मान लीजिए आपने नागपुर में ब्लड टेस्ट कराया और कुछ दिनों बाद इलाज के लिए चंडीगढ़ पहुंच गए. अब तक अक्सर ऐसा होता था कि नया अस्पताल पुराने टेस्ट को आसानी से समझ नहीं पाता था या फिर दोबारा जांच कराने की सलाह दे देता था. इसकी वजह बीमारी नहीं, बल्कि अलग-अलग अस्पतालों का अलग सिस्टम था. अब सरकार ने इसी परेशानी को दूर करने के लिए एक नई डिजिटल व्यवस्था शुरू की है. इसमें "सेमैंटिक इंटरऑपरेबिलिटी" पर खास फोकस है. यानी अब देश के अलग-अलग अस्पताल और लैब मेडिकल जानकारी के लिए एक जैसे टर्म्स और कोड इस्तेमाल करेंगे. आसान शब्दों में कहें तो मरीज का रिकॉर्ड कहीं भी पहुंचे, वहां का सिस्टम उसे बिना किसी उलझन के समझ सकेगा.
केंद्र सरकार ने भारत हेल्थ टर्मिनोलॉजी सर्विस (BHTS) और कॉमन लैब कोड्स फॉर इंडिया (CLCI) लॉन्च किए हैं. यह ऐसा कॉमन सिस्टम है, जिसमें बीमारी, दवा और लैब टेस्ट के लिए एक जैसे डिजिटल कोड तय किए गए हैं. इससे अलग-अलग अस्पतालों के कंप्यूटर एक ही जानकारी को एक ही तरीके से समझ पाएंगे.
मरीजों को क्या फायदा होगा?
सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि अगर आपने पहले कहीं इलाज कराया है, तो दूसरी जगह पहुंचने पर आपकी मेडिकल जानकारी समझने में परेशानी कम होगी. कई मामलों में पहले कराए गए टेस्ट दोबारा कराने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. इससे समय भी बचेगा और खर्च भी कम हो सकता है. नई व्यवस्था को नेशनल ड्रग रजिस्ट्री से भी जोड़ा गया है. इससे हर दवा की एक तय डिजिटल पहचान होगी. अगर किसी दवा का नाम दूसरी दवा से मिलता-जुलता है, तब भी सिस्टम उसे अलग पहचान सकेगा. इससे गलत दवा मिलने का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है.
लैब रिपोर्ट के लिए भी होंगे कॉमन कोड
सरकार ने लैब टेस्ट के लिए भी कॉमन कोड तय किए हैं. यानी ब्लड टेस्ट, शुगर टेस्ट या दूसरे जांच परिणाम किसी भी अस्पताल या लैब में एक ही तरीके से रिकॉर्ड होंगे. इससे अलग-अलग अस्पतालों और लैब के सिस्टम एक-दूसरे के साथ मेडिकल जानकारी आसानी से साझा कर सकेंगे.
इंश्योरेंस क्लेम भी हो सकता है तेज
आज कई बार हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम इसलिए भी अटक जाता है क्योंकि अलग-अलग अस्पताल मेडिकल जानकारी को अलग तरीके से रिकॉर्ड करते हैं. नए सिस्टम में एक जैसे कोड और टर्म्स इस्तेमाल होने से क्लेम की जांच आसान हो सकती है.
सरकार पहले ही करोड़ों लोगों के आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (ABHA) बना चुकी है और बड़ी संख्या में हेल्थ रिकॉर्ड डिजिटल हो चुके हैं. अब यह नई व्यवस्था उन रिकॉर्ड को आपस में बेहतर तरीके से जोड़ने का काम करेगी. अगर राज्यों, अस्पतालों और हेल्थ टेक कंपनियों ने इसे तेजी से अपनाया, तो आने वाले समय में मरीजों को इलाज के दौरान पहले से कहीं ज्यादा आसान और बेहतर अनुभव मिल सकता है.
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