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एक मामूली दुकान, कैसे बनी बनारस की पहचान-द्वारिका लस्सी के मालिक द्वारिका मांझी ने खुद समझाया

जैसे दशरथ मांझी ने अपने संघर्ष से पहाड़ काटकर इतिहास रचा, वैसे ही द्वारिका मांझी ने मेहनत, ईमानदारी और शुद्धता के दम पर बनारस की लस्सी संस्कृति में अपनी अलग पहचान बनाई है.

एक मामूली दुकान, कैसे बनी बनारस की पहचान-द्वारिका लस्सी के मालिक द्वारिका मांझी ने खुद समझाया
क्यों खास है द्वारिका मांझी की लस्सी.
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एक थे दशरथ मांझी जिन्होंने पहाड़ का सीना चीर कर गांव के लिए रास्ता बना दिया था दूसरे हैं बनारस के द्वारिका मांझी की लस्सी, जिन्होंने 40 साल में बनारस में अपने रबड़ी लस्सी को एक ब्रांड के तौर पर बिना किसी संसाधन के स्थापित कर दिया. बनारसी बड़े चाव से लस्सी पीते हैं यही वजह है कि बनारस के हर गली नुक्कड़ पर लस्सी का कोई न कोई ठीहा आपको मिल जाता है. लेकिन राधेश्याम की लस्सी ने एक अलग और खास पहचान बनाई है. ये पहचान है इनके लस्सी की सादगी और दूध की शुद्धता. 

16 साल की उम्र में द्वारिका मांझी ने लस्सी पिलाना शुरु किया था- 

बनारस में रामनगर के ऐतिहासिक क़िले के सामने राधेश्याम लस्सी की एक छोटी सी दुकान है. इस दुकान के बाहर न कोई भड़कीला बोर्ड और ना ही अंदर कोई आधुनिक साज सज्जा. एक तरफ रबड़ी रखी है तो दूसरी तरफ दही. कुल्हड़ में जब दही और ऊपर से रबड़ी का सटीक अनुपात ही इस लस्सी को खास बना देता है.

कुल्हड़ की एक साइज और एक दाम. 60 रुपए में एक कुल्हाड़ लस्सी आपको मिलेगी. द्वारिका लस्सी के मालिक द्वारिका मांझी बताते हैं कि उनको पहलवानी का शौक था उसी दौरान यहां लस्सी पिलाने लगे. आज 40 साल हो गए उनको लस्सी बनाते हुए. उनका कहना है कि दूध उनके ही तबेले का है इसी के चलते उनकी लस्सी शुद्ध होती है. इसी दुकान में रखे एक बड़े कप को दिखाते हुए कहते हैं कि वो बनारस में नौका रेस को भी जीत चुके हैं. वो कहते हैं कि लस्सी जब पिलाने की सोची तभी से ये सोच थी कि शुद्ध और साफ़ सुधरे तरीके से लस्सी बनाएंगे और लोगों को पिलाएंगे. आज लोग लस्सी पीने दूर दूर से आते हैं. 

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क्या है इस लस्सी की खासियत?

  • लस्सी में इस्तेमाल होने वाला दूध द्वारिका मांझी के अपने तबेले का होता है.
  • दही और रबड़ी का संतुलित अनुपात इसका स्वाद अलग बनाता है.
  • कुल्हड़ में परोसने से मिट्टी की सौंधी खुशबू स्वाद को और बढ़ा देती है.
  • 40 साल से एक ही स्वाद और गुणवत्ता बनाए रखना इसकी सबसे बड़ी पहचान है.

बनारस में लस्सी संस्कृति क्यों है खास?

काशी में लस्सी सिर्फ ड्रिंक नहीं बल्कि संस्कृति का हिस्सा है. सुबह की शुरुआत से लेकर शाम की बैठकों तक, बनारस के लोग कुल्हड़ वाली लस्सी का खूब आनंद लेते हैं. यही वजह है कि शहर के लगभग हर मोहल्ले में लस्सी की दुकानें दिखाई देती हैं.

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