हमारे आसपास जब भी किसी को कम या तेज सुनाई देता है, तो हम ये बोलकर हंसकर टाल देते हैं कि 'क्या बूढ़ा हो गया है, जो सुनाई नहीं दे रहा.' हम में से कई लोग अक्सर सुनने की क्षमता कम होने को बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन नई रिसर्च बताती हैं कि ये समस्या सिर्फ कानों तक सीमित नहीं है, बल्कि दिमाग की सेहत पर भी असर डाल सकती है. ऐसे में अगर आपको सुनने की क्षमता में जरा सा भी फर्क नजर आता है, तो फौरन अपने डॉक्टर से सलाह लें. क्योंकि अनट्रीटेड हियरिंग लॉस डिमेंशिया के सबसे बड़े बदले जा सकने वाले रिस्क कारकों में शामिल है.
सुनने की कमजोरी और डिमेंशिया का कनेक्शन?
सीके बिड़ला हॉस्पिटल, दिल्ली के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. के.के. जिंदल का कहना है कि हाल ही के वर्षों में हुई कई बड़ी स्टडीज ने ये संकेत दिए हैं कि सुनने की क्षमता कम होने पर डिमेंशिया का खतरा बढ़ सकता है. 2024 की Lancet Commission रिपोर्ट में मिडल एज के बाद होने वाले हियरिंग लॉस को डिमेंशिया का सबसे बड़ा मॉडिफायबल रिस्क फैक्टर बताया गया है.
डेनमार्क की यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न डेनमार्क की ओर से 5.7 लाख से ज्यादा लोगों पर किए गए रिसर्च में पाया गया कि जिन लोगों को सुनने में दिक्कत थी, उनमें डिमेंशिया विकसित होने का खतरा सामान्य सुनने वालों की तुलना में अधिक था. रिसर्च में ये भी सामने आया कि जैसे-जैसे हियरिंग लॉस बढ़ता है, वैसे-वैसे डिमेंशिया का रिस्क भी बढ़ सकता है.
आखिर कानों का दिमाग से क्या कनेक्शन है?
डॉक्टर का कहना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे-
1. दिमाग पर अतिरिक्त दबाव
जब किसी व्यक्ति के सुनने की क्षमता कम हो जाती है, तो उसके दिमाग को बातचीत को समझने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इससे याददाश्त और सोचने-समझने जैसी अन्य मेंटल प्रोसेस पर असर पड़ सकता है.
2. मस्तिष्क में बदलाव
डॉक्टर का कहना है कि कुछ रिसर्च में हियरिंग लॉस वाले लोगों के दिमाग में ऐसे बदलाव पाए गए हैं, जो अल्जाइमर जैसी बीमारियों से जुड़े हो सकते हैं. हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी इस संबंध को पूरी तरह समझने की कोशिश कर रहे हैं.
3. सामाजिक दूरी बढ़ना
सुनने में परेशानी होने पर लोग अक्सर बातचीत और सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगते हैं. सामाजिक जुड़ाव मानसिक स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक क्षमता को बनाए रखने में मदद करता है. ऐसे में सामाजिक अलगाव डिमेंशिया के खतरे को और बढ़ा सकता है.
क्या हियरिंग लॉस से ब्रेन की कार्य क्षमता बेहतर हो सकती है?
डॉक्टर कहते हैं कि अगर समय पर सुनने की क्षमता का इलाज किया जाए, तो ब्रेन पर होने वाले असर को काफी कम किया जा सकता है. ACHIEVE Trial नामक एक महत्वपूर्ण अध्ययन में पाया गया कि सुनने की समस्या का अगर समय पर इलाज करवाया गया, तो इससे कॉग्निटिव गिरावट की रफ्तार धीमी हो सकती है, मुख्य रूप से उन लोगों में जो पहले से अधिक जोखिम में हैं.
इसके अलावा, JAMA Neurology में प्रकाशित एक मेटा-एनालिसिस में बताया गया कि हियरिंग एड या कॉक्लियर इम्प्लांट का इस्तेमाल करने वाले लोगों में डिमेंशिया और कॉग्निटिव डिक्लाइन का खतरा तुलनात्मक रूप से कम देखा गया.
क्या करना चाहिए?
डॉक्टर का कहना है कि 40-50 वर्ष की उम्र के बाद नियमित रूप से सुनने की जांच करानी चाहिए. अगर हियरिंग लॉस की पहचान हो जाए, तो उसे नजरअंदाज करने के बजाय समय पर उपचार और हियरिंग एड जैसे विकल्पों पर विचार करना चाहिए.
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