आंखे हमारे शरीर का सबसे नाजुक और जरूरी हिस्सा होती है. आजकल बढते स्क्रीन टाइम और खासकर डायबिटीज की वजह से आंख के पर्दे यानी रेटिना से जुड़ी बीमारिया बहुत तेजी से बढ़ रही है. भारत मे रेटिना की बीमारियो के मरीज तो लाखो मे है, लेकिन उनके इलाज के लिए स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भारी कमी है. इसी बड़ी समस्या को हल करने के लिए देश के सबसे बडे मेडिकल संस्थान एम्स नई दिल्ली ने एक बहुत बडा कदम उठाया है.
एम्स (AIIMS) के डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थैल्मिक साइंसेज (Dr RP Centre) ने रॉश इंडिया हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट (RIHI) के साथ मिलकर एक खास कस्टमाइज्ड रेटिना ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरु किया है. इसका मकसद देशभर के आई स्पेशलिस्ट्स को रेटिना से जुडी गंभीर बीमारियो की जांच और इलाज के लिए एडवांस ट्रेनिंग देना है.
देशभर के 100 से ज्यादा डॉक्टरों को मिलेगी स्पेशल ट्रेनिंग
इस नई पहल के तहत नेशनल रेटिना स्किल डेवलपमेंट सेंटर मे डॉक्टरों के लिए हैंड्स-ऑन ट्रेनिंग की सुविधा शुरू की गई है. एम्स का प्लान अगले 3 सालो मे सरकारी और पब्लिक हेल्थ सेक्टर के 100 से अधिक नेत्र रोग विशेषज्ञो (Ophthalmologists) को इस प्रोग्राम के जरिए पूरी तरह ट्रेन करने का है.
इस पूरे कोर्स को 8 खास मॉड्यूल्स मे बांटा गया है. डॉक्टरों को यहां हाई-रेजोल्यूशन OCT मशीन, फंडस कैमरा और एडवांस स्पेशलाइज्ड माइक्रोस्कोप जैसे अत्याधुनिक उपकरणो पर सीधे प्रैक्टिकल ट्रेनिंग दी जाएगी. इससे वो आंखो के पर्दे की बारीकी को सही तरीके से समझ सकेंगे.
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देश मे रेटिना स्पेशलिस्ट्स की भारी कमी
विट्रियो-रेटिना सोसाइटी ऑफ इंडिया (VRSI) के आंकडो के मुताबिक, पूरे देश मे सिर्फ 1700 के करीब ही रेटिना स्पेशलिस्ट मौजूद है. अगर देश की 140 करोड से ज्यादा आबादी को देखे तो यह संख्या बहुत ही कम है.
डायबिटीज के कारण होने वाली 'डायबिटिक रेटिनोपैथी' और बढती उम्र के साथ होने वाली 'मैकुलर डिजनरेशन' जैसी बीमारिया लोगो की आंखो की रोशनी हमेशा के लिए छीन लेती है. कई बार मरीजो को समय पर सही इलाज सिर्फ इसलिए नही मिल पाता क्योकि छोटे शहरो मे आंख के पर्दे की जांच करने वाले एक्सपर्ट डॉक्टर ही नही होते.
अंधेपन के खतरे को रोकना है मुख्य मकसद
एम्स आरपी सेंटर की चीफ प्रोफेसर राधिका टंडन ने इस लॉन्च के मौके पर कहा कि रेटिना से जुडी समस्याओ का अगर समय पर पता चल जाए, तो लोगो को हमेशा के लिए अंधा होने से बचाया जा सकता है. इसके लिए केवल बड़े-बड़े अस्पतालो पर निर्भर रहने के बजाय सरकारी अस्पतालों के जनरल आई स्पेशलिस्ट्स को भी पूरी तरह सक्षम बनाना जरूरी है. यह ट्रेनिंग सीधे ग्रासरूट लेवल तक आंखो की देखभाल को मजबूत करेगी.
वही रॉश इंडिया हेल्थकेयर इंस्टीट्यूट की डायरेक्टर रज्जी महदवान ने कहा कि रेटिना की बीमारिया देश मे एक शांत संकट की तरह है. जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है. यह पार्टनरशिप डॉक्टरों की स्किल को निखारने और मरीजो को सही समय पर सही इलाज दिलाने मे मील का पत्थर साबित होगी.
इस ट्रेनिंग प्रोग्राम के शुरू होने से आने वाले दिनो मे छोटे शहरो और गावो के मरीजो को भी समय पर रेटिना की सही जांच और बेहतर इलाज मिल सकेगा.
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