हमारे देश में पिछले कुछ सालों से जन्मदर में लगातार गिरावट देखी जा रही है. रिपोर्ट्स के मुताबित, देश में प्रजनन दर 2.1 के रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच चुकी है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ऐसी स्थिति लंबे समय तक रही, तो आने वाले दशकों में देश को भी चीन की तरह बुजुर्ग होती आबादी, घटते कार्यबल और आर्थिक दबाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. यहां समझते हैं आखिर क्यों चिंता का कारण है घटता जन्म दर?
घटता जन्म दर क्यों बढ़ा रही है चिंता?
हाल ही में आई आंकड़ों के मुताबिक, देश की कुल प्रजनन दर 1.9 तक पहुंच गई है. वही, अगर किसी देश की आबादी को स्थिर बनाए रखना है, तो उसका दर करीब 2.1 होना चाहिए. इसका मतलब येहै कि नई पीढ़ी फ्यूचर में मौजूदा आबादी को पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर पाएगी.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि शिक्षा का बढ़ता स्तर, शहरीकरण, देर से शादी, महिलाओं का बढ़ता प्रोफेशनल वर्क और परिवार नियोजन के साधनों तक बेहतर पहुंच और बच्चों के परवरिश में बढ़ती लागत की वजह से लगातार जन्म दर में गिरावट देखने को मिल रही है.
चीन जैसा संकट क्यों बन सकता है खतरा?
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि देश आने वाले कुछ सालों में उसी जनसांख्यिकीय बदलाव की ओर बढ़ सकता है, जिसका सामना चीन कर रहा है. चीन में लगातार कम होती जन्म दर के कारण बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ी है और कामकाजी उम्र के लोगों की संख्या लगातार घट रही है. इसका असर अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ा है.
भारत अभी दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है, लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि ये डेमोग्राफिक डिविडेंड हमेशा नहीं रहेगा. अगर रोजगार, कौशल विकास और प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए अभी से सही कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में देश को बुजुर्ग आबादी का बोझ उठाना पड़ सकता है.
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