कैंसर मैं सही मायने में जिंदा हो गई....8 दिसंबर 2021 से पहले मस्त थी, बच्चा और नौकरी ही जीवन था.भगवान को मानती थी, मगर ऐसे नहीं कि हमेशा ही लगे वो हर पल मेरे साथ हैं. ऐसा नहीं कहूंगी कि संघर्ष नहीं था, बहुत था, लेकिन कोई ऐसा डर या दुख नहीं था, जो लंबे समय तक मेरे सीने में घर कर जाए, लेकिन इस बीमारी के बाद समझ में आया कि परिवार ही सबकुछ है. छोटी-छोटी बातों पर पति से झगड़ने वाली मैं तभी समझी कि पति और सास जीवनदान भी दे सकते हैं. ऑफिस का भी सही मतलब भी समझ में आया कि जरूरी सिर्फ इतना ही है आप अपना काम अच्छे से करें... दूसरों से कम उलझें, फालतू चीजों को इग्नोर करें. सोसाइटी का भी ये समझ में आया कि ये साथ जश्न मनाने के लिए तो ठीक है, लेकिन बड़ी आफत में ज्यादातर लोग दूर हो जाते हैं.
चलिए अब बात करते हैं एक ऐसी यात्रा की जिस पर मैं निकल तो चुकी हूं, लेकिन वह कब खत्म होगी कह नहीं सकती. मैं एक शाम अम्मा (सास) के साथ बैठी चाय पी रही थी तो उन्होंने पूछ लिया कि उभरी हुई गांठ क्या है... ? मैं बोली कुछ नहीं अम्मा ये तो काफी समय से है, कोई दर्द थोड़े ही है... कुछ नहीं बस ये तो ऐसे ही है. अम्मा इसके बाद काफी परेशान हो गईं और जिद करने लगी कि इसे टेस्ट करवाओ.जैसे उनकी आंखों ने ही टेस्ट कर लिया हो ये गांठ कोई आम गांठ नहीं है. मैं दो महीने तक उन्हें टालती रही, लेकिन एक दिन वो रोने लगीं, उन्हें रोता देख मैं खुद भी घबरा गई और टेस्ट करवाने हसबैंड के साथ चली गई.
जिस दिन टेस्ट रिपोर्ट आनी थी, पति को ऑफिस जाना था तो मैं अकेले ही रिपोर्ट लेने चली गई. जैसे ही डॉक्टर के पास पहुंची उन्होंने मुस्कुराते हुए बैठने को कहा. मैंने उन्हें रिपोर्ट का लिफाफा सौंपा. जैसे ही उन्होंने देखा तो मुस्कुराहट की जगह अचानक चिंतित दिखाई देने लगीं. बोलीं तुम्हारे साथ कौन आया है. मैंने कहा कि मैं अकेली ही आई हूं.मैंने भी परेशान होकर पूछा क्या हुआ डॉक्टर. वो कुछ देर चुप रहीं और बोलीं- तुमको ब्रेस्ट कैंसर है. बस, पैरों तले जमीन ही खिसक गई. जोर-जोर से वहीं रोने लगी. डॉक्टर ने मुझे बताया कि ठीक हो सकती हो. संभालों खुद को. ऐसे में तो कौन खुद को संभाल पाता. कैंसर को तो फिल्मों में देखा, आसपास इस बीमारी के बारे में सुना. यही लग रहा था अब नहीं बचूंगी.

डॉक्टर के रूम से रोते हुए बाहर निकली और पति को फोन किया. गला इतना भर आया कि आवाज भी निकल नहीं रही थी. पति भी वहां से कह रहे थे साफ कहो क्या कहना चाह रही हो. फिर मुंह से एक ही शब्द निकला कैंसर. बस पति ने फोन काटा और वहां से निकले. तब तक हसबैंड के बड़े भाई और भाभी आ गए. उनके आने से पहले करीब आधा घंटे तक सड़क पर अकेली रोती रही, आसपास से लोग निकल रहे थे, मुझे आंसुओं से भरी आंखों में कुछ सही से दिखाई नहीं दे रहा था, बस एक डर और उसके साथ निकलने वाली चीख थी.
वो रात भुलाए नहीं भूलती...आंसू थम नहीं रहे थे और भोलेनाथ से बस यही पूछती रही प्रभु मेरे साथ क्यों? मैंने तो हमेशा ही आप पर विश्वास किया तो फिर आपने मेरे साथ ऐसा कैसे कर दिया. मुझे अपने मरने के साथ-साथ समाज की चिंता भी होने लगी थी कि अब सब मुझसे नफरत करेंगे. सबको लगेगा मैं पापी हूं, इसलिए मेरे साथ ऐसा हुआ. रातभर बस कई तरह के विचार आ रहे थे और सुबह हो गई. मेरे पति के बड़े भाई ने उस समय हमारी बहुत मदद की. उन्होंने रातभर में सबसे बात करके रिसर्च कर ली कौन-सा अस्पताल ठीक रहेगा और वहां किससे मिलें. मेरे पति मुझे तुरंत राजीव गांधी अस्पताल ले गए. वहां चारों तरफ मरीज ही मरीज दिख रहे थे.. दुख और दर्द में कराहते उनके परिजन भी. मैं खुद को उन मरीजों के साथ नहीं रख पा रही थी. अरे मैं उनके जैसी कैसे हो सकती हूं. सच कहूं तो मैं इस बीमारी के नाम से ही नफरत करती थी. मैं ये भी स्वीकार नहीं कर पा रही थी कि मुझे कैंसर हो गया है और मैं भी उन मरीजों जैसी ही हूं.
राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में बहुत अच्छी डॉक्टर मिलीं. बहुत अच्छे से समझाया कि आपके टेस्ट होंगे और उसके बाद बता पाएंगे कि कौन सी स्टेज और कौन सी प्रकृति का कैंसर है, उसी के हिसाब से इलाज होगा. मैं एक हफ्ते तक अस्पताल जाती रही, टेस्ट होते रहे और रिपोर्ट मिलती रहीं, लेकिन डर के कारण मेरा रोना जारी रहा, घबराहट इतनी कि जो सामने आ रहा था, उसी से लिपटकर रोने लगती. साथ-साथ एक नया भाव जाग गया कि ये प्रभु बचा लो... जो गलती मैंने की है मुझे माफ कर दो, बस बचा लो...बाकी का जीवन अच्छे कामों में लगाऊंगी.. आपकी भक्ति में रहूंगी. 7 दिन तक लगातार न सोने की वजह से मेरी एंजाइटी बढ़ रही थी.इस समय मेरी अम्मा (सास) ने मुझे सीने से लगाए रखा.. अम्मा बजरंग बली की भक्त थीं. मैं उनके साथ रहती थी, अम्मा कहती थी बस रोना नहीं, बजरंग बली सब ठीक करेंगे. और मैं कहती थी अब कुछ ठीक नहीं होगा, मैं मरना नहीं चाहती, मुझे बचा लो. अम्मा इस बीच नाम जब और सुंदरकांड लगातार करती रहीं. साथ ही अक्सर ये भी कहती भगवान मेरी बहू है. मेरे बेटे-बहू को कष्ट न देता... मैंने जीवन जी लिया था, मुझे दे दे ये कष्ट, इनको न दे.
खैर, एक दिन पहले अस्पताल जाने के लिए निकली तो रास्ते में हर जगह भोलेनाथ की तस्वीर दिखाई दी... किसी दुकान पर या किसी पोस्टर के रूप में. यहां तक कि मैं अस्पताल में भर्ती हुई तो टीवी खोला तो उसमें भी शंकर भगवान का सीरियल चल रहा था.देखकर लगा जैसे भगवान हैं तो संभाल लेंगे. मैं नाम जप करते हुए सो गई. सुबह उठी तो परिवार के लोग मौजूद थे. मुझे ऑपरेशन थियेटर में जाने के लिए तैयार किया गया. मैं जब ले जाई जा रही थी तो मेरे पति ने कहा कि चिंता मत करना मैं बाहर ही हूं. मेरी अम्मा की आंखें भरी हुई थीं, मेरी मां भी रोते हुए मुझे निकलते देख रही थीं. मैंने स्माइल करने की कोशिश के साथ नम आंखों से सबको अलविदा कहा और ऑपरेशन थियेटर में चली गई. वहां जाकर डॉक्टर ने मुझे कहा कि हम तुम्हें एक इंजेक्शन लगाएंगे और तुम आंखें बंद कर लेना. मैं समझ गई थी कि मुझे बेहोश कर दिया जाएगा. ऑपरेशन से पहले लेडी डॉक्टर से मेरे शब्द थे, हर हर महादेव, गणपति बप्पा मोरया. आंख बंद होने से पहले ऐसा लग रहा था भोलेनाथ खड़े हैं अम्बे के साथ.और फिर आंखें बंद हो गईं, जो शाम 6 बजे खुली. मैं आईसीयू में थी. सामने पति थे देखते ही बोले तूने तो लड़ाई जीत ली. डॉक्टर ने बताया कि कहीं भी कैंसर फैला नहीं था. ब्रेस्ट से सिर्फ गांठ को रिमूव किया गया है. सब ठीक है इसके साथ ही एहतियात के तौर पर लिंफ नोट्स निकाल दिए गए हैं. मुझे टांकों की लंबी लकीरें -सी लगी हुई थीं. उस दिन पहली बार भगवान को शुक्रिया कहा.इस पूरे इलाज के दौरान टेस्ट हुए हों या सर्जरी मुझे दर्द नहीं हुआ. जैसे कोई शक्ति काम कर रही थी. मुझे सिर्फ मानसिक टेंशन थी.. कैंसर नाम मेरे साथ क्यों जुड़ गया या इसके साथ जी पाऊंगी. ईश्वर से प्रार्थना करती रही कि आप सर्वशक्तिमान हो, ऐसा कौन सा ही संकट हो सकता है जो आप ठीक नहीं कर सकते.

खैर, मैं ऑपरेशन के बाद घर आ गई. पति के बड़े भाई ने हमें उस समय अपने घर में आसरा दिया. अम्मा साथ थीं. खुद 83 साल की थीं फिर भी मुझे गरम पानी से पौंछकर कपड़े पहनाना, मेरी चोटी बनाना और मेरे साथ धूप में बैठकर हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करना. नाम जप करना. अम्मा ने मुझे यकीन दिलाया की तुझे कुछ नहीं होगा. इस बीच घबराहट में नींद न आने की समस्या और बढ़ गई. एक दिन बस ऐसे ही भगवान से लड़ने मंदिर चली गई. भगवान से बात कर ही रही थी कि एक पंडित जी ने पूछा बेटा क्या हुआ. मैंने कहा कि पंडित जी मेरी तबीयत ठीक नहीं है. बड़ी बीमारी का नाम है, कल का कुछ नहीं पता. घबराहट में नींद नहीं आती. उन्होंने एक रुद्राक्ष दिया और बोले कि इसे अपने साथ रखकर सोना. उस दिन पहली बार मुझे नींद आई. उन्होंने मुझे एक मंत्र भी दिया जिसे मैं पूरे ट्रीटमेंट के दौरान करती रही. पंडित जी ने कहा कि बीमारी में सही इलाज और भगवान का आशीर्वाद दोनों जरूरी है. तेरे भाग्य में जो है वो तो होना ही है, लेकिन तेरी राह भगवान आसान जरूर कर देंगे.
फिर भी मैं मोबाइल पर इस बीमारी से जुड़ा कुछ देख लेती थी तो घबरा जाती थी. मेरी मौसी ने मुझसे बात करना शुरू किया और बताया कि मोबाइल पर इस बीमारी से संबंधित कुछ नहीं देखना. वह राजस्थान के एक स्कूल में प्रिसिंपल हैं. उन्होंने मुझ पर मनोवैज्ञानिक तरीके से भी काम किया. वो मुझे बोलती थीं कि तुझे कुछ नहीं है. ये समय का चक्र है, बीत जाएगा. तेरा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता. वो मुझे हर बार एक तारीख बताती कि फलां तारीख से तेरा समय बहुत अच्छा चलने वाला है. जैसे उन्होंने कहा कि मकर संक्रांति के बाद तो तेरा ही समय है. ये भी सच है कि मैंने इन चीजों पर पहले कभी विश्वास नहीं किया. मैं तो भगवान पर भी शक कर लेती थी कि पता नहीं है या नहीं. लेकिन न जाने क्यों उस समय ये चीजें मुझे हिम्मत दे रही थीं, मौसी पूरे इलाज के दौरान एक तारीख देती रहीं, ये बताती रहीं कि तुझे कुछ नहीं हुआ है. उनकी तसल्ली भरी बातें मेरा सहारा बन गई. जब भी घबराहट होती अम्मा से और मौसी से बात करती.
उस दौर में उन लोगों ने भी मेरी सेवा की, जिनसे मैं उम्मीद भी नहीं कर सकती थी. भगवान ने पूरा प्लान बना रखा था कि ऑपरेशन के बाद कहां-कहां रहना है, कीमोथैरेपी में कहां और रेडिएशन में कहां. इलाज का खर्चा भी इंश्योरेंस से निकला. ईश्वर ने न जाने कहां से कोरोना काल को देखते हुए ये बुद्धि दे दी कि एक इंश्योरेंस करवा लेते हैं, जरूरत पड़ने पर ऑफिस का बीमा तो कम पड़ सकता है, वरना खर्चे से भी हालत खराब हो जाती.
मेरा इलाज खत्म हुआ तो मैंने तुरंत ऑफिस ज्वाइन किया. मेरी नौकरी मेरा जीवन है. मैं ऑफिस में अच्छा महसूस करती हूं, क्योंकि अपने काम से प्यार करती हूं, मेरे इलाज को चलते हुए 5 साल होने वाले हैं, मैं खुद को मजबूत पाती हूं. भगवान के अधिक करीब हो गई हूं. जीवन के हर पल को जी रही हूं. भक्ति के आनंद में रहती हूं. अब मेरी इच्छाएं कम हैं. पहले मौत से डरती थी, अब मौत पर खुलकर बात करती हूं, पति से कह देती हूं, देखो जी मुझे मणिकर्णिका घाट पर ही जलाना, ये करना ये मत करना, लेकिन ये मत सोचना जल्दी मरूंगी, 90 साल की होकर मरूंगी, तब तक तो यूं ही छाती पर मूंग ही दलूंगी. अब पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता कि कैंसर से मैं मरी नहीं, जिंदा हो गई हूं. जैसे अब मैं अपने जीवन को जी रही हूं, वो पहले नहीं हो पाता. अब लोगों से उम्मीद कम करती हूं. लोगों से उलझना नहीं चाहती, कोई कुछ गलत भी करता है तो अक्सर उन्हें छोड़ देती हूं और आगे बढ़ जाती हूं. जीवन एक एक पल भरपूर जी रही हूं.

अपनी कैंसर जर्नी को लेकर मैं ये कहना चाहती हूं कि उस समय मुझे कोई डॉक्टर ऐसा नहीं कह रहा था कि मैं पूरी तरह ठीक हो जाऊंगी. वो सिर्फ अपना इलाज कर रहे थे. मुझे तो एक उम्मीद चाहिए थी, जिसके सहारे में वो वक्त काट सकूं, जिसके सहारे में अस्पताल में पॉजिटिव होकर जा सकूं, वो मुझे भगवान से मिली. महाकाल मुझे कुछ नहीं होने देंगे, वो मेरी दुर्गति नहीं करेंगे ये मैंने खुद से ही अपने भीतर विश्वास जगाया, जिससे मैं ठीक होती चली गई. मैंने शिवानी जी प्रण को रोज दोहराया कि मैं बिल्कुल स्वस्थ हूं, मुझे कोई बीमारी नहीं है, ये कष्ट भी दूर होने वाला है. इसने भी मेरे भीतर थैरेपी की तरह काम किया.वैसे,बता दूं कैंसर में परिवार का सहयोग बहुत जरूरी है. मरीज शरीर से कमजोर नहीं होता दिल और दिमाग से हो जाता है. उन्हें बताओ वो ठीक हो सकते हैं. उन्हें कामों में व्यस्त रखो. उनके साथ बातचीत करते रहो.कैंसर के मरीजों से नॉर्मली ट्रीट करो कि जैसे उन्हें कुछ नहीं हुआ है. कैंसर का मतलब बिस्तर पर लेटे रहना नहीं है, उठो और हिम्मत करो.. और जब भी लॉ फील हो तो जोर से बोले- ओम नम: पार्वती पतेय हर हर महादेव...
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