‘वंदे मातरम्' को लेकर भाजपा-कांग्रेस के बीच शुरू हुई सियासी जंग अब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या तक पहुंच गई है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के राजस्थान दौरे के दौरान ‘वंदे मातरम्' पर बयान के बाद कांग्रेस नेताओं ने पलटवार किया. कांग्रेस प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा ने संघ पर गांधी की हत्या का आरोप लगाया. इसके बाद नगरीय विकास और आवासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने पलटवार करते हुए हत्या पर विवादित बयान दिया. एनडीटीवी से खास बातचीत के दौरान खर्रा से रंधावा के बयान पर सवाल किया तो उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व और गांधी की भूमिका पर सवाल उठाए.
खर्रा ने कहा कि वे किसी एक नेता का नाम नहीं लेना चाहते, लेकिन सरदार पटेल को छोड़कर कांग्रेस के नरम दल के प्रमुख नेताओं में से कोई भी सेलुलर जेल या काला पानी की सजा काटकर नहीं आया था. उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई में 13 से 25 साल की उम्र के अनेक क्रांतिकारियों ने हंसते-हंसते गोलियां खाईं और फांसी के फंदे को स्वीकार किया.
गांधी की भूमिका पर खर्रा ने उठाए सवाल
जब उनसे ये पूछा गया कि क्या वे महात्मा गांधी की हत्या को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं तो खर्रा ने कहा, "उस समय कांग्रेस के नरम दल के जो सबसे बड़े नेता थे, जिनकी गोली मारकर हत्या की गई, अगर वो हत्या नहीं होती तो पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच 20 किलोमीटर चौड़े कॉरिडोर के बनने की दिशा में भी एक आमरण अनशन होने वाला था." उन्होंने नोआखली और कलकत्ता के दंगों के अलावा स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के बाद गांधी के रुख का भी उल्लेख किया.
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‘वंदे मातरम्' को बताया राष्ट्रभक्ति का प्रतीक
उन्होंने कहा कि जिन लोगों के मन, दिल और आत्मा में राष्ट्र के प्रति भावना थी, उनके लिए ‘वंदे मातरम्' सिर्फ गीत नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति और जनजागरण का प्रतीक था. उन्होंने कांग्रेस से सवाल किया कि वह किसी एक ऐसे नरम दल के नेता का नाम बताए, जिसे अंग्रेजों ने सेलुलर जेल या काला पानी की सजा दी हो.
कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति का आरोप
‘वंदे मातरम्' विवाद पर खर्रा ने कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, "राष्ट्रगीत को लेकर कांग्रेस नेताओं के बयान उसकी मानसिकता को उजागर करते हैं. भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस ने राजनीतिक कारणों से ‘वंदे मातरम्' के सम्मान को कमजोर किया. इतिहास को राजनीतिक सुविधा के हिसाब से नहीं देखा जाना चाहिए. देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले क्रांतिकारियों और राष्ट्रभक्तों के बलिदान को भी सामने लाना जरूरी है."
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