाव की वजह से काम में गलती होने का खतरा बढ़ जाता है और टीम के बीच तालमेल भी कमजोर पड़ सकता है. कई नर्सें इस दबाव से परेशान होकर काम के घंटे कम कर देती हैं या फिर यह पेशा छोड़ देती हैं. इससे बाकी नर्सों पर काम का बोझ और बढ़ जाता है और वही तनाव का चक्र फिर से शुरू हो जाता है.
नई नर्सों को भी शुरुआत से ही बहुत दबाव वाले माहौल में काम करना पड़ता है. कई बार उन्हें सही मार्गदर्शन और भावनात्मक सहारा नहीं मिल पाता. ऐसे में उनका उत्साह धीरे-धीरे कम होने लगता है. अगर अस्पताल बेहतर इलाज और सुरक्षित माहौल चाहते हैं, तो उन्हें नर्सों की मानसिक सेहत को भी उतनी ही अहमियत देनी होगी. बर्नआउट किसी की कमजोरी नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी समस्या है.
नर्सिंग पेशे को बेहतर बनाने के लिए क्या जरूरी है
अस्पताल और हेल्थकेयर संस्थान इस स्थिति को सुधारने के लिए कई जरूरी कदम उठा सकते हैं. जैसे पर्याप्त स्टाफ रखना, शिफ्ट का बेहतर प्लान बनाना, नर्सों को समय पर ब्रेक देना और गैरजरूरी कागजी काम कम करना. इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य सहायता, काउंसलिंग और सपोर्ट सिस्टम भी बहुत जरूरी हैं. सबसे जरूरी बात यह है कि समाज को नर्सों को सिर्फ “हर मुश्किल झेल लेने वाले हीरो” की तरह देखना बंद करना होगा. नर्सें भी इंसान हैं और उनकी भी अपनी सीमाएं हैं. जब अस्पताल उनकी सेहत, आराम और सुरक्षा का ध्यान रखेंगे, तो इसका फायदा मरीजों, अस्पतालों और पूरे हेल्थ सिस्टम को मिलेगा.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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