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48 साल के मरीज की नजर बचाने में AI ने निभाई अहम भूमिका, सफल रही मुश्किल सर्जरी

लंदन में ब्रेन ट्यूमर की एक जटिल सर्जरी के दौरान AI ने रियल टाइम में डॉक्टरों की मदद की. ऑपरेशन के बाद मिली सफलता.

48 साल के मरीज की नजर बचाने में AI ने निभाई अहम भूमिका, सफल रही मुश्किल सर्जरी
AI बना डॉक्टरों का साथी

लंदन के डॉक्टरों ने एक अनोखा मेडिकल कारनामा किया है. वहां पहली बार दिमाग की बेहद नाजुक सर्जरी के दौरान AI तकनीक की मदद ली गई. खास बात ये रही कि AI ने पूरे ऑपरेशन पर रियल टाइम में नजर बनाए रखी. इस तकनीक के पहले मरीज का कहना है कि उसकी गई हुई आंखों की रोशनी वापस आ गई और उसे नया जीवन मिल गया.

बेडफोर्डशायर के रहने वाले 48 साल के रिस हिबर्ट दो बच्चों के पिता हैं. उनके पिट्यूटरी ग्लैंड में 11mm का ट्यूमर निकल आया था. ये ग्लैंड दिमाग के निचले हिस्से में होता है और खून पहुंचाने वाली धमनियों और आंखों की नसों के बिल्कुल पास होता है. 

दिसंबर 2024 में उन्हें इस बीमारी का पता चला. रोज की तरह वॉक पर गए तो अचानक गिर पड़े और दौरा आ गया. ट्यूमर बढ़ने के साथ ही उसने आंखों की नसों पर दबाव डालना शुरू कर दिया, जिससे उनकी नजर धीरे-धीरे कम होने लगी. हिबर्ट ने बताया, बार-बार ठोकर खाकर गिरने के बाद मैंने वॉकिंग स्टिक का इस्तेमाल शुरू कर दिया था क्योंकि मुझे नीचे का हिस्सा दिखना बंद हो गया था.

ये ऑपरेशन इतना जोखिम भरा क्यों था?

ट्यूमर ऐसी जगह पर था कि अगर सर्जन का हाथ एक मिलीमीटर भी चूक जाता तो हिबर्ट हमेशा के लिए अंधे हो सकते थे या उन्हें स्ट्रोक आ सकता था. इसी खतरे को देखते हुए नेशनल हॉस्पिटल फॉर न्यूरोलॉजी एंड न्यूरोसर्जरी के डॉक्टरों ने AI की मदद लेने का फैसला किया.

ऑपरेशन नाक के रास्ते किया गया. डॉक्टरों ने नाक से एक पतला कैमरा ट्यूमर तक पहुंचाया. आमतौर पर डॉक्टर पुराने स्कैन देखकर ऑपरेशन करते हैं, लेकिन यहां UCL के बनाए AI सिस्टम ने लाइव वीडियो को उसी वक्त एनालाइज किया और खून की नसों जैसे नाजुक हिस्सों को स्क्रीन पर हाइलाइट कर दिया. इससे डॉक्टरों को तुरंत सही फैसला लेने में मदद मिली.

UCL में इस सिस्टम को बनाने वाली टीम की हेड डॉ. सोफिया बानो ने बताया कि AI को हजारों सर्जरी के वीडियो दिखाकर ट्रेन किया गया है, जितने किसी सर्जन को देखने में सालों लग जाएंगे. इसे खासतौर पर नाजुक ऑपरेशन्स के लिए ही बनाया गया है.

ऑपरेशन के बाद क्या हुआ?

हिबर्ट ने बताया कि जब उन्हें होश आया तो कमरा बिल्कुल साफ दिख रहा था. एक हफ्ते के अंदर ही वो बिना चश्मे और बिना छड़ी के चलने-फिरने लगे थे. 

ये AI सिस्टम UCL हॉक्स इंस्टीट्यूट में बनाया गया है और इसे नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड केयर रिसर्च और गूगल ने फंड किया है. अब रिसर्चर इसके बड़े ट्रायल की तैयारी में हैं और उम्मीद है कि आने वाले समय में सर्जन और मशीन का ये साथ ऑपरेशन थियेटर में आम बात हो जाएगी.

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