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एंडोमेट्रियोसिस से मां बनने में आ सकती है मुश्किल? IVF पर भी पड़ सकता है असर

एंडोमेट्रियोसिस महिलाओं की प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकती है और IVF के नतीजों पर भी असर डाल सकती है. डॉक्टर कहते हैं कि सही समय पर इलाज और फर्टिलिटी एक्सपर्ट की सलाह से मां बनने की संभावना बढ़ाई जा सकती है. यहां जानते हैं इस बारे में-

एंडोमेट्रियोसिस से मां बनने में आ सकती है मुश्किल? IVF पर भी पड़ सकता है असर
Endometriosis and Fertility : इस स्थिति में मां बनने में आ सकती है परेशानी

एंडोमेट्रियोसिस महिलाओं में होने वाली एक आम लेकिन गंभीर समस्या है, जो कई बार गर्भधारण में बाधा बन सकती है. यह ऐसी स्थिति है जिसमें गर्भाशय (Uterus) की अंदरूनी परत जैसी कोशिकाएं गर्भाशय के बाहर बढ़ने लगती हैं. इससे दर्द, सूजन और प्रजनन अंगों में बदलाव हो सकते हैं. यही कारण है कि एंडोमेट्रियोसिस से जूझ रही महिलाओं को नैचुरली कंसीव करने में परेशानी आ सकती है. 

CIFAR की डायरेक्टर IVF एक्सपर्ट डॉ. पुनीत राणा अरोड़ा का कहना है कि एंडोमेट्रियोसिस का असर महिला की प्रजनन क्षमता के साथ-साथ आईवीएफ (In Vitro Fertilization) के परिणामों पर भी पड़ सकता है. हालांकि, सही इलाज और एक्सपर्ट की निगरानी में कई महिलाएं सफलतापूर्वक मां बन सकती हैं.

एंडोमेट्रियोसिस कैसे प्रभावित करती है फर्टिलिटी?

एंडोमेट्रियोसिस के कारण शरीर में लगातार सूजन (Inflammation) बनी रहती है. इससे पेल्विक एरिया में चिपकाव हो सकता है, जिससे अंडाशय (Ovary) और अन्य प्रजनन अंग प्रभावित हो सकते हैं.

डॉ. अरोड़ा का कहना है कि ये स्थिति एग और स्पर्म के मिलने के प्रोसेस में बाधा डाल सकती है. कई मामलों में फेलोपियन ट्यूब्स भी प्रभावित हो जाती हैं, जिससे गर्भधारण की संभावना कम हो सकती है.

अंडों की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है असर

डॉ. पुनीत अरोड़ा का कहना है कि अगर एंडोमेट्रियोसिस अंडाशय को प्रभावित करती है, तो अंडाणुओं (Eggs) की गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ सकता है.

बीमारी के कारण होने वाली सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस अंडों के विकास को प्रभावित कर सकते हैं. यही वजह है कि कुछ महिलाओं में IVF के दौरान अंडों की संख्या या गुणवत्ता अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिलती.

IVF में क्या आती हैं चुनौतियां?

IVF उन महिलाओं के लिए एक प्रभावी विकल्प माना जाता है, जो एंडोमेट्रियोसिस के कारण प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर पा रही हैं. हालांकि, बीमारी की गंभीरता के अनुसार IVF के परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं.

डॉक्टर का कहना है कि एंडोमेट्रियोसिस गर्भाशय के वातावरण में बदलाव ला सकती है. इसके कारण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और सूजन संबंधी प्रतिक्रियाएं भ्रूण के इम्प्लांटेशन को प्रभावित कर सकती हैं. कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि इससे कुछ मरीजों में इम्प्लांटेशन और प्रेगनेंसी रेट कम हो सकती है.

हालांकि, परिणाम हर महिला में अलग होते हैं और इनमें उम्र, ओवेरियन रिजर्व, बीमारी का स्तर और पहले किए गए ट्रीटमेंट जैसे कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

क्या एंडोमेट्रियोसिस में प्रेग्नेंसी सुरक्षित रहती है?

अगर गर्भधारण हो जाता है, तो अधिकतर महिलाओं की प्रेग्नेंसी सामान्य रहती है. लेकिन कुछ रिसर्च में एंडोमेट्रियोसिस को गर्भपात, समय से पहले डिलीवरी, प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याओं और गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर के बढ़े हुए रिस्क से जोड़ा गया है.

इसी कारण से कारण डॉक्टर नियमित प्रेग्नेंसी मॉनिटरिंग और समय-समय पर जांच कराने की सलाह देते हैं, ताकि किसी भी संभावित समस्या का जल्द पता लगाया जा सके.

सही समय पर इलाज से बढ़ती है सफलता की संभावना

डॉ. पुनीत राणा अरोड़ा बताते हैं कि एंडोमेट्रियोसिस होने का मतलब ये नहीं है कि महिला मां नहीं बन सकती. आज IVF और आधुनिक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स की मदद से लाखों महिलाएं सफलतापूर्वक गर्भधारण कर रही हैं.

उपचार का चुनाव हमेशा महिला की उम्र, ओवेरियन रिजर्व, लक्षणों की गंभीरता, पहले के उपचार और एंडोमेट्रियोसिस की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है. इसलिए फर्टिलिटी संबंधी समस्या होने पर समय रहते विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहद जरूरी है.

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