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जन्माष्टमी पर क्यों खास है पंजीरी और माखन मिश्री? जानिए इसका इतिहास, आसान रेसिपी और 7 बड़े फायदे

जन्माष्टमी पर धनिए की पंजीरी क्यों बनाई जाती है? जानें इसका इतिहास, धार्मिक महत्व, आसान रेसिपी, पोषण संबंधी जानकारी और माखन-मिश्री से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यण्‍

जन्माष्टमी पर क्यों खास है पंजीरी और माखन मिश्री? जानिए इसका इतिहास, आसान रेसिपी और 7 बड़े फायदे
जन्माष्टमी भोग में धनिए की पंजीरी और माखन-मिश्री क्यों होते हैं शामिल? जानिए वजह
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भादों के महीने में जब कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार आता है, तो घर-घर में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है. मंदिरों में भजन-कीर्तन, माखनचोर के झूले और चारों तरफ फैली धनिए की सौंधी खुशबू इस बात का अहसास करा देती है कि कान्हा का जन्मदिन आ गया है. जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को पंजीरी और माखन-मिश्री का भोग लगाने की पुरानी परंपरा है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर व्रत और त्योहार में तो बेसन या आटे की चीजें बनती हैं, फिर जन्माष्टमी पर धनिए की पंजीरी ही क्यों बनाई जाती है? क्या माखन-मिश्री सिर्फ एक परंपरा है या इसके पीछे कोई साइंटिफिक और सेहत से जुड़ा राज भी है?

डॉ. राम अवतार, दिल्ली सरकार के योग विभाग के सेवानिवृत्त प्रोजेक्ट ऑफिसर और योग-ध्यान विशेषज्ञ, बताते हैं कि जन्माष्टमी पर चढ़ाई जाने वाली धनिए की पंजीरी केवल धार्मिक परंपरा नहीं है. आयुर्वेद में इसे मौसम और पाचन शक्ति के अनुरूप तैयार किया गया भोग माना जाता है. उनके अनुसार, भाद्रपद के दौरान पाचन तंत्र अपेक्षाकृत संवेदनशील हो सकता है, इसलिए धनिया, घी और मेवों से बनी पंजीरी को हल्का और सुपाच्य प्रसाद माना जाता है.

आइए आज इस लेख में जानते हैं पंजीरी का रोचक इतिहास, इसे बनाने का सबसे आसान तरीका, इसके 7 कमाल के फायदे और माखन-मिश्री की असली सच्चाई.

पंजीरी का इतिहास: कैसे बनी यह भारतीय घरों की पहचान?

पंजीरी का इतिहास भारत में सदियों पुराना है. आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय रसोई में इसका जिक्र बहुत पुराने समय से मिलता है. प्राचीन काल में जब लोग लंबी यात्राओं पर जाते थे या सैनिकों को युद्ध पर भेजा जाता था, तब उन्हें पंजीरी बनाकर दी जाती थी. इसकी वजह यह थी कि पंजीरी महीनों तक खराब नहीं होती थी और थोड़ी सी मात्रा में खाने पर भी पूरे दिन के लिए भरपूर एनर्जी दे देती थी.

कृष्ण जन्माष्टमी पर धनिए की पंजीरी बनाने का इतिहास भी ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार खानपान) से जुड़ा है. भादों का महीना बारिश का मौसम होता है. इस दौरान पाचन क्रिया बहुत कमजोर पड़ जाती है. आयुर्वेद के जानकारों का मानना था कि व्रत के बाद अचानक भारी अनाज खाने से पेट खराब हो सकता है. इसलिए व्रत खोलने और भगवान को भोग लगाने के लिए धनिया, देसी घी और मेवों से तैयार हल्की पंजीरी का चलन शुरू हुआ, जो पेट के लिए अमृत समान मानी जाती है.

डॉ. राम अवतार कहते हैं, "आयुर्वेद में हर ऋतु के अनुसार खानपान बदलने की सलाह दी जाती है. वर्षा ऋतु में अग्नि यानी पाचन शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है. ऐसे में धनिया, घी और सूखे मेवों से तैयार पंजीरी शरीर को ऊर्जा देने के साथ भारीपन कम करने में मदद कर सकती है."

घर पर धनिए की पंजीरी बनाने की आसान रेसिपी

जन्माष्टमी के मौके पर मंदिर जैसा स्वाद घर पर पाना बहुत आसान है. इसे बनाने के लिए आपको बहुत ज्यादा तामझाम की जरूरत नहीं पड़ती.

जरूरी सामग्री:

  • 1 कप सूखा साबुत धनिया (या ताजा पिसा हुआ धनिया पाउडर)
  • आधा कप देसी घी
  • आधा कप पिसी हुई मिश्री या बूरा
  • आधा कप मखाने (बारीक कटे हुए)
  • 2 चम्मच काजू (कटे हुए)
  • 2 चम्मच बादाम (कटे हुए)
  • 2 चम्मच कद्दूकस किया हुआ सूखा नारियल (गोला)
  • थोड़ी सी किशमिश और आधा छोटा चम्मच इलायची पाउडर
  • भगवान के भोग के लिए 4-5 तुलसी के पत्ते

धनिए की पंजीरी बनाने का तरीका:

  • सबसे पहले एक भारी तले की कड़ाही में 2 चम्मच देसी घी गरम करें.
  • इसमें कटे हुए काजू, बादाम और मखानों को हल्का सुनहरा होने तक भून लें और अलग प्लेट में निकाल लें.
  • अब उसी कड़ाही में बचा हुआ घी डालें और धीमी आंच पर धनिया पाउडर को भूनें. इसे लगातार चलाते रहें ताकि यह जले नहीं.
  • जब धनिए से बहुत अच्छी खुशबू आने लगे और इसका रंग हल्का बदल जाए, तो गैस बंद कर दें. (ध्यान रहे इसे बहुत ज्यादा नहीं भूनना है वरना कड़वाहट आ सकती है).
  • धनिए को एक बड़े बर्तन में निकालें और पूरी तरह ठंडा होने दें.
  • ठंडा होने के बाद इसमें भुने हुए मेवे, नारियल का बूरा, इलायची पाउडर और पिसी मिश्री अच्छी तरह मिला लें.
  • ऊपर से तुलसी का पत्ता रखें. आपकी भोग वाली स्वादिष्ट पंजीरी तैयार है.

पंजीरी खाने के 7 जबरदस्त फायदे

जन्माष्टमी पर बनने वाली धनिए की पंजीरी सिर्फ पूजा का प्रसाद नहीं है, बल्कि यह एक सुपरफूड है. इसे पारंपरिक रूप से पौष्टिक प्रसाद माना जाता है. अगर आप इसे अपनी रोजमर्रा की डाइट में शामिल करते हैं, तो इसके ढेरों फायदे मिलते हैं:

1. पाचन तंत्र को मजबूत बनाना

धनिया पेट की गैस, अपच, ब्लोटिंग और एसिडिटी की समस्या को तुरंत शांत करता है. व्रत के बाद जब शरीर को हल्के और पाचक भोजन की जरूरत होती है, तो यह पाचन अग्नि को संतुलित रखती है. हां, कुछ लोगों को पाचन संबंधी परेशानी में राहत महसूस हो सकती है.

डॉ. राम अवतार के अनुसार, "धनिया पारंपरिक भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में लंबे समय से पाचन संबंधी आराम के लिए इस्तेमाल होता रहा है. कई लोग इसे गैस, पेट फूलने और अपच जैसी समस्याओं में घरेलू उपाय के तौर पर भी लेते हैं."

2. वात और पित्त दोष को शांत करना

बारिश के मौसम में शरीर में पित्त और वात बढ़ जाता है, जिससे जोड़ों का दर्द या पेट की जलन होती है. धनिए की तासीर ठंडी होती है और घी पित्त को शांत करता है. यह मिश्रण शरीर के दोषों को बैलेंस करता है.

डॉ. राम अवतार का कहना है कि "मेवे, मखाने और देसी घी जैसे तत्व शरीर को ऊर्जा और पोषण प्रदान करते हैं. बदलते मौसम में संतुलित आहार और पर्याप्त आराम के साथ ऐसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ उपयोगी हो सकते हैं."

3. इम्यूनिटी बढ़ाना

पंजीरी में डाले जाने वाले मेवे, मखाने और देसी घी मिलकर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं. बदलते मौसम में होने वाले सर्दी-जुकाम और फ्लू से बचाने में यह मदद करती है.

4. दिनभर की कमजोरी और थकान दूर करना

दिनभर व्रत रखने के बाद जब शरीर कमजोर महसूस करने लगता है, तो पंजीरी का एक चम्मच खाते ही तुरंत एनर्जी मिलती है. इसमें मौजूद हेल्दी फैट्स और मिनरल्स शरीर को ताकत देते हैं.

5. आंखों की रोशनी के लिए फायदेमंद

आयुर्वेद के अनुसार सूखे धनिए का नियमित सेवन आंखों की सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है. यह आंखों की जलन को कम करता है और दृष्टि को बेहतर बनाने में मदद करता है. आयुर्वेद में धनिए को आंखों की सेहत के लिए लाभकारी माना जाता है, हालांकि इस पर सीमित वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं

6. सूजन और दर्द में राहत

धनिया में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं. जिन लोगों को गठिया या जोड़ों के दर्द की शिकायत रहती है, उनके लिए देसी घी और धनिए का यह कॉम्बिनेशन सूजन कम करने में मददगार साबित होता है.

7. वजन और ब्लड शुगर को कंट्रोल करना

धनिया मेटाबॉलिज्म को तेज करता है. अगर इसे सफेद चीनी की जगह धागे वाली मिश्री के साथ बनाया जाए, तो यह शुगर के मरीजों के लिए भी नुकसानदेह नहीं होती और क्रेविंग्स को शांत करती है. लेक‍िन ध्‍यान दें क‍ि शुगर के मरीजों को मिश्री या अन्य मिठास वाले प्रसाद का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए और डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है.

माखन-मिश्री: सच में हेल्दी है या सिर्फ परंपरा?

जब भी कान्हा का नाम आता है, तो सबसे पहले माखन-मिश्री का ख्याल आता है. कई लोग सोचते हैं कि मक्खन खाने से वजन बढ़ेगा या कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाएगा, तो क्या यह सिर्फ एक धार्मिक परंपरा है?

इसका जवाब है कि यह सिर्फ परंपरा नहीं बल्कि शुद्ध आयुर्वेद का विज्ञान है. लेकिन ध्यान रहे, यहां बात बाजार में मिलने वाले नमकीन और पीले बटर की नहीं हो रही है. यहां बात हो रही है घर पर ताजी मलाई से मथकर निकाले गए सफेद मक्खन की.

डॉ. राम अवतार बताते हैं, "श्रीकृष्ण और माखन का संबंध केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है. पारंपरिक भारतीय खानपान में ताजा मक्खन को ऊर्जा देने वाला खाद्य माना गया है. हालांकि इसका सेवन हमेशा सीमित मात्रा में ही करना चाहिए."

माखन-मिश्री खाने के असली हेल्थ बेनेफिट्स:

  1. दिमाग को तेज और शांत रखना: गाय के दूध से बने ताजे सफेद मक्खन में अच्छे फैटी एसिड्स होते हैं जो दिमाग के विकास और याददाश्त के लिए बेहतरीन माने जाते हैं.
  2. अल्सर और मुंह के छालों से राहत: अगर पेट की गर्मी से मुंह में छाले हो गए हों, तो मिश्री के साथ ताजा मक्खन खाने से ठंडक मिलती है और छाले बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं.
  3. नेचुरल लुब्रिकेशन: सफेद मक्खन हड्डियों और जोड़ों के बीच चिकनाई (लुब्रिकेशन) बनाए रखने में मदद करता है, जिससे घुटनों का दर्द नहीं होता.
  4. त्वचा में चमक: यह शरीर को अंदर से डिटॉक्स करता है और स्किन को नेचुरल ग्लो देता है.

डॉ. राम अवतार बताते हैं, "ताजा सफेद मक्खन में वसा-घुलनशील तत्व मौजूद होते हैं, लेकिन इसे किसी रोग के इलाज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. संतुलित मात्रा में सेवन करना सबसे महत्वपूर्ण है."

देसी सफेद माखन में जब धागे वाली मिश्री मिलाई जाती है, तो इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स सामान्य चीनी से काफी कम होता है. यह शरीर को बिना नुकसान पहुंचाए शुद्ध ऊर्जा देता है. इसलिए अगर इसे सीमित मात्रा में खाया जाए, तो यह पूरी तरह हेल्दी और पौष्टिक है.

डॉ. राम अवतार कहते हैं: "जन्माष्टमी के पारंपरिक भोग केवल धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि उनमें भारतीय खानपान और मौसम के अनुरूप जीवनशैली की झलक भी दिखाई देती है."

जन्माष्टमी का यह पावन पर्व हमें अपनी प्राचीन खानपान परंपराओं से दोबारा जुड़ने का मौका देता है. तो इस बार जन्माष्टमी पर कान्हा को भोग लगाने के साथ-साथ खुद भी इस शुद्ध, सात्विक पंजीरी और माखन-मिश्री का आनंद लें और अपनी सेहत को दुरुस्त बनाएं.

डॉ. राम अवतार दिल्ली सरकार के योग विभाग के सेवानिवृत्त प्रोजेक्ट ऑफिसर हैं. उनके पास योग और ध्यान (Yoga & Meditation) के क्षेत्र में 38 से अधिक वर्षों का दीर्घकालिक और व्यावहारिक अनुभव है. वे योग, प्राणायाम, ध्यान, नाड़ी विज्ञान, जड़ी-बूटी/पारंपरिक चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा (Naturopathy), रेकी, होम्योपैथी और आयुर्वेद के माध्यम से कई जटिल एवं असाध्य रोगों का सफल इलाज कर चुके हैं.

FAQ

जन्माष्टमी पर धनिए की पंजीरी क्यों बनाई जाती है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह भगवान कृष्ण का प्रिय भोग माना जाता है. आयुर्वेद में इसे हल्का और सुपाच्य भी बताया गया है.

धनिए की पंजीरी में क्या-क्या डाला जाता है?

धनिया पाउडर, देसी घी, मिश्री, मखाने, सूखे मेवे और नारियल.

क्या डायबिटीज के मरीज पंजीरी खा सकते हैं?

सीमित मात्रा में और डॉक्टर की सलाह के अनुसार सेवन करना चाहिए क्योंकि इसमें मिश्री या अन्य मिठास शामिल हो सकती है.

माखन-मिश्री का धार्मिक महत्व क्या है?

यह भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय भोगों में से एक माना जाता है.

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