डिमेंशिया से दुनिया भर में 5 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित है. हर साल डिमेंशिया के लगभग 1 करोड़ नए केस सामने आते हैं, लेकिन अब एक नई तकनीक समय से पहले ही डिमेंशिया के जोखिम को पहचान लेगी. यह मशीन-लर्निंग की नई तरीका, नींद के दौरान दिमाग की गतिविधि की जांच करती है, यह डिमेंशिया होने के ज्यादा जोखिम वाले लोगों की पहचान करने में मदद कर सकती है. इस रिसर्च का नेतृत्व UC सैन फ्रांसिस्को और बोस्टन के बेथ इजराइल डिकोनस मेडिकल सेंटर के वैज्ञानिकों ने किया.
यह सिस्टम नींद के दौरान इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राफी (EEG) से मिले इलेक्ट्रिकल सिग्नल का विश्लेषण करके किसी व्यक्ति की "दिमाग की उम्र" (brain age) का अनुमान लगाता है. रिसर्चर्स ने पाया कि जब दिमाग व्यक्ति की असल उम्र से ज्यादा बूढ़ा दिखता था, तो डिमेंशिया का जोखिम बढ़ जाता था.
दिमाग की अनुमानित उम्र और असल उम्र के बीच हर 10 साल के अंतर पर, डिमेंशिया होने की संभावना लगभग 40% बढ़ जाती थी. जिन लोगों के दिमाग की अनुमानित उम्र उनकी असल उम्र से कम थी, उनमें जोखिम कम था. ये नतीजे JAMA नेटवर्क ओपन में पब्लिश हुए.
AI नींद के संकेतों से दिमाग की उम्र का लगाता है अनुमान
रिसर्चर्स ने एक मशीन-लर्निंग मॉडल बनाया जो EEG ब्रेन वेव रिकॉर्डिंग में मिलने वाली 13 बारीक फीचर्स को मिलाता है. उन्होंने इस मॉडल को लगभग 7,000 लोगों से जानकारी लेकर तैयार किया, जिन्होंने पांच अलग-अलग स्टडीज में हिस्सा लिया था. पार्टिसिपेंट्स की उम्र 40 से 94 साल के बीच थी, और जब उनकी स्टडीज शुरू हुईं तो उनमें से किसी को भी डिमेंशिया नहीं था. रिसर्चर्स ने 3.5 से 17 साल तक उनकी निगरानी की. उस दौरान, लगभग 1,000 पार्टिसिपेंट्स को डिमेंशिया हो गया.
विश्लेषण से पता चला कि सोते समय दिमाग की तरंगों (brain waves) में छोटे और बहुत बारीक पैटर्न ऐसी जानकारी दे सकते हैं जिसे नींद मापने के सामान्य तरीके नहीं पकड़ पाते.
डिमेंशिया का जल्दी पता लगाने में होगा मददगार
चूंकि EEG रीडिंग बिना किसी इनवेसिव मेडिकल प्रक्रिया (शरीर के अंदर उपकरण डाले बिना) के ली जा सकती हैं, इसलिए शोधकर्ताओं का मानना है कि नींद के आधार पर दिमाग की उम्र मापने से भविष्य में ट्रेडिशनल क्लीनिक्स के बाहर भी डिमेंशिया के जोखिम का आकलन करने में मदद मिल सकती है. उदाहरण के लिए, भविष्य की वेयरेबल टेक्नोलॉजी नींद के दौरान जरूरी ब्रेन सिग्नल रिकॉर्ड करने में सक्षम हो सकती हैं.
बेहतर नींद से डिमेंशिया का जोखिम कम
परिणाम यह भी बताते हैं कि नींद की सेहत में सुधार करने से दिमाग की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है. रिसर्चर्स ने बताया कि पिछली रिसर्च से पता चला है कि नींद से जुड़ी समस्याओं का इलाज करने से नींद के दौरान रिकॉर्ड की गई ब्रेन वेव गतिविधि में बदलाव आ सकता है.
बेथ इजराइल डिकोनिस मेडिकल सेंटर में न्यूरोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर और इस मॉडल को दो अन्य लेखकों के साथ मिलकर विकसित करने वाले मुख्य लेखक हाओकी सन (PhD) ने कहा, "शरीर का बेहतर प्रबंधन, जैसे कि बॉडी मास इंडेक्स कम करना और एपनिया (नींद में सांस रुकने की समस्या) की संभावना को कम करने के लिए व्यायाम बढ़ाना, असर डाल सकता है. लेकिन दिमाग की सेहत को बेहतर बनाने के लिए कोई जादुई गोली नहीं है."
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