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क्या इंसान अब सिर्फ सोचकर बात कर सकेगा? एलन मस्क की Brain Chip ने कर दिखाया कमाल

एलन मस्क की Neuralink Brain Chip ने एक मरीज को सिर्फ सोचकर "I Love You" बोलने में मदद की. जानिए Brain Computer Interface कैसे काम करता है और यह तकनीक लकवा मरीजों के लिए क्यों उम्मीद की नई किरण मानी जा रही है.

क्या इंसान अब सिर्फ सोचकर बात कर सकेगा? एलन मस्क की Brain Chip ने कर दिखाया कमाल
अब दिमाग पढ़कर बोल रहा है कंप्यूटर! Neuralink के नए Video में दिखा कमाल
  • A speech-impaired man said "I love you" using a Neuralink brain chip in a video.
  • The man’s partner reacted with excitement as AI voiced his thoughts aloud.
  • Neuralink shared the video, calling the man a voluntary clinical trial participant.

''I Love You" बोलने के लिए इस शख्स ने न मुंह खोला और न हाथ हिलाया. एलन मस्क की Neuralink Brain Chip ने उसके दिमागी संकेतों को पढ़कर शब्दों में बदल दिया. यही वजह है कि यह वीडियो दुनिया भर में चर्चा का विषय बना हुआ है.

सोचिए कि आप सिर्फ अपने मन में सोचें और कंप्यूटर की स्क्रीन पर कर्सर अपने आप चलने लगे. न हाथ हिलाने की जरूरत और न ही किसी माउस या कीबोर्ड को छूने की. जो बात कभी हॉलीवुड की साइंस फिक्शन फिल्मों में देखने को मिलती थी, वो अब हमारी आंखों के सामने हकीकत बन चुकी है. दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ने एक ऐसा वीडियो शेयर किया है, जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और आम लोगों को हैरान कर दिया है.

सिर्फ सोचकर I Love You बोला

मस्क ने इस मरीज के कहे शब्दों को ही कैप्शन बनाकर अपने सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट किया. ये चंद शब्द उस इंसान के लिए किसी नई जिंदगी से कम नहीं हैं, जो लकवे की वजह से अपने हाथ-पैर तक नहीं हिला सकता था. इसी साल मार्च में केनेथ नाम के एक मरीज के साथ ऐसा ही प्रयोग दिखाया गया था, और अब इस नए मरीज के अनुभव ने साबित कर दिया है कि दिमाग में चिप लगाने वाली यह तकनीक अब सिर्फ लैब की थ्योरी नहीं रही.

Neuralink की तकनीक अभी Clinical Trial चरण में है और यह आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है. कंपनी के अनुसार परिणाम सभी प्रतिभागियों में एक जैसे नहीं हो सकते. समझते हैं कि न्यूरालिंक का यह ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस आखिर क्या बला है और एक आम इंसान के लिए इसके क्या मायने हैं.

ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (BCI) असल में है क्या

हमारा दिमाग पूरे शरीर का कंट्रोल रूम होता है. जब भी हम हाथ उठाने या पैर हिलाने की सोचते हैं, तो दिमाग में बिजली की नन्ही तरंगों (इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स) के रूप में संदेश पैदा होते हैं. ये संदेश रीढ़ की हड्डी और नसों के जरिए अंगों तक पहुंचते हैं. लेकिन जब किसी को गंभीर लकवा मार जाता है या रीढ़ की हड्डी में चोट लग जाती है, तो दिमाग का शरीर से संपर्क टूट जाता है.

  • ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस यानी बीसीआई (BCI) एक ऐसी हाईटेक डिवाइस है जो दिमाग और कंप्यूटर को सीधे जोड़ देती है.
  • इसमें मरीज के शरीर या खराब हो चुकी नसों की जरूरत ही नहीं पड़ती, यह पूरे शरीर को बाईपास कर देता है.
  • सिक्के के आकार की यह चिप दिमाग की गतिविधियों और सिग्नल्स को पकड़ती है.
  • इसके बाद कंप्यूटर का सॉफ्टवेयर उन दिमागी तरंगों को कमांड में बदल देता है, जिससे स्क्रीन पर चीजें हिलने लगती हैं.

न्यूरालिंक का यह नया मरीज क्या-क्या कर पा रहा है

इस नए वीडियो में जिस मरीज का अनुभव दिखाया गया है, उसने इस चिप का बहुत ही प्रैक्टिकल इस्तेमाल करके दिखाया है.

  • मरीज ने सिर्फ दिमाग में सोचकर कंप्यूटर पर वीडियो गेम खेले और इंटरनेट ब्राउजिंग की.
  • उसने बिना किसी की मदद के लैपटॉप की स्क्रीन पर माउस का कर्सर इधर-उधर घुमाया और कई छोटे-मोटे काम किए.
  • केनेथ की तरह ही यह नया प्रयोग भी दिखाता है कि जो लोग बिस्तर से उठ नहीं सकते, वो भी अब डिजिटल दुनिया से सीधे जुड़ सकते हैं.
  • यह उन लोगों के लिए आजादी के एक नए अहसास जैसा है जो सालों से दूसरों पर निर्भर थे.

यह तकनीक किन मरीजों के लिए वरदान साबित होगी

वैज्ञानिक पिछले कई दशकों से दिमाग को मशीनों से जोड़ने पर रिसर्च कर रहे हैं. हालांकि अभी यह तकनीक बिल्कुल शुरुआती दौर में है और दुनिया भर में सिर्फ कुछ सौ लोगों को ही इस तरह के इंप्लांट लगे हैं. लेकिन इसका दायरा बहुत बड़ा है:

गंभीर लकवा: जो लोग किसी हादसे या बीमारी की वजह से पूरी तरह हिल-डुल नहीं सकते, वो खुद से अपने फोन, लैपटॉप या व्हीलचेयर को चला सकेंगे.
आंखों की रोशनी लौटना: मस्क का दावा है कि भविष्य में यह तकनीक उन लोगों को भी देखने में मदद कर सकती है जो जन्म से या किसी हादसे में अपनी आंखें खो चुके हैं.
सुनने और बोलने की ताकत: जिन लोगों की सुनने की क्षमता खत्म हो चुकी है या जिनकी जबान लकवे की वजह से बंद हो गई है, वो सीधे अपने विचारों को स्क्रीन पर टेक्स्ट में बदल सकेंगे.

अभी न्यूरालिंक की क्या स्थिति है

एलन मस्क की इस कंपनी को इंसानों पर ट्रायल शुरू किए हुए दो साल से ज्यादा का समय हो चुका है. कंपनी ने हाल ही में बताया कि दुनिया भर में उनके इन ट्रायल्स में करीब 21 प्रतिभागी शामिल हो चुके हैं.

कंपनी बहुत कड़े नियमों और सरकारी स्वास्थ्य एजेंसियों की निगरानी में यह काम कर रही है.
सबसे राहत की बात यह है कि अभी तक किसी भी मरीज के साथ डिवाइस की वजह से कोई जानलेवा या गंभीर साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिला है.
अस्पताल और वैज्ञानिकों की टीम लगातार इस चिप को और छोटा, सुरक्षित और ज्यादा असरदार बनाने पर काम कर रही है.

क्या आम जनता के लिए भी यह चिप बहुत जल्द आ जाएगी

यह सवाल हर किसी के मन में है कि क्या आम आदमी भी बहुत जल्द अपने दिमाग में चिप लगवा सकेगा. इसका जवाब है कि अभी इसमें काफी समय लगेगा.

अभी यह सिर्फ उन मरीजों पर परखी जा रही है जो लाचार हैं और जिनके पास कोई दूसरा मेडिकल विकल्प नहीं बचा है.

इंसान के दिमाग में कोई भी बाहरी चिप डालना बहुत संवेदनशील और जोखिम भरा काम होता है, इसलिए सुरक्षा नियमों का पूरी तरह खरा उतरना जरूरी है.
जब तक हजारों मरीजों पर इसके टेस्ट पूरी तरह सुरक्षित साबित नहीं होते, तब तक यह बाजार में आम बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं होगी.

दुनिया भर में जहां एक तरफ इस तकनीक को लेकर बहस चल रही है कि इंसान के दिमाग को मशीन से जोड़ना कितना सही है, वहीं दूसरी तरफ उन बेबस मरीजों के लिए यह एक चमत्कारी रोशनी की तरह है. जो इंसान अपनी उंगली तक नहीं हिला सकता था, अगर वह सिर्फ सोचकर दुनिया से बात करने लगे, तो यह विज्ञान की सबसे बड़ी जीत मानी जाएगी. आने वाले कुछ सालों में यह टेक्नोलॉजी मेडिकल जगत का पूरा चेहरा बदलने की पूरी ताकत रखती है.

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